नहीं चला सिख फैक्टर
संजीव कुमार
इस बात में कोई दम नहीं है कि पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में कांग्रेस की जीत में सिख मतदाताओं का हाथ है। और न ही यह कहना सही होगा कि मनमोहन सिंह सिख मतदाताओं को रिझाने में कामयाब हुए हैं
लोकसभा चुनाव में जिस तरह कांग्रेस पार्टी को अकेले 206 सीटों पर विजय मिली है, उसे कुछ लोग राहुल का जादू तो कुछ लोग प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का चमत्कार मान रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक शायद पिछले विधानसभा चुनावोेंं में राहुल के रोड शो के बावजूद कांग्रेस पार्टी की हार के सिलसिले को भूल गए हैं। अब जहां तक बात प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के चमत्कार की है, तो इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि मनमोहन सिंह एक स्वच्छ छवि के नेता हैं। इसलिए पूरे देश की जनता उनका आदर और सम्मान करती है। कांग्रेस पार्टी ने चुनाव से पहले जिस तरह मनमोहन सिंह को दुबारा प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा की, इसे निश्चय ही पार्टी और सोनिया गांधी की दूरदर्शी सोच का परिणाम कहा जा सकता है। इस घोषणा से कांग्रेस के कुछ वोट अवश्य ही बढ़े हाेंगे, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन कुछ राजनीतिक पंडितों का मानना है कि कांग्रेस पार्टी को पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सिख होने के कारण जीत मिली है। हालांकि इन राज्यों में सिख फैक्टर उतना कामयाब नहीं रहा जितना कि राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं।
पंजाब, मनमोहन सिंह का गृह राज्य है। साथ ही देश का एकमात्र सिख बहुल प्रदेश है। लेकिन प्रदेश में कांग्रेस इस तथ्य को भुनाने में विफल रही कि मनमोहन सिंह देश के पहले सिख प्रधानमंत्री हैं। प्रदेश कांग्रेस ने भी इसके बजाय चुनाव में राज्य के स्थानीय मुद्दों को ही प्राथमिकता दी। एक वरिष्ठ कांग्रेसी विधायक ने नाम न लेने की शर्त पर कहा ''इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे सिख हैं और उनकी जड़ें पंजाब में हैं लेकिन उन्होंने पंजाब में कोई राजनीति नहीं की है। यद्यपि सिख समुदाय यह मान रहा था कि कांग्रेस ने एक सिख को पहली बार देश का प्रधानमंत्री बनाया और दूसरी बार भी बनाने को इच्छुक है। इसके बावजूद सिख समुदाय के एक छोटे वर्ग ने ही इस वजह से वोट दिया।
उनके मुताबिक, 'राज्य में शिरोमणी अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी सरकार के कुशासन से जुड़े कई मुद्दे थे।' पंजाब में कांग्रेस की जीत की वजह यही है। प्रदेश के एक किसान जसवंत सिंह ने कहा कि मनमोहन सिंह एक प्रसिध्द व्यक्ति हैं। प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने अच्छा काम भी किया है, लेकिन पंजाब के लोग स्थानीय मुद्दों के बारे में सोचते हैं। अगर इनकी बात पर यकीन करें तो पंजाब में कांग्रेस की जीत और अकाली दल की हार में मनमोहन सिंह के सिख फैक्टर की जगह एंटी-इनकमबेंसी प्रमुख कारण रहा है। पंजाब में अकाली दल और भाजपा गठबंधन ने कांग्रेस के आठ सीटों की तुलना में पांच सीटें पाई हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में राज्य की 13 में से 11 सीटों पर अकाली दल-भाजपा गठबंधन का कब्जा था। गौरतलब है कि तब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। वैसे भी इस बार यह कोई नहीं मान रहा था कि अकाली दल-भाजपा गठबंधन को 11 सीटें मिलेंगी। हुआ भी वही। गठबंधन को यहां 6 सीटों का नुकसान हुआ है। गठबंधन के हार का एक अन्य कारण यह भी रहा कि अकाली दल और भाजपा गठबंधन ने इस लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारों का चयन ठीक तरीके से नहीं किया। इसके अलावा अकाली दल और भाजपा की आपसी कलह भी इस पराजय का कारण बनी। अगर अकाली दल और भाजपा आपसी मनमुटाव को भूलकर एकजुटता से चुनाव लड़ते और सही उम्मीदवारों का चयन करते तो चुनाव परिणाम उनके पक्ष में भी जा सकते थे। इसके अलावा 84 के सिख दंगे के आरोपी कांग्रेस नेता जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को टिकट दिए जाने और सीबीआई की ओर से उन्हें क्लीन चिट देने पर सिख समुदाय के बीच उभरे आक्रोश का भी अकाली दल और भाजपा फायदा नहीं उठा सके। हालांकि कांग्रेस पार्टी ने सिख समुदाय के विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए इन दोनों नेताओं का टिकट वापस ले लिया था।
हरियाणा में कांग्रेस की विजय का प्रमुख कारण भूपेंद्र सिंह हुड्डा द्वारा किया गया विकास कार्य रहा। इसके अलावा उनकी विनम्रता और स्वच्छ छवि ओमप्रकाश चौटाला की इनेलो और भाजपा पर भारी पड़ी। वैसे हरियाण्ाा प्रदेश कांग्रेस के विधायकों और मंत्रियों में भी आपसी फूट थी, लेकिन इनेलो और भाजपा इसका कोई फायदा नहीं उठा सके। साथ ही यहां भाजपा-इनेलो गठबंधन एंटी-इनकमबेंसी फैक्टर को भी अपने पक्ष में नहीं भुना सका। कांग्रेस को वैसे तो नौ सीटें मिलीं लेकिन हुड्डा अंबाला, भिवानी, महेंद्रगढ़, गुड़गांव और फरीदाबाद की पांच संसदीय सीटों से अपने विधायकों-मंत्रियों के भितरघात के बावजूद पार्टी उम्मीदवारों को जिताने में कामयाब रहे।
हरियाणा जाट बहुल राज्य है। यहां सिख मतदाता दो प्रतिशत के आस-पास हैं। यह संख्या चुनाव में कुछ ज्यादा उलट-फेर नहीं कर सकती। फिर भी सिख समुदाय का एक वर्ग मनमोहन सिंह के नाम पर कांग्रेस के पक्ष में गया इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता। लोकसभा चुनाव के बाबत हरियाणा प्रदेश कांग्रेस के एक विधायक का कहना था कि हरियाणा में कांग्रेस की जीत विकास की जीत है। दस में से नौ सीटों पर कांग्रेस को जीत दिलाकर जनता ने मुख्यमंत्री हुड्डा और प्रदेश कांग्रेस के हाथ मजबूत किए हैं। एक सरकारी कर्मचारी सुरेश सिंह का भी कहना है कि हरियाणा में कांग्रेस की जीत हुड्डा द्वारा किए गए विकास कार्यों की जीत है।
जहां तक दिल्ली में कांग्रेस की जीत का सवाल है तो यहां पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में मिली विजय से कार्यकर्ताओं के मनोबल ऊंचे थे। दूसरे दिल्ली के अधिकतर मतदाता के लिए असली मुद्दा विकास का था। इस मापदंड पर कांग्रेस पार्टी लोगों को खरी उतरती दी। इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने विकास और निर्माण के मुद्दे पर ही वोट मांगा था। दूसरे चुनाव से पहले मनमोहन सिंह को दुबारा प्रधानमंत्री बनाने का भी वायदा किया गया था। इन दोनों ही बातों से दिल्ली की मतदाता को अपना निर्णय लेने में सुविधा हुई।
दूसरी तरफ भाजपा ने विधानसभा चुनाव के बाद यह जानते हुए कि पांच महीने बाद लोकसभा चुनाव होने हैं, डॉ. हर्षवर्धन को हटाकर ओ.पी. कोहली को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। हर्षवर्धन को हटाने से प्रदेश कार्यकर्ताओं में गलत संदेश गया। वहीं ओ.पी. कोहली को प्रदेश में भाजपा का हाथ मजबूत करने के लिए अभी वक्त चाहिए था। जो इस चुनाव में उनके पास नहीं था। विजय कुमार मल्होत्रा को केंद्र से हटाकर राज्य में लाने का भी भाजपा को कोई विशेष फायदा नहीं हुआ। अगर इस लोकसभा चुनाव में विजय कुमार मल्होत्रा नई दिल्ली से चुनाव लड़ते तो कम से कम एक सीट तो भाजपा को मिल ही सकती थी। वहीं साहिब सिंह वर्मा के पुत्र प्रवेश वर्मा को न विधानसभा चुनाव न ही लोकसभा चुनाव में टिकट दिए जाने से जाट मतदाता भी भाजपा के विरोध में चला गया। इसके अलावा भाजपा द्वारा सही उम्मीदवारों का चयन न कर पाना भी उसकी हार का कारण बना। दिल्ली में पूर्वांचली मतदाताओं की संख्या बढ़ी है। कांग्रेस पार्टी ने इस बात का ध्यान रखते हुए पूर्वांचल के महाबल मिश्रा को टिकट दिया था। लेकिन भाजपा ने पूर्वांचलियों को टिकट नहीं दिया। कांग्रेस पार्टी का विधानसभा चुनाव में जहां जीत का अंतर काफी कम था, भाजपा की इन कारगुजारियों के चलते उसका इस लोकसभा चुनाव में जीत का अंतर अधिक हो गया।
जहां तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सिख वोटरों के संबंध का सवाल है तो अधिकतर सिख मतदाता चुनाव से ठीक पहले सीबीआई द्वारा 84 के सिख विरोधी दंगे के आरोपी जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को क्लीन चिट दिए जाने से नाराज थे। लेकिन दिल्ली प्रदेश भाजपा इसको ठीक से भुना नहीं सकी। परिसीमन ने दिल्ली की सातों सीटों का भूगोल भी बदला है जिस कारण सातों सीटों चांदनी चौक, उत्तरी-पूर्वी दिल्ली, पूर्वी दिल्ली, नई दिल्ली, उत्तरी-पश्चिमी दिल्ली, पश्चिमी दिल्ली और दक्षिणी दिल्ली में सिख मतदाताओं का प्रतिशत क्रमश: 3.94 प्रतिशत, 1.20 प्रतिशत, 3 प्रतिशत, 4 प्रतिशत, 2 प्रतिशत, 9 प्रतिशत और 2 प्रतिशत हो गया है। सिर्फ पश्चिमी दिल्ली ही एक ऐसा संसदीय क्षेत्र है, जहां सिख मतदाताओं का महत्व है। लेकिन इसमें से कितने मत मनमोहन सिंह के कारण कांग्रेस के पाले में गए हाेंगे कहना मुश्किल है।
लेकिन जो लोग यह मानते हैं कि कांग्रेस की इस विजय में मनमोहन सिंह सूत्रधार बने हैं उनके लिए पंजाब के तथ्य काफी अहम हैं क्योंकि यहां वे सभी कांग्रेसी उम्मीदवार हार गए जिन्होंने अपने क्षेत्र में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सभा रखी थी। यह महज एक संयोग भी हो सकता है लेकिन एक तथ्य तो है ही। इस बात में कोई दम नहीं है कि पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में कांग्रेस की जीत में सिख मतदाताओं का हाथ है। और न ही यह कहना सही होगा कि मनमोहन सिंह सिख मतदाताओं को रिझाने में कामयाब हुए हैं।
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