एवार्ड के पास अतीत का गौरव तो है
संजीव कुमार
पिछले पचास वर्षों में भारत के पुनर्निर्माण और ग्रामीण विकास में एवार्ड का योगदान ऐतिहासिक रहा है। इससे कमला देवी, जयप्रकाश नारायण, अन्ना साहब सहस्रबुध्दे, एल. सी. जैन और धर्मपाल जी जैसे गांधीवादी-समाजवादियों का नाम भी जुड़ा रहा है, लेकिन पिछले कुछ दिनों से इस संस्था का प्रखर नेतृत्व जैसे खो-सा गया है
1956 में दिल्ली में ग्रामीण विकास विषय पर एक राष्ट्रीय स्तर का परिसंवाद हुआ था, जिसमें उस समय ग्रामीण विकास के लिए कार्य करने वाली लगभग 40-50 गैर-सरकारी संस्थाओं ने भाग लिया था। उस बैठक में अन्य बातों के अलावा यह महसूस किया गया कि ग्रामीण विकास का काम करने वाली संस्थाओं का राष्ट्रीय स्तर पर अपना संगठन नहीं है। उसी परिसंवाद में लोगों ने यह तय किया कि एक संगठन बनाया जाए और उसके लिए एक समिति बना दी। लेकिन एवार्ड की स्थापना होने में दो सालों का समय लग गया। संस्था का नाम रखा गया 'एसोसिएशन ऑफ वॉलेंटरी एक्शन फॉर रूरल डेवलपमेंट' (एवार्ड) अर्थात ग्रामीण विकास के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं का संगठन। संस्था का हिंदी नामकरण 'ग्राम सेवा संगम' नाम से किया गया। वैसे इसका हिंदी नाम बहुत प्रचलित नहीं है। इसके संस्थापकों में बड़े-बड़े नेता थे। इस संस्था की संस्थापक अधयक्ष कमला देवी चट्टोपाधयाय, जो कर्नाटक की थीं, जयप्रकाश नारायण जैसे ही तेवर वाली महिला थीं। 1958-60 तक कमला देवी संस्था की अधयक्ष रहीं और उनके साथ धर्मपाल जी (58-66) तक पहले महामंत्री थे। उसके बाद 60 से 79 तक जयप्रकाश जी जीवन पर्यंत अधयक्ष रहे। इस बीच बार-बार चुनाव हुआ, लेकिन सर्वसम्मति से उन्हें ही चुना जाता था। इस संस्था से जुड़े तीसरे महत्वपूर्ण व्यक्ति एल.सी. जैन थे, जो अभी भी जीवित हैं। इनके साथ चौथे महत्वपूर्ण व्यक्ति अन्ना साहब सहस्रबुध्दे थे। पहले 58-64 तक एल.सी. जैन कोषाधयक्ष थे, बाद में धर्मपाल जी के बाद वे महामंत्री बने। सन् 66 से 70 तक अन्ना साहब सहस्रबुध्दे महामंत्री रहे। वे गांधीजी के बाद दूसरे कतार के महत्वपूर्ण नेता थे। उसके बाद 70-80 तक अमरेश चंद्र सेन महामंत्री हुए। ये सभी लोग स्वतंत्रता सेनानी और राष्ट्रीय स्तर के नेता होते हुए भी वैसी विभूति थे, जिन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा।
1947 के बाद गांधीजी के साथियों में दो ग्रुप हो गए। बड़ा वाला ग्रुप सत्ताालोलुप हो गया और छोटा वाल ग्रुप समाज सेवा से जुड़ गया। प्रारंभ में जय प्रकाश जी समाजवादी पार्टी में थे और उन्होंने 1952 के चुनाव में प्रचार भी किया था। लेकिन उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा। इन लोगों का मानना था कि भारतवर्ष का नवनिर्माण बिना आम लोगों की भागीदारी के सिर्फ सरकार से नहीं होगा। इसी दृष्टि से इन लोगों ने राष्ट्र निर्माण के लिए इस संस्था द्वारा काम किया। शुरुआत में संस्था का मुख्य कार्य ग्रामीण विकास के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं को एक-दूसरे से जोड़ना तथा उन्हें यह अहसास दिलाना था कि आप अकेले नहीं हैं, वरन् एक परिवार के सदस्य हैं। संस्था, सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए एक पत्रिका 'एवार्ड न्यूज लेटर' भी निकालती थी। बाद में उसका नाम 'वॉलेंटरी एक्शन' हो गया। इसका प्रकाशन 1997 तक हुआ। 4 जुलाई 1997 को तत्कालीन महामंत्री संजय घोष की हत्या के बाद इस पत्रिका का प्रकाशन बंद हो गया।
गौरतलब है कि जिस समय इस संस्था का गठन हुआ था, उसी समय पंचायती राज पर बलवंत राय मेहता समिति की रिपोर्ट आई थी। जय प्रकाश नारायण लोकतंत्र के विकेंद्रीकरण और पंचायती राज के कट्टर समर्थक थे। उन्हीं के चलते एवार्ड के प्रमुख कार्यों में पंचायती राज, गरीबी निवारण, नर-नारी समता, ग्रामीण प्रौद्योगिकी विकास तथा न्यूनतम आधारभूत आवश्यकता की पूर्ति करना शामिल हैं। आधुनिक भारत में ग्रामीण विकास के क्षेत्र में क्या कार्य हुए। इसको धयान में रखकर 'हिस्ट्री ऑफ रूरल डेवलपमेंट इन मॉडर्न इंडिया' नाम से शोध कराया गया, लेकिन इसे पूरा नहीं किया जा सका। जय प्रकाश जी के समय में एवार्ड ने ब्लॉक और ग्राम स्तर पर बहुत ही उल्लेखनीय कार्य किया था। लेकिन, जब जेपी आंदोलन शुरू हुआ तो 75 से 78 तक एवार्ड के 7-8 ठिकानों पर भी छापा मारा गया। संस्था के सारे लेखा-जोखा की जांच भी हुई और कई तरह से संस्था को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई। जब कांग्रेस पार्टी दुबारा सत्ताा में आई तो उसने कुदाल कमीशन बनाकर एवार्ड ही नहीं, बल्कि इसके जैसी अनेकों संस्थाओं की जांच कराई। लेकिन इतना सारा करने के बाद भी सरकार को कुछ नहीं मिला, जिससे कि वह इस संस्था के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई कर सके। लेकिन सरकार द्वारा पूरे प्रशासन को इस संस्था पर लगा देने से संस्था पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। संस्था बंद नहीं हुई, काम नहीं रुका, लेकिन काम की गति धीमी अवश्य हो गई। बड़ी बात रही कि संस्था इस अग्निपरीक्षा से बेदाग निकली।
बाद के दिनों में जय प्रकाश जी जैसा नेतृत्व नहीं रहा। उनके साथ के लोगों में से सिर्फ एल.सी. जैन जीवित हैं। जय प्रकाश जी ने अपने समय में देश के प्रमुख समाज कार्य संस्थानों को संस्था से जोड़ा, ताकि व्यावहारिक काम और शास्त्रीय ज्ञान दोनों का आपस में संवाद हो सके। संस्था के वर्तमान अध्यक्ष प्यारे मोहन त्रिपाठी इस संस्था से 1966 में ही जुड़े और जेपी के आमंत्रण पर एक साल के लिए बिहार गए और उनके जीवनकाल के अगले लगभग 11 वर्षों तक बिहार में काम किया। प्यारे मोहन जी को एवार्ड में काम करते हुए लगभग 42 साल हो गए हैं। वे एवार्ड के अनेक पदों पर रहने के बाद 1994 से एवार्ड के अधयक्ष हैं। उन्होंने इतने दिनों में यह महसूस किया कि पुराने लोग तो अब रहे नहीं, इसलिए अब इसमें नया नेतृत्व डाला जाए। सो, 1994 में ही संजय घोष को एवार्ड का महामंत्री बनाया गया। संजय घोष बहुत ही प्रतिभावान नौजवान थे। उनका 1997 में जोरहर के पास उल्फावालों ने अपहरण करके हत्या कर दी। उसके बाद राजस्थान के अजय मेहता इसके महामंत्री बने, लेकिन उन्होंने जल्द ही एवार्ड से नाता तोड़ लिया, अभी आर. पी. अग्रवाल महामंत्री हैं।
प्यारे मोहन जी के अनुसार- 'अभी पूरे देश में एवार्ड के 700 से भी अधिक सदस्य हैं। ये सब गैर-सरकारी संस्थाएं हैं। इन संस्थाओं के बीच में सख्य, सहयोग और संवाद का संबंध कायम करना और इसको मजबूत करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते रहना ही हमारा मुख्य काम है। हमारी जितने भी सदस्य संस्थाएं हैं, उन्हें जो सूचना चाहिए होती है, हम उन्हें मुहैया कराते हैं। इसके अलावा उन्हें जो तकनीकी प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है, हम उसकी भी व्यवस्था करते हैं। इस समय हमारे काम का केंद्र पंचायती राज, गरीबी निवारण, नर-नारी समता, ग्रामीण प्रौद्योगिकी तथा न्यूनतम मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करना ही एवार्ड का उद्देश्य है। एवार्ड का उद्देश्य भी गांधी जी का ग्राम स्वराज्य ही है, जिसमें लोग अपनी सारी जरूरतें अपने गांव के अंदर ही पूरी कर सकें।'
प्यारे मोहन जी के अनुसार- 'स्वैच्छिक कार्य, मानवता द्वारा स्वतंत्रता की खोज की अभिव्यक्ति है। इसलिए हम कोशिश यह करते हैं कि हम सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भर हो जाएं। किसी भी क्षेत्र में हमें सरकार या अन्य चीजों पर निर्भर न रहना पड़े। इसी को मजबूत करने के लिए हम लोग कार्य करते हैं। कितना कर पाते हैं और कितना कर पाए हैं, यह अलग बात है। गौरतलब है कि पिछले 16 दिसंबर 2008 को एवार्ड के पचास साल पूरे हो गए। लिहाजा, अगले एक साल तक संस्था स्वर्ण जयंती वर्ष मनाएगी। इस दौरान राज्य और केंद्र स्तर पर विभिन्न विषयों पर परिसंवाद और गोष्ठियां आयोजित होंगी। इसके अलावा संस्था के कार्यों का मूल्यांकन भी होगा और उसका इतिहास भी लिखा जाएगा। साथ ही वॉलेंटरी ऐक्शन का इतिहास अलग से लिखा जाएगा। गोल्डन जुबली साल में हम लोग पहले संस्था की तरफ से एक विशेषांक निकालेंगे, उसके बाद संस्था की पत्रिका का प्रकाशन जो बंद है, उसे चालू करने का प्रयास करेंगे। अंत में संस्था की नई दिशा और दृष्टि पर विचार करेंगे।'
इस संस्था की खास बात यह है कि इसके पास अपनी कोई चल या अचल संपत्तिा नहीं है। यहां तक कि इसका ऑफिस भी कमला देवी ट्रस्ट का है। आज के समय में साधनों की जैसी मारामारी है, वैसे में अगर एवार्ड जैसी संस्था जीवित है, तो बहुत ही फख्र की बात है। प्यारे मोहन जी के अनुसार- 'जयप्रकाश नारायण जी जैसे लोग बहुत ही साधन संपन्न लोग थे। उन्हें बहुत जल्दी ही साधान उपलब्ध हो जाते थे। हम लोग बहुत ही साधारण लोग हैं। इसलिए संसाधन जुटाने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। उन लोगों का मानना था कि संस्था के पास अगर बहुत संसाधन होंगे तो संस्था के अंतर्गत बहुत ही कलह होंगे और संस्था ठंडी हो जाएगी कि हम क्यों कार्य करें। साधन नहीं होने पर संस्था को जीवित रहने के लिए कार्य करने की जरूरत होगी।
आम तौर पर एक संस्था का सामान्य जीवन पच्चीस-तीस वर्षों का माना जाता है, लेकिन एवार्ड ने पिछले 16 दिसंबर को 50 साल पूरा किया है। हम लोग कोशिश कर रहे हैं कि यह और भी आगे चले।' प्यारे मोहन जी का कहते हैं कि जिस समय जेपी इसके अधयक्ष थे, उस समय इसकी राष्ट्रीय स्तर पर बहुत अधिक पहचान थी, लेकिन वैसी स्थिति आज नहीं है। हम लोग एवार्ड को उस स्तर तक नहीं पहुंचा सकते, क्योंकि हम अनाम लोग हैं।
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