शुक्रवार, 5 जून 2009

जहां बसता है गांधी का भारत



हिवरे बाजार, न केवल गांधी के सपने को साकार करता है बल्कि घने अंधेरे में रोशनी की किरण भी दिखाता है। क्या वह दिन आएगा जब देश के सात लाख गांवों में हिवरे बाजार की तरह अपना ग्राम स्वराज होगा?
एक ऐसा गांव जिसपर व्यापक मंदी के इस दौर में का कोई असर नहीं है। एक ऐसा गांव जहां से अब कोई रोजगार के लिए पलायन नहीं करता। एक ऐसा गांव जहां पर शिक्षक स्कूल से गायब नहीं होते। एक ऐसा गांव जहां पर आंगनवाड़ी रोज खुलती है। एक ऐसा गांव जहां राशन की दुकान ग्राम सभा के निर्देशानुसार संचालित होती है। एक ऐसा गांव जहां की सड़कों पर गंदगी नहीं होती है। एक ऐसा गांव जिसे जल संरक्षण के लिए 2007 का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। इस गांव की सत्ता दिल्ली या बंबई में बैठी कोई सरकार नहीं बल्कि उसी गांव के लोगों द्वारा संचालित होती है। यह किसी यूटोपिया की बात नहीं है न ही कोई सपना है। यह सब साकार रूप ले चुका है, महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के गांव हिवरे बाजार में। दूसरे शब्दों में कहें तो हिवरे बाजार ग्राम स्वराज का प्रतिनिधि गांव तथा गांधी के सपनों का भारत है।
ऐसा नहीं है कि यह गांव हमेशा से ऐसा ही था। आज से 20 वर्ष पहले तक यह एक उजाड़ गांव था। न रोजगार का कोई साधन था न ही खेती के लिए उपजाऊ जमीन थी। इसलिए गांव में र्कोई रहना नहीं चाहता था। लेकिन 1989 में हिवरे बाजार के ही 30-40 पढ़े-लिखे नौजवानों ने यह बीड़ा उठाया कि क्यों न अपने गांव को संवारा जाए। पहले इस बारे में उन लोगों ने गांववालों से बातचीत की, तो कल के छोकरे कहकर बात को सिरे से नकार दिया गया। लेकिन युवकों ने हिम्मत न हारी और अपनी बात टिके रहे। फिर गांव वालों ने भी उनकी बातों को गंभीरता से लिया और 9 अगस्त,1989 को नवयुवकों को एक वर्ष के लिए गांव की सत्ता सौंपी गई। सत्ता मिली तो नवयुवकों ने अपनी कमान सौंपी पोपट राव पवार को। गौरतलब है कि पोपट राव पवार उस समय महाराष्ट्र की ओर से प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेलते थे।
नवयुवकों ने इस एक वर्ष को अवसर के रूप में देखा। गांव में पहली ग्रामसभा की गई और प्राथमिकताएं तय की गर्इं। बिजली, पानी के बाद बात शिक्षा की आई क्योंकि गांव में शिक्षा की स्थिति बहुत ही खराब थी। इतना ही नहीं विद्यालय के शिक्षक छात्रों से शराब मंगवाकर पीते थे। न तो खेल का मैदान था और न ही छात्रों के बैठने की व्यवस्था। ग्रामसभा में सबसे पहले युवकों ने गांववालों से अपील की कि वे अपनी बंजर पड़ी जमीन को विद्यालय के लिए दान में दें। पहले सिर्फ दो ही परिवार जमीन देने के लिए तैयार हुए लेकिन बाद कई लोग आगे आ गए। विद्यालय में एक अतिरिक्त कमरे के निर्माण के लिए सरकार से स्वीकृत 60,000 रुपए की राशि आई। गांववालों के श्रमदान और राशि के उचित नियोजन की बदौलत विद्यालय में दो कमरों का निर्माण किया गया। युवकों का यह कार्य गांववालों में विश्वास भरने के लिए काफी था।
एक वर्ष की तय समय सीमा खत्म हुई। नवयुवकों के कार्यों की समीक्षा हुई। गांववालों ने अब इन नवयुवकों को पांच वर्षों के लिए गांव की सत्ता सौंपने का निश्चय किया। अब पोपट राव पवार के कुशल नेतृत्व में युवकों ने गांव की आधारभूमि तैयार करना शुरू किया । गांव में खेतीबारी की व्यवस्था ठीक नहीं थी और न ही रोजगार की। जिसके चलते प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय 800 रुपए थी। गांव में जिन लोगों के पास जमीन थी, वे भी केवल एक ही फसल उगा पाते थे क्योंकि सिंचाई के लिए पानी का नितांत अभाव था। गांव में कुल मिलाकर 400 मि.मी. ही वर्षा होती थी। पोपट राव का कहना है कि हमलोगों ने सामूहिक रूप से इस विषय पर सोचना शुरू किया। पहले गांववाले वन विभाग द्वारा लगाए पौधों को काट कर अपने घर ले जाते थे। लेकिन जब ग्रामसभा ने तय किया कि जल, जंगल और जमीन के काम किए जाएंगे तो गांववालों ने 10 लाख पेड़ लगाए, जिसमें हमें 99 फीसदी सफलता प्राप्त हुई। अब इस जंगल में जाने के लिए वन विभाग को ग्रामसभा की अनुमति लेनी पड़ती है। पोपट राव के अनुसार 'शुरू में ग्रामसभा के कई निर्णयों का बहुत विरोध हुआ। लेकिन हमने जोर देकर कहा कि गांव के हित में यह निर्णय ठीक होगा और इसके दूरगामी परिणाम सामने आएंगे। जैसे कि टयूबवेलकृका कृषि में उपयोग नहीं किया जाएगा और ज्यादा पानी वाली फसलें नहीं लगाई जाएंगी। गन्ना केवल आधे एकड़ में ही लगाया जाएगा, जिसका हरे चारे के रूप में उपयोग किया जा सकता है। हम सबने मिलकर जलग्रहण के क्षेत्र में काम करनाष्शुरू किया। कुछ सरकारी राशि और कुछ श्रमदान। इसके परिणामस्वरूप तीन चार वर्षों में वॉटरष्शेड ने अपना असर दिखानाष्शुरू किया। गांव का भू-जल स्तर बढ़ा और मिट्टी में नमी बढ़ने लगी। लोग अब दूसरी और तीसरी फसल भी उगा रहे हैं। अब यहां सब्जी भी उगाई जाती है। इतना ही नहीं भूमिहीनों को गांव में ही काम मिलने लगा है और लोगों का पलायन भी बंद हो गया है।' गांव की ही मजदूर ताराबाई मारुति कहती है कि 'पहले हमलोग मजदूरी करने दूसरे गांव जाते थे। आज हमारे पास 16-17 गायें हैं और हम 250-300 लीटर दूध प्रतिदिन बेचते हैं। कुल मिलाकर पूरे गांव से लगभग 5000 लीटर दूध प्रतिदिन बेचा जाता है। आज गांव की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 800 रुपए से बढ़कर 28000 रुपए हो गई है। यानी पांच व्यक्तियों के परिवार की वार्षिक औसत आय 1.25 लाख रुपए है।
पूरे देश में आंगनवाड़ियों का जो हाल है, वह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन हिवरे बाजार की आंगनवाड़ी लगभग आधे एकड़ में फैली है। आंगनवाड़ी की दीवारें बोलती प्रतीत होती हैं। इसके आंगन में फिसल पट्टी लगी है। पर्याप्त खेल-खिलौने हैं। प्रत्येक बच्चे के लिए पोषाहार हेतु अलग-अलग बर्तन व स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था है। बच्चों का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण होता है। बच्चे कुपोषित नहीं हैं। गांववाले जानते हैं कि बच्चोें का मानसिक औरष्शारीरिक विकास 6 वर्ष की उम्र में ही होता है, इसलिए उनका मानना है कि आंगनवाड़ी बेहतर होनी चाहिए। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ईराबाई मारुति का कहना है कि जब इन बच्चों की जिम्मेवारी मेरे उपर है तो फिर मैं अपनी जिम्मेदारी से क्यों कतराऊं। अगर मैं कुछ भी गड़बड़ करती हूं तो मुझे ग्रामसभा में जवाब देना होता है। साथ ही वह बड़े गर्व से कहती है कि मेरी आंगनवाड़ी को केंद्र सरकार से सर्वश्रेष्ठ आंगनवाड़ी का पुरस्कार मिला है।
पोपट राव बताते हैं कि हमारे गांव में पहले से ही दो आंगनवाड़ी थी और ऊपर से तीसरी आंगनवाड़ी बनाने का आर्डर आया। हम लोगों ने ग्रामसभा में विचार किया कि हमारे यहां बच्चों कीे संख्या उतनी नहीं है कि तीसरी आंगनवाड़ी होनी चाहिए। फिर नए आंगनवाड़ी के लिए और अधिक संसाधन भी चाहिए। इसलिए हमने शासन को पत्र लिख कर तीसरी आंगनवाड़ीके प्रस्ताव को वापस लौटा दिया। इतना ही नहीं पहले बच्चों को पांचवीं के बाद से ही बाहर जाना पड़ता था, जिससे अधिकांश लड़कियां नहीं पढ़ पाती थीं। अब स्कूल हायर सेकेंड्री तक हो गया है। विद्यालय का समयष्शासन नहीं बल्कि ग्रामसभा तय करती है । विद्यालय में दोपहर का भोजन नियमित रूप से दिया जाता है। शिक्षिका शोभा थांगे का कहना है कि हम लोग ग्रीष्मकालीन अवकाश मेंभभी पढ़ाने आते हैं । यहां पढ़ाई किसी अच्छे प्राइवेट स्कूल से बेहतर होती है। यही कारण है कि आज हिवरे बाजार के ंविद्यालय में आसपास के गांव और शहरों से लगभग 40 प्रतिशत छात्र-छात्राएं पढ़ने आते हैं। गांव के सरपंच पोपट राव के अनुसार हमारे यहां शिक्षकों का ग्रामसभा में आना जरूरी है लेकिन चुनाव डयूटी में जाने की आवश्यकता नहीं है। हिवरे बाजार गांव में एएनएम आती नहीं है बल्कि यहीं रहती हैं। गांव के हर बच्चे का समय पर टीकाकरण होता है। प्रत्येक गर्भवती महिला को आयरन की गोलियां मुफ्त मिलती हैं।
गांव में राशन ग्रामसभा के निर्देशानुसार सबसे पहले प्रत्येक कार्डधारी को दिया जाता है। यदि उसके बाद भी राशन बच जाता है तो ग्रामसभा तय करती है कि इसका क्या होगा। राशन दुकान संचालक आबादास थांगे बहुत ही बेबाक तरीके से कहते हैं कि मुझे फूड इंस्पेक्टर को रिश्वत नहीं देनी होती है। पोपट राव कहते हैं कि अब बाहरी लोगों की नजर हमारी जमीन पर है। इसलिए हमने नियम बनाया कि हमारी जमीन गांव से बाहर के किसी व्यक्ति को नहीं बेची जाएगी। क्योंकि इससे गरीब हमेशा गरीब रहेगा और अमीर और अमीर हो जाएगा। इस गांव की खास बात यह है कि यहां एकमात्र मुसलिम परिवार के लिए भी मसजिद है, जिसे ग्रामसभा ने ही बनवाया है। सारे फैसले ग्राम संसद द्वारा लिए जाते हैं। इस ग्राम संसद की बनावट भी दिल्ली के संसद भवन की तरह है। सूचना के अधिकार जैसे कानूनों की यहां जरूरत ही महसूस नहीं होती। यहां पंचायत भवन में प्रतिमाह पैसों का पूरा लेखा-जोखा लिखकर टांग दिया जाता है। इतना ही नहीं साल के अंत में ग्रामसभा का पूरा ब्योरा गांववालों के सामने और बाहरी लोगों को बुलाकर बताया जाता है।
एक समय था जब इस गांव के नवयुवक यह बताने से डरते थे कि हम हिवरे बाजार के निवासी हैं। आज इस गांव के लोग गर्व से कहते हैं कि हम हिवरे बाजार के निवासी हैं। बाला साहेब रमेश ने तो अपने नाम के आगे 'हिवरे बाजार' लगा लिया है। आज इस गांव में न कोई शराब पीता है और ना ही यहां शराब बिकती है। हिवरे बाजार, न केवल गांधी के सपने को साकार करता है बल्कि घने अंधेरे में रोशनी की किरण भी दिखाता है। क्या वह दिन आयेगा जब देश के सात लाख गांवों में हिवरे बाजार की तरह अपना ग्राम स्वराज होगा?

बुधवार, 3 जून 2009

नहीं चला सिख फैक्टर

नहीं चला सिख फैक्टर
संजीव कुमार
इस बात में कोई दम नहीं है कि पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में कांग्रेस की जीत में सिख मतदाताओं का हाथ है। और न ही यह कहना सही होगा कि मनमोहन सिंह सिख मतदाताओं को रिझाने में कामयाब हुए हैं
लोकसभा चुनाव में जिस तरह कांग्रेस पार्टी को अकेले 206 सीटों पर विजय मिली है, उसे कुछ लोग राहुल का जादू तो कुछ लोग प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का चमत्कार मान रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक शायद पिछले विधानसभा चुनावोेंं में राहुल के रोड शो के बावजूद कांग्रेस पार्टी की हार के सिलसिले को भूल गए हैं। अब जहां तक बात प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के चमत्कार की है, तो इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि मनमोहन सिंह एक स्वच्छ छवि के नेता हैं। इसलिए पूरे देश की जनता उनका आदर और सम्मान करती है। कांग्रेस पार्टी ने चुनाव से पहले जिस तरह मनमोहन सिंह को दुबारा प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा की, इसे निश्चय ही पार्टी और सोनिया गांधी की दूरदर्शी सोच का परिणाम कहा जा सकता है। इस घोषणा से कांग्रेस के कुछ वोट अवश्य ही बढ़े हाेंगे, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन कुछ राजनीतिक पंडितों का मानना है कि कांग्रेस पार्टी को पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सिख होने के कारण जीत मिली है। हालांकि इन राज्यों में सिख फैक्टर उतना कामयाब नहीं रहा जितना कि राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं।
पंजाब, मनमोहन सिंह का गृह राज्य है। साथ ही देश का एकमात्र सिख बहुल प्रदेश है। लेकिन प्रदेश में कांग्रेस इस तथ्य को भुनाने में विफल रही कि मनमोहन सिंह देश के पहले सिख प्रधानमंत्री हैं। प्रदेश कांग्रेस ने भी इसके बजाय चुनाव में राज्य के स्थानीय मुद्दों को ही प्राथमिकता दी। एक वरिष्ठ कांग्रेसी विधायक ने नाम न लेने की शर्त पर कहा ''इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे सिख हैं और उनकी जड़ें पंजाब में हैं लेकिन उन्होंने पंजाब में कोई राजनीति नहीं की है। यद्यपि सिख समुदाय यह मान रहा था कि कांग्रेस ने एक सिख को पहली बार देश का प्रधानमंत्री बनाया और दूसरी बार भी बनाने को इच्छुक है। इसके बावजूद सिख समुदाय के एक छोटे वर्ग ने ही इस वजह से वोट दिया।
उनके मुताबिक, 'राज्य में शिरोमणी अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी सरकार के कुशासन से जुड़े कई मुद्दे थे।' पंजाब में कांग्रेस की जीत की वजह यही है। प्रदेश के एक किसान जसवंत सिंह ने कहा कि मनमोहन सिंह एक प्रसिध्द व्यक्ति हैं। प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने अच्छा काम भी किया है, लेकिन पंजाब के लोग स्थानीय मुद्दों के बारे में सोचते हैं। अगर इनकी बात पर यकीन करें तो पंजाब में कांग्रेस की जीत और अकाली दल की हार में मनमोहन सिंह के सिख फैक्टर की जगह एंटी-इनकमबेंसी प्रमुख कारण रहा है। पंजाब में अकाली दल और भाजपा गठबंधन ने कांग्रेस के आठ सीटों की तुलना में पांच सीटें पाई हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में राज्य की 13 में से 11 सीटों पर अकाली दल-भाजपा गठबंधन का कब्जा था। गौरतलब है कि तब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। वैसे भी इस बार यह कोई नहीं मान रहा था कि अकाली दल-भाजपा गठबंधन को 11 सीटें मिलेंगी। हुआ भी वही। गठबंधन को यहां 6 सीटों का नुकसान हुआ है। गठबंधन के हार का एक अन्य कारण यह भी रहा कि अकाली दल और भाजपा गठबंधन ने इस लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारों का चयन ठीक तरीके से नहीं किया। इसके अलावा अकाली दल और भाजपा की आपसी कलह भी इस पराजय का कारण बनी। अगर अकाली दल और भाजपा आपसी मनमुटाव को भूलकर एकजुटता से चुनाव लड़ते और सही उम्मीदवारों का चयन करते तो चुनाव परिणाम उनके पक्ष में भी जा सकते थे। इसके अलावा 84 के सिख दंगे के आरोपी कांग्रेस नेता जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को टिकट दिए जाने और सीबीआई की ओर से उन्हें क्लीन चिट देने पर सिख समुदाय के बीच उभरे आक्रोश का भी अकाली दल और भाजपा फायदा नहीं उठा सके। हालांकि कांग्रेस पार्टी ने सिख समुदाय के विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए इन दोनों नेताओं का टिकट वापस ले लिया था।
हरियाणा में कांग्रेस की विजय का प्रमुख कारण भूपेंद्र सिंह हुड्डा द्वारा किया गया विकास कार्य रहा। इसके अलावा उनकी विनम्रता और स्वच्छ छवि ओमप्रकाश चौटाला की इनेलो और भाजपा पर भारी पड़ी। वैसे हरियाण्ाा प्रदेश कांग्रेस के विधायकों और मंत्रियों में भी आपसी फूट थी, लेकिन इनेलो और भाजपा इसका कोई फायदा नहीं उठा सके। साथ ही यहां भाजपा-इनेलो गठबंधन एंटी-इनकमबेंसी फैक्टर को भी अपने पक्ष में नहीं भुना सका। कांग्रेस को वैसे तो नौ सीटें मिलीं लेकिन हुड्डा अंबाला, भिवानी, महेंद्रगढ़, गुड़गांव और फरीदाबाद की पांच संसदीय सीटों से अपने विधायकों-मंत्रियों के भितरघात के बावजूद पार्टी उम्मीदवारों को जिताने में कामयाब रहे।
हरियाणा जाट बहुल राज्य है। यहां सिख मतदाता दो प्रतिशत के आस-पास हैं। यह संख्या चुनाव में कुछ ज्यादा उलट-फेर नहीं कर सकती। फिर भी सिख समुदाय का एक वर्ग मनमोहन सिंह के नाम पर कांग्रेस के पक्ष में गया इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता। लोकसभा चुनाव के बाबत हरियाणा प्रदेश कांग्रेस के एक विधायक का कहना था कि हरियाणा में कांग्रेस की जीत विकास की जीत है। दस में से नौ सीटों पर कांग्रेस को जीत दिलाकर जनता ने मुख्यमंत्री हुड्डा और प्रदेश कांग्रेस के हाथ मजबूत किए हैं। एक सरकारी कर्मचारी सुरेश सिंह का भी कहना है कि हरियाणा में कांग्रेस की जीत हुड्डा द्वारा किए गए विकास कार्यों की जीत है।
जहां तक दिल्ली में कांग्रेस की जीत का सवाल है तो यहां पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में मिली विजय से कार्यकर्ताओं के मनोबल ऊंचे थे। दूसरे दिल्ली के अधिकतर मतदाता के लिए असली मुद्दा विकास का था। इस मापदंड पर कांग्रेस पार्टी लोगों को खरी उतरती दी। इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने विकास और निर्माण के मुद्दे पर ही वोट मांगा था। दूसरे चुनाव से पहले मनमोहन सिंह को दुबारा प्रधानमंत्री बनाने का भी वायदा किया गया था। इन दोनों ही बातों से दिल्ली की मतदाता को अपना निर्णय लेने में सुविधा हुई।
दूसरी तरफ भाजपा ने विधानसभा चुनाव के बाद यह जानते हुए कि पांच महीने बाद लोकसभा चुनाव होने हैं, डॉ. हर्षवर्धन को हटाकर ओ.पी. कोहली को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। हर्षवर्धन को हटाने से प्रदेश कार्यकर्ताओं में गलत संदेश गया। वहीं ओ.पी. कोहली को प्रदेश में भाजपा का हाथ मजबूत करने के लिए अभी वक्त चाहिए था। जो इस चुनाव में उनके पास नहीं था। विजय कुमार मल्होत्रा को केंद्र से हटाकर राज्य में लाने का भी भाजपा को कोई विशेष फायदा नहीं हुआ। अगर इस लोकसभा चुनाव में विजय कुमार मल्होत्रा नई दिल्ली से चुनाव लड़ते तो कम से कम एक सीट तो भाजपा को मिल ही सकती थी। वहीं साहिब सिंह वर्मा के पुत्र प्रवेश वर्मा को न विधानसभा चुनाव न ही लोकसभा चुनाव में टिकट दिए जाने से जाट मतदाता भी भाजपा के विरोध में चला गया। इसके अलावा भाजपा द्वारा सही उम्मीदवारों का चयन न कर पाना भी उसकी हार का कारण बना। दिल्ली में पूर्वांचली मतदाताओं की संख्या बढ़ी है। कांग्रेस पार्टी ने इस बात का ध्यान रखते हुए पूर्वांचल के महाबल मिश्रा को टिकट दिया था। लेकिन भाजपा ने पूर्वांचलियों को टिकट नहीं दिया। कांग्रेस पार्टी का विधानसभा चुनाव में जहां जीत का अंतर काफी कम था, भाजपा की इन कारगुजारियों के चलते उसका इस लोकसभा चुनाव में जीत का अंतर अधिक हो गया।
जहां तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सिख वोटरों के संबंध का सवाल है तो अधिकतर सिख मतदाता चुनाव से ठीक पहले सीबीआई द्वारा 84 के सिख विरोधी दंगे के आरोपी जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को क्लीन चिट दिए जाने से नाराज थे। लेकिन दिल्ली प्रदेश भाजपा इसको ठीक से भुना नहीं सकी। परिसीमन ने दिल्ली की सातों सीटों का भूगोल भी बदला है जिस कारण सातों सीटों चांदनी चौक, उत्तरी-पूर्वी दिल्ली, पूर्वी दिल्ली, नई दिल्ली, उत्तरी-पश्चिमी दिल्ली, पश्चिमी दिल्ली और दक्षिणी दिल्ली में सिख मतदाताओं का प्रतिशत क्रमश: 3.94 प्रतिशत, 1.20 प्रतिशत, 3 प्रतिशत, 4 प्रतिशत, 2 प्रतिशत, 9 प्रतिशत और 2 प्रतिशत हो गया है। सिर्फ पश्चिमी दिल्ली ही एक ऐसा संसदीय क्षेत्र है, जहां सिख मतदाताओं का महत्व है। लेकिन इसमें से कितने मत मनमोहन सिंह के कारण कांग्रेस के पाले में गए हाेंगे कहना मुश्किल है।
लेकिन जो लोग यह मानते हैं कि कांग्रेस की इस विजय में मनमोहन सिंह सूत्रधार बने हैं उनके लिए पंजाब के तथ्य काफी अहम हैं क्योंकि यहां वे सभी कांग्रेसी उम्मीदवार हार गए जिन्होंने अपने क्षेत्र में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सभा रखी थी। यह महज एक संयोग भी हो सकता है लेकिन एक तथ्य तो है ही। इस बात में कोई दम नहीं है कि पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में कांग्रेस की जीत में सिख मतदाताओं का हाथ है। और न ही यह कहना सही होगा कि मनमोहन सिंह सिख मतदाताओं को रिझाने में कामयाब हुए हैं।