शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

क्या दिल्ली में दूसरा भोपाल गैस कांड होगा?

संजीव कुमार
भोपाल गैस त्रासदी अभी हम भूले नहीं हैं। बिना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की मंजूरी के ओखला बिजली संयंत्र चालू हो गया है। वहीं नरेला-बवाना और गाजीपुर में बिजली संयंत्र निर्माणाधीन है। अगर यह तीनों बिजली परियोजनाएं दिल्ली में बनी तो भोपाल जैसा दूसरा हादसा दिल्ली में भी हो सकता है
 

बिना किसी तकनीकी जांच और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मंजूरी के बिना चीन की कचरा से बिजली बनाने वाली तकनीक से दिल्ली के ओखला स्थित संयंत्र में बिजली बनाई जा रही है। इस तरह कचरा जलाकर बिजली बनाने में डाईऑक्सीन नामक खतरनाक गैस निकलती है। दुर्भाग्य यह है कि इस दुष्प्रभाव को जानते हुए भी दिल्ली सरकार दिल्ली वासियों और संयंत्र के मजदूरों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। इसका खुलासा 22 मार्च,२2012 को आए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण आयोग के एक रिपोर्ट से हुआ है। वहीं हाल ही में पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन का कहना है कि ओखला का कचरा से बिजली बनाने वाली संयंत्र पूरी तरह सुरक्षित है। ऐसे में जनता किसकी बातों पर भरोसा करे- पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन की बातों पर या केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण आयोग की रिपोर्ट पर?
कंेद्रीय प्रदूषण नियंत्रण आयोग की इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है की कचरा आधारित बिजली संयंत्र से होने वाली त्रासदी के लिए अबतक दिल्ली सरकार ने कोई तैयारी नहीं की है। भोपाल गैस कांड इसका उदाहरण है। इस बाबत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण आयोग ने ओखला बिजली संयंत्र के जिंदल एकोपोलिस कंपनी के अधिकारियों की कड़ी आलोचना की है। आश्चर्य तो यह है कि कंेद्रीय प्रदूषण नियंत्रण आयोग की रिपोर्ट आने से पहले (जनवरी माह से) ही इस बिजली संयंत्र का चालू होना, कई सवाल खड़े करता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण आयोग की रिपोर्ट के बिना यह संयंत्र चालू कैसे हो गया? दूसरा आयोग की रिपोर्ट इतनी देर से क्यों आई? ऐसे कई गंभीर सवाल सरकार पर भी खड़े होते हैं।
बताते चलें कि कूड़े जलाने से जो गैस निकलती है वह जीवन व पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक है। यही कारण है कि सभी विकसित देशों ने अपने यहां ऐसी परियोजनाओं को बंद कर चुकी है। गौरतलब है कि भारत में पहली बार दिल्ली के तिमारपुर में कचरा से बिजली बनाने की परियोजना 1990 में लगाया गया जो असफल रहा। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या हमारे पास वैसी तकनीक है जो कचरे से सुरक्षित बिजली पैदा कर सके? अगर नहीं तो दिल्ली वासियों के जान जोखिम में डालकर इस चीनी तकनीक से बिजली पैदा करने की क्या आवश्यकता है? बताते चलें कि ओखला के अलावा ऐसा ही बिजली संयंत्र दिल्ली के नरेला-बवाना और गाजीपुर में निर्माणाधीन है।
यही वजह है कि पर्यावरण मंत्रालय ने 1997 में जारी अपने श्वेत पत्र में यह बात स्वीकार की है कि जिस तरीके से शहरी कूड़े को जलाया जा रहा है वह तकनीक सही नहीं है। यहीं सवाल यह उठता है कि अब वह तकनीक सही कैसे हो गया? दूसरी तरफ सन् 2005 में संसदीय समिति ऊर्जा के अध्यक्ष रहे गुरूदास कामत ने कूड़े से बिजली बनाने का यह कहते हुए विरोध किया था कि इस प्रकार की तकनीक नुकसान दायक है। इसलिए इसे बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। वहीं भारतीय जनता पार्टी के दिल्ली विधान सभा में विपक्ष के नेता विजय कुमार मलहोत्रा ने सांसद रहते हुए 27 जून, 2008 को दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर तेजेंदर खन्ना को एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने ओखला प्लांट कोे वहां के वासियों के लिए प्रदूषणकारी बताया था। अब भाजपा के विजन डाक्यूमेंट 2025 में दो और कूड़े से बिजली बनाने वाली संयंत्र बनाने का वादा है। क्या अब यह नुकसानदायक नहीं रही? या विजय कुमार मलहोत्रा सत्ता मोह में इस बात को भूल गए हैं।
इताना ही नहीं तत्कालीन पर्यावरण राज्य मंत्री जयराम रमेश ने भी इस बाबत दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को 1 अप्रैल 2011 को एक पत्र लिखा था। उस पत्र में जयराम रमेश ने ओखला बिजली संयंत्र को खतरनाक बताते हुए लिखा था कि इस तरह के संयंत्रों के पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया में ही गड़बड़ी है। प्रक्रिया में गड़बड़ी भी सरकार के मंशा को बताता है कि कैसे पर्यावरण और स्वस्थ्य के लिए नुकसान दायक होते हुए इस परियोजना की मंजूरी दी गई?  कहने का अर्थ यह है कि दिल्ली सरकार भी इस परियोजना के नुकसान दायक पहलुओं को अनदेखा कर रही है। स्पष्ट है, दोनों पार्टियां सत्तालोलुप है। इसलिए उन्हें दिल्ली की जनता की स्वास्थ्य से ज्यादा उन्हें अपनी कुर्सी चिंता सता रही है।
बताते चलें कि ऐसे बिजलीघर न तो कूड़ा निपटाने के लिए बनते हैं और न ही बिजली पैदा करने के लिए। इसके पीछे का कारण कुछ और ही है। इसके अनेक कारणों में से एक कारण यह है कि प्रति मेगावाट की दर से केंद्र सरकार बिजली बनाने वाली कंपनी को डेढ़ करोड़ का अनुदान देती है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी योजनाआंे को अनुदान देने पर रोक लगा रखी है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन कर केंद्र सरकार इस कंपनी को अनुदान दे रही है। इस तरह कंेद्र सरकार भी सवालों के कटघरे में है। टॉक्सिक वॉच के संस्थापक गोपल कृष्ण के अनुसार, ‘‘सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन जिंदल जैसी कंपनियों को अनुदान दे रही है। ऐसे संयंत्रों को तुरंत बंद किया जाना चाहिए। अन्यथा हमें दूसरे भोपाल गैस कांड के लिए तैयार रहना चाहिए।’’   
दूसरी तरफ यह परियोजना कचरा आधारित रोजगार को भी समाप्त करता है। दिल्ली को रौशन करने के नाम पर इस परियोजना को हरी झंडी दिया गया है। गौरतलब है कि दिल्ली में लगभग 80 प्रतिशत क्षेत्र के काम को प्राइवेट कंपनी के हाथों में सौंप दिया गया है लेकिन उसके बावजूद भी समस्या का हल नहीं हो पा रहा है।
बताते चलें कि दिल्ली में कचरे की छंटाई के काम में असंगठित क्षेत्र के लगभग 3.5 लाख मजदूर शामिल हैं। इनके द्वारा 20 से 25 प्रतिशत कचरे की छंटाई के बाद 30 प्रतिशत ऐसे कचरे की छंटाई हो जाएगी जो कच्चे माल के रूप में दुबारा इस्तेमाल होगा। साथ ही 50 प्रतिशत वैसा कचरा होगा जिसे जैविक कूड़ा कहते हैं। उससे खाद बनाया जा सकता है। इस तरह कचरे के 80 प्रतिशत भाग का निपटारा तो समुदाय के स्तर पर ही हो सकता है। ऐसे में कूड़े से बिजली बनानेवाली संयंत्र लगाने की आवश्यकता लगभग नहीं है।

कौन-कौन से हैं संयत्र
संयंत्र         कूड़ा         बिजली उत्पादन    स्थिति
ओखला    2050 मेट्रिक टन    20 मेगावाट     चालू है
नरेला-बवाना 4000 मेट्रिक टन   36 मेगावाट     निर्माणाधीन
गाजीपुर     1300 मेट्रिक टन   10 मेगावाट      निर्माणाधीन

इस परियोजना से हानि
कचरे जलाने से डाईऑक्सीन नाम गैस निकलती है। यह कैंसर के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक रसायन है। कचरे में मौजूद खतरनाक रसायनों को यह तकनीक कई-कई रूपों में वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और पर्यावरण प्रदूषण से हमारे भोजन चक्र का हिस्सा बना देता है। यह जहर केवल धरती या पानी में ही नहीं बल्कि हवा में भी तैरने लगता है। क्योंकि शहरी कूड़े में प्लास्टिक के अलावा पारा भी बहुतायत में मिलता हैं। वैज्ञानिक और व्यावसायिक बुद्धि को किनारे रख दें तो भी क्या हमें यह समझने में दिक्कत है कि प्लास्टिक और पारा के जलने से जो धुंआ निकलता है क्या वह हमारे लिए लाभदायक है?

नजीर पेश करता मणिपुर

संजीव कुमार
विधानसभा चुनाव 2012 के परिणाम कई मामलों में भिन्न है। जनजागरण के बावजूद नव निर्वाचित 690 विधायकों में से 242 माननीय अपराधी छवि वाले और 457 करोड़पति विधायक विधानसभा पहुंच गए हैं। वहीं मणिपुर देश का इकलौता राज्य है जिसके सभी 60 विधायक बेदाग हैं। इस तरह मणिपुर पूरे देश के सामने एक नजीर पेश करता है
विधानसभा चुनाव 2012 के परिणाम आ चुके हैं। सभी पांचों राज्यों में सरकार बन चुकी है। और सदन में सभी नव निर्वाचित विधायक सूबे और जनता की सेवा का शपथ ले चुके हैं। सूबे और जनता की कितनी सेवा करेंगे यह तो आगामी पांच सालों में पता चलेगा। क्योंकि अब यही नव निर्वाचित माननीय अगले पांच सालों तक अपने सूबे में जनता के भाग्य का फैसला करेंगे। गत वर्ष भ्रष्टाचार के खिलाफ जनजागरण का जो बिगुल बजा था। उस बिगुल का कितना असर हुआ? अन्ना टीम और बाबा रामदेव सहित कई प्रमुख संगठनों व लोगों ने इस जनजागरण यज्ञ में अपने हिसाब से जो आहुति दी। इस जनजागरण से लोगों ने कितना सीखा और कितना अपने जीवन में उतारा। अब इसके आकलन का समय है। क्योंकि बीते एक महीने में जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं उन राज्यों की जनता के लिए यह सोचने-विचारने और कुछ करने का समय था। अब उनने क्या किया इस पर बात करने का मौका है। जिन पांचों राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं, वे हैं- उत्तराखंड (70), उत्तर प्रदेश (403), पंजाब (117), गोवा (40) और मणिपुर (60)। इन पांचों राज्यों में कुल 690 माननीय चुने गए हैं। एडीआर और नेशनल इलेक्शन वॉच ने इन सभी नव निर्वाचित विधायकों के हलफनामों का विश्लेषण किया है, जो इन लोगों ने अपना पर्चा दाखिल करते समय चुनाव आयोग को दिए थे। विश्लेषण के अनुसार, नव निर्वाचित 690 विधायकों में से 242 विधायकों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले होने की बात स्वीकार की है। कहने का तात्पर्य यह है कि नव निर्वाचित विधायकों में 35 प्रतिशत विधायक ऐसे हैं जिनके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। वहीं 690 माननीय विधायकों में से 114 विधायक ऐसे हैं जिनके खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास और बलात्कार जैसे गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं।
आपराधिक मामलों वाले विधायकों के मामले में उत्तर प्रदेश शीर्ष पर है। उत्तर प्रदेश के 403 नव निर्वाचित विधायकों में से 189 विधायकों (47 प्रतिशत) के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। वहीं 98 विधायक (24 प्रतिशत) ऐसे हैं जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले चले रहे हैं। इस मामले में गोवा का स्थान दूसरा है। गोवा के 40 नव निर्वाचित विधायकों में से 12 विधायकों (30 प्रतिशत) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले लंबित होने की बात स्वीकार की है। वहीं 3 विधायक (8 प्रतिशत) ऐसे हैं जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं। इस मामले में उत्तराखंड तीसरे नंबर पर है। जहां 70 नव निर्वाचित विधायकों में से 19 विधायकों (27 प्रतिशत) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले होने की बात चुनाव आयोग को बताई है। वहीं 5 विधायक ऐसे हैं जिन्होंने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले लंबित होने की बात की है। इस मामले में चौथे नंबर पर पंजाब है। जहां 117 नव निर्वाचित विधायकों में से 22 विधायकों (19 प्रतिशत) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले होने की बात चुनाव आयोग को बताई है। वहीं 8 विधायक (7 प्रतिशत) ऐसे हैं जिनके खिलाफ हत्या, बलात्कार, फिरौती जैसे गंभीर आपराधिक मामले लंबित है।
वहीं दूसरी तरफ मणिपुर एक ऐसा राज्य है जिसने सभी राज्यों के राजनीतिक दलों और जनता के लिए एक नजीर पेश किया है। इन पांच राज्यों में मणिपुर इकलौता ऐसा राज्य है जिसके सभी 60 विधायक बेदाग हैं। कहने का अर्थ यह है कि मणिपुर के नव निर्वाचित विधायकों में से एक भी विधायक ऐसा नहीं है जिस पर कोई आपराधिक मामला दर्ज हो। कहने की आवश्यकता नहीं है कि मणिपुर का चुनाव परिणाम यह बताता है कि हौसला और जज्बा हो तो कुछ भी संभव है। जनता अगर चाह ले तो अपराधी और भ्रष्टाचारी को सदन के बाहर बिठा सकती है। मणिपुर की जनता ने यह करके दिखाया है। यह निश्चय ही संतोष जनक है। मणिपुर के अलावा अन्य राज्यों में अभी और जनजागरण की आवश्यकता है। क्योंकि अन्य राज्यों से कुछ ऐसे अपराधी छवि के विधायक चुनकर आ गए हैं जिन्हें चुनकर नहीं आना चाहिए था। ऐसे में हमें मणिपुर से सीख लेते हुए और बेहतर करने की कोशिश करनी चाहिए।
आधे से अधिक हैं करोड़पति विधायक
जहां तक करोड़पति विधायकों की बात है तो पांचों राज्यों के 690 नव निर्वाचित विधायकों में से 457 विधायक करोड़पति हैं। कहने का अर्थ यह है कि नव निर्वाचित विधायकों में से 66 प्रतिशत विधायक ऐसे हैं जिन्होंने चुनाव आयोग को दिए अपने हलफनामे अपने को करोड़पति बताया है। इस मामले में गोवा शीर्ष पर है। गोवा के 40 में से 37 नव निर्वाचित (93 प्रतिशत) विधायक करोड़पति हैं। पंजाब इस मामले में दूसरे नंबर पर है। पंजाब के 117 में से 101 नव निर्वाचित (86 प्रतिशत) विधायकों ने अपने आप को करोड़पति बताया है। इस मामले में उत्तर प्रदेश तीसरे नंबर पर है। उत्तर प्रदेश के 403 में से 271 नव निर्वाचित (67 प्रतिशत) विधायक करोड़ति हैं। चौथे नंबर पर उत्तराखंड है। उत्तराखंड के 70 में से 32 नव निर्वाचित (67 प्रतिशत) विधायकों ने अपने को करोड़पति बताया है। करोड़पति विधायकों के मामले में मणिपुर पांचवें नंबर है। मणिपुर के 60 में से 16 विधायक करोड़पति हैं। कहने अर्थ यह है कि मणिपुर के 27 प्रतिशत विधायक ऐसे हैं जिन्होंने अपने आप को करोड़पति घोषित किया है।
हाशिए पर महिलाएं
हम एक तरफ महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं लेकिन जब महिला को सशक्त बनाने की बात आती है तो इस पर ध्यान नहीं देते हैं। बीते पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम से भी यह बात सिद्ध होती है। क्योंकि इन राज्यों में कोई भी ऐसा राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दल नहीं है जिसने आधी आबादी कही जाने वाली महिला को विधानसभा चुनाव 2012 में वाजिब उम्मीदवारी दी हो। अब चुनाव परिणाम को देखें तो पांच राज्यों के कुल 690 विधायकों में नव निर्वाचित महिला विधायकों की संख्या मात्र 55 है जबकि पुरुष विधायकों की संख्या 635 है। कहने का अर्थ यह है कि इस बार मात्र 8 प्रतिशत महिलाएं निर्वाचित होकर विधानसभा में पहुंची हैं। 2007 में महिलाओं का यह प्रतिनिधित्व 5 प्रतिशत ही था जब 37 महिलाएं विधानसभा पहुंची थीं। हालांकि इस चुनाव में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में 3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। आधी आबादी के हिसाब से यह वृद्धि अपेक्षाकृत बहुत ही कम है। वह भी ऐसे समय में जब दो प्रमुख दलों की मुखिया महिला ही हैं।

पांच राज्यों में महिला प्रतिनिधित्व
राज्य    विधायक    पुरुष विधायक    महिला विधायक
उत्तराखंड   70           65           5
उत्तर प्रदेश 403          371         32
गोवा      40            39          1
पंजाब     117          103          14
मणिपुर    60           57           3  
      

लंबित अपराधिक मामलों वाले विधायक
राज्य कुल विधायक आ.मा. वाले विधायक गंभीर आपराधिक मामले वाले विधायक 
उत्तराखंड    70             19                 5
उत्तर प्रदेश  403            189               98
गोवा       40              12                3
पंजाब     117              22                 8
मणिपुर    60               0                 0

 लंबित गंभीर आपराधिक मामलों वाले विधायक
                       (राज्यवार)
उत्तराखंड
क्र.    विधायक    क्षेत्र    पार्टी    गंभीर मामले    कुल आपराधिक मामले
1. अरविंद पांडे    गदरपुर    भाजपा    1                 3   
2. दिनेश अग्रवाल  धरमपुर   कांग्रेस    2                 2   
3. प्रीतम सिंह    चक्रटा    कांग्रेस      1                 2

उत्तर प्रदेश
1. मित्रसेन    बिकापुर    सपा        26                 36
2. सुशील सिंह सकलधीरा  निर्दल       16                 20
3. रामवीर सिंह जसराना    सपा       11                  18

गोवा
1. जीवियर पेेस्को न्यूवेम  जीवीपी      2                  10
2. अतानासियो मॉनसेरेट सेंट क्रूज कांग्रेस  3                  2
3. जेनिफर मॉनसेरेट  टेलीगाव  कांग्रेस    3                  1

पंजाब
1. बीबी जागीर कौर भोलाथ शि.अ.द.      3                  1
2. बलबीर सिद्धू एसएएस नगर कांग्रेस     2                  1
3. सिमरजीत सिंह बैंस अतम नगर निर्दल  3                 6

 करोड़पति विधायक
राज्य    कुल विधायक    करोड़पति विधायक    प्रतिशत
उत्तराखंड    70              32               46
उत्तर प्रदेश  403             271              67
गोवा       40               37              93
पंजाब     117              101               86
मणिपुर    60               16               27
कुल      690              457              66

शीर्ष तीन करोड़पति विधायक (राज्यवार)
उत्तराखंड
विधायक    क्षेत्र    पार्टी    कुल संपत्ति
राजेश शुक्ला    किछा    भाजपा      26.63 करोड़
अमृता रावत    रामनगर    कांग्रेस    13.57 करोड़
सुरेंद्र सिंह जीना    साल्ट    भाजपा    7.04 करोड़

उत्तर प्रदेश
काजिम अली खान    स्वार    कांग्रेस    56.89 करोड़
शाह आलम    मुबारकपुर    बसपा      54.44 करोड़
महेश कुमार शर्मा    नोएडा    भाजपा    37.45 करोड़

गोवा
प्रतापसिंह राणे    पोरियम    कांग्रेस      25.87 करोड़
विजय सरदेसाई    फटोरडा    निर्दल      25.21 करोड़
जेनिफर मॉनसेरेटो    टेलीगाव    कांग्रेस   23.07 करोड़

पंजाब
करण कौर    मुक्तसर    कांग्रेस        128.43 करोड़
सुखबीर सिंह कौर जलालाबाद  शि.अ.द.   90.86 करोड़
केवल सिंह ढिल्लन बरनाला    कांग्रेस    78.51 करोड़