रविवार, 25 मार्च 2012

शहरी बच्चे अनिवार्य सुविधाओं से वंचित : यूनिसेफ

संजीव कुमार
बीते 29 फरवरी 2012 को यूनिसेफ ने शहरी दुनिया के बच्चों को आधार बनाकर ‘द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रेन 2012: चिल्ड्रेन इन एन अरबन वर्ल्ड’ नाम से एक रिपोर्ट जारी किया। इस वर्ष यह रिपोर्ट भारत के सबसे बड़े महानगरों में से एक नई दिल्ली में जारी किया गया जहां करोड़ों बच्चे रहते हैं
यूनिसेफ ने दुनिया भर के शहरी बच्चों को आधार बनाकर एक रिपोट जारी किया है। रिपोर्ट के अनुसार, पूरी दुनिया के शहरों व नगरों में सैकड़ांे मिलियन ऐसे बच्चे हैं जो अनिवार्य सुविधाओं से वंचित हैं। यूनिसेफ के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्रों की ओर बढ़ते पलायन से शहरी जनसंख्या में 60 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। ऐसा अनुमान है कि प्रत्येक वर्ष दुनिया की शहरी आबादी में लगभग 6 करोड़ की वृद्धि हो रही है। अगर यही हाल रहा तो 2050 तक हर दस में से सात व्यक्ति शहरों में रह रहे होंगे।
रिपोर्ट जारी करते हुए भारत में यूनिसेफ की प्रतिनिधि कैरिन हॉलशॉफ ने कहा कि आज विश्व की आधी से ज्यादा आबादी शहरों में रह रही है। इसमें एक अरब से ज्यादा बच्चे हैं। 2011 की जनसंख्या के अनुसार भारत में 37.7 करोड़ लोग शहरों में रहते हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसा अनुमान है कि 2026 तक भारत में 53.5 करोड़ लोग शहरों में रहने लगेंगे। ऐसे में यह हमलोगों पर निर्भर है कि हम यह सुनिश्चित करें कि शहर अपने वादे के मुताबिक बना रहेगा। सभी बच्चों के लिए एक समान अवसर और सम्मान का जीवन मिलेगा। वहीं यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक एंथोनी लेक ने कहा कि शहरीकरण जीवन की वास्तविकता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए हमें बच्चों को बेहतर सुविधा मुहैया कराने जाने की जरुरत है। इस अवसर पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. शांता सिन्हा, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव सुधीर कुमार एवं टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के निदेशक डॉ. परसुरामन भी उपस्थित थे।
कहने की आवश्यकता नहीं है कि दुनिया भर के शहरों में बच्चे भी उसी अनुपात से बढ़ रहे हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार शहरी बचपना बताता है कि उन्हें कई तरह की असमानताओं मसलन अमीरी बनाम गरीबी या फिर सामाजिक गतिशीलता के लिए जरूरी अवसर बनाम अस्तित्व के संकट से गुजरना पड़ रहा है। इस रिपोर्ट से हमारे सामने आज जो सच्चाई उजागर हुई है वह दुनिया भर के शहरों में बढ़ रहे बच्चों की चुनौतियों के बारे में बताती है। इन चुनौतियों में आधारभूत सूविधाओं का असमान वितरण, कुषोषण की बढ़ती दर, पांच वर्ष के अंदर मृत्यु के बढ़ते मामले, स्वच्छ पानी और शौचालय का अभाव, प्राकृतिक खतरों और आर्थिक कारणों से पड़ने वाले प्रभाव शामिल है। कमोबेश भारत की भी यही स्थिति है।
शहरी बच्चों को कई तरह की सुविधाएं सहज उपलब्ध होती हैं, जैसे- स्कूल में पढ़ने, चिकित्सा व खेल के मैदान की सुविधा। लेकिन उसी शहर में कुछ ऐसे इलाके भी होते हैं जहां के बच्चों के लिए ये सुविधाएं उपलब्ध नहीं होती। रिपोर्ट के अनुसार, ऐसा पूरे विश्व में देखा गया है कि बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा व अवसरों की उपलब्धता में बहुत ही असमानता है। भारत की वित्तीय नगरी मुंबई संसार के बड़े व धनी शहरों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि यहां सबसे घनी आबादी और सबसे ज्यादा संख्या में मलिन बस्तियां हैं। भारत में लगभग 50,000 मलिन बस्तियां है, और इनमें से 70 प्रतिशत बस्तियां पांच राज्यों में हैं- महाराष्ट्र (35 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (11 प्रतिशत), पश्चिम बंगाल (10 प्रतिशत), तमिलनाडु और गुजरात (7 प्रतिशत)। आवास एवं गरीबी उन्मूलन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, आज भारत में 9.7 करोड़ लोग 50 हजार से ज्यादा मलिन बस्तियों में रहते हैं।
दूसरी तरफ शहरों के कई क्षेत्रों में संस्थागत ढांचा और उपलब्ध सेवाएं शहरी विकास दर के अनुकूल नहीं है। इतना ही नहीं शहरी बच्चों की बुनियादी जरुरतें भी पूरी नहीं हो पाती। गरीबी में रह रहे परिवारों को अक्सर निम्नस्तरीय सेवाएं दी जाती हैं। शहरी समुदाय के गरीब बच्चों को बुनियादी चीजों से भी वंचित होना पड़ता है और जब शहरी लोगों के सांख्यिकी पर आधारित आंकडे़ तैयार किए जाते हैं तो गरीब और अमीर बच्चों को एक ही पैमाने पर रखा जाता है। इन आंकड़ों के आधार पर जब कोई शहरी नीतियां बनती हैं और स्रोतों का आवंटन होता है तो सबसे ज्यादा उन्हीं गरीब लोगों और उनके बच्चे की जरूरतों को ही नजरअंदाज किया जाता है।
इसलिए ऐसी नीतियां बनाई जाएं जिसमें ज्यादा असुविधाग्रस्त, जरुरतमंद बच्चों को चाहे वे कहीं भी रहते हों, प्राथमिकता मिले, तभी बच्चों में समानता लाया जा सकता है। यूनिसेफ की प्रतिनिधि कैरिन हॉलशॉफ ने यूनिसेफ की तरफ से भारत सरकार से आग्रह किया कि शहरी बच्चों को शहरी योजनाओं के केंद्र में रखा जाए और बेहतर सुविधाओं के विस्तार के दायरे में सभी बच्चों को लाया जाए। तभी हम शहरी एजेंडे में बाल अधिकार को सुनिश्चित कर सकेंगे। इस कार्य को बेहतर तरीके से करने के लिए हमें शहरी क्षेत्रों में रह रहे बच्चों के बीच गरीबी के स्तर और असमानताओं की पहचान करनी होगी तभी इसे दूर किया जा सकता है। वहीं हमलोगों के सामने यह चुनौती है कि हम शहरों को बच्चों के अनुकूल बनाएं जिसमें सभी बच्चों को समान अवसर व सम्मान मिल सके।
(यह रिपोर्ट प्रथम प्रवक्ता के 1 अप्रैल के अंक में छपी हुई है।)