मंगलवार, 20 जनवरी 2009

जनरल एस. के. सिन्हा से संजीव कुमार की बातचीत


कमजोर हुए हैं अलगााववादी तत्व
हाल ही में हुए जम्मू-कश्मीर चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस की जीत, पीडीपी की हार और अमरनाथ श्राइन बोर्ड की जमीन आदि को लेकर जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल रहे जनरल एस. के. सिन्हा से हमारे संवाददाता संजीव कुमार ने लंबी बातचीत की। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश-
जम्मू-कश्मीर में हुए पिछले चुनावों और इस चुनाव में मूलभूत अंतर क्या है?
सबसे बड़ी बात यह है कि इस चुनाव ने निश्चित कर दिया है कि जो अलगाववादी तत्व हैं, उनके लिए यह चुनाव उतना अनुकरणगामी नहीं रहा है। अभी तक लोग समझते थे कि वे कश्मीर की जनता के प्रवक्ता हैं। लेकिन इस बार के चुनाव ने यह साबित कर दिया कि उनके बॉयकॉट कॉल देने के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में लोगों ने वोट डाले। उनका कहना है कि कश्मीर का यह चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़ा गया है, मसलन सड़क, बिजली, पानी वगैरह। कश्मीर के केंद्रीय मुद्दे से इस चुनाव का कोई मतलब नहीं था, मैं इसको नहीं मानता। फिर भी यदि इस बात को मान भी लें तो यह चुनाव एक बात सिध्द करता है कि अलगाववादियों का अनुकरण इस चुनाव में नहीं किया गया, क्योंकि उन्होंने जब बॉयकॉट कॉल दिया तो लोगों ने उनके बॉयकॉट कॉल को बॉयकॉट कर दिया। उनके लिए यह चुनाव एक तरह से बहुत बड़ी हार है। उदाहरण के लिए, 1983 में असम में छात्र आंदोलन के समय बॉयकॉट कॉल दिया गया था, उस समय वोटर टर्नआउट केवल तीन प्रतिशत देखने को मिला था, तो उससे पता चलता है कि लोगों ने बॉयकॉट कॉल को कितना महत्व दिया था।
कश्मीर में अलगाववादियाें के बॉयकॉट कॉल के बावजूद 62 प्रतिशत मतदान हो जाता है, जो राष्ट्रीय औसत मतदान से भी ज्यादा है, तो इससे अलगावी तत्वों का कश्मीर में भंडाफोड़ होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो अलगाववादी तत्व जम्मू-कश्मीर में कमजोर हुए हैं। दूसरी बात जो इस चुनाव से स्पष्ट होती है, वह यह है कि जो वहां के शांत और आम नागरिक हैं, जिनकी आवाज को दबाया गया था, आतंकवादियों के डर से और फिर अमरनाथ विवाद को उठा करके उन्हें गुमराह किया गया था। वही आम नागरिक आज न उस बहकावे में हैं और न ही उस दबाव में। उन्होंने खुलकर बिना डर के, बॉयकॉट कॉल और खराब मौसम के बावजूद अधिक से अधिाक संख्या में वोट डाले।
कश्मीर में अपने कार्यकाल के अनुभवों के बारे में बताएं?
जब मैंने वहां 2003 में राज्यपाल का कार्यभार संभाला था, पहले दिन से मेरा प्रयास था कि लोगों में आपसी भाईचारे और कश्मीरियत को बढ़ावा दिया जाए। जनता की सेवा की जाए और उनकी मांगों को पूरा किया जाए, ताकि उनमें हमारे लोकतंत्र के प्रति आस्था और विश्वास पैदा हो। मेरा लक्ष्य था कि 2008 का चुनाव 2002 से भी बेहतर हो। 2002 में अंतरराष्ट्रीय मीडिया कश्मीर के चुनाव में गया था। इस बार मैं चाहता था कि अंतरराष्ट्रीय डिप्लोमैटिक कम्युनिटी भी आकर चुनाव को देखे और दुनिया को मालूम हो कि यहां की आम जनता का झुकाव किस तरफ है। क्योंकि, मुझे कश्मीरियत फैलाने में काफी सफलता मिली थी। इसलिए अलगाववादी और राष्ट्रविरोधी लोगों ने एक बेमतलब की बात उठाई। मेरे विचार से अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन का मामला बेमतलब की ही बात है, क्योंकि ऐसा वर्षों से होता रहा है कि भिन्न-भिन्न एजेंसियों को फॉरेस्ट लैंड राज्य सरकार देती रहती है। जिस दिन अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन दी गई है, उसी दिन पांच अन्य एजेंसियों को भी जमीन दी गई। और इसे सर्वमत और जनमत के आधार पर राज्य मंत्रिमंडल द्वारा दिया था। पीडब्ल्यूडी को रोड बनाने के लिए, पॉवर कॉरपोरेशन को हाइडल प्रोजेक्ट बनाने के लिए जमीन दी गई। इससे पहले रिलायंस और एयरटेल, जो प्राइवेट कंपनियां हैं, उनको भी जमीन दी गई कम्युनिकेशन टॉवर बिठाने के लिए। यदि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को 100 एकड़ जमीन दी गई है, तो इसमें क्या खराबी है। आप कह सकते हैं कि यह एक धार्मिक संस्था है। लेकिन सरकार ने धार्मिक संस्थओं को भी इससे पहले जमीन दी है। राजौरी में औकॉफ बोर्ड को, अनंतनाग में इस्लामिक युनिवर्सिटी बनाने के लिए, जम्मू में माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड को जमीन दी गई।
यह सब देखते हुए अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन का विरोध करने का प्रश्न ही नहीं उठता। और तारीफ यह है कि जो लोग विरोध कर रहे थे, उन्होंने यहां तक कहना शुरू कर दिया था कि यहां हिंदुओं को लाकर बसाया जाएगा और जो घाटी की आबादी है, उसे बदल दिया जाएगा। इससे बढ़कर विडंबनात्मक बात और क्या हो सकती है कि जब चार लाख कश्मीरी पंडित वापस नहीं जा रहे हैं और नहीं जाने दिया जा रहा है, तो सौ एकड़ में जो लोग आएंगे वे वहां कैसे रहेंगे और वहां की आबादी को बदल देंगे? और वह भी ऐसी जमीन पर, जहां आठ महीने तक कोई जा ही नहीं सकता। वैसे भी इस जमीन को कोई इस्तेमाल नहीं कर रहा था। वर्षों से अमरनाथ श्राइन बोर्ड इस जमीन पर यात्रियों के लिए कैंप लगाता था।
गौरतलब है कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जो जमीन ट्रांसफर की गई है, उसके दस्तावेज में यह स्पष्ट लिखा है कि जमीन राज्य सरकार की रहेगी, जमीन श्राइन बोर्ड की नहीं होगी। श्राइन बोर्ड सिर्फ इस जमीन का इस्तेमाल करेगी और वह भी सिर्फ अमरनाथ यात्रियों के अस्थायी ठहरने के लिए। लेकिन इसके बावजूद इसी पर इतना हंगामा हुआ। आज हम समझते हैं कि जिस तरह से वहां वोटर टर्नआउट बढ़ा है। उससे लगता है कि लोगों को यह जानकारी हुई कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड के नाम पर जो हंगामा हुआ, वह बेमतलब का था। केवल यही नहीं, काफी वक्तव्य भी आ रहे हैं। राज्य सभा सदस्य मौलाना सईद असद मदनी, जो देवबंद से छह सौ मौलानाओं को लेकर हैदराबाद गए थे। उन्होंने कहा कि इस जमीन को अमरनाथ श्राइन बोर्ड को देने में किसी भी मुसलमान को कोई आपत्तिा नहीं थीं। कुछ राजनेताओं ने इसे राजनैतिक मामला बना करके लोगों के द्वारा इसका विरोध करवाया। अब लोगों ने यह महसूस करना शुरू कर दिया है। यह वोटर टर्नआउट उसी का प्रतिफल है।
विधानसभा के ताजा नतीजे से पाकिस्तान समर्थित ताकतों पर क्या असर पड़ेगा?
उनका तो काम ही है अलगाव फैलाना और विरोध करना। वे वही करते रहेंगे। और मेरी मान्यता है कि जो वहां मुफ्ती मुहम्मद सईद की पार्टी पीडीपी है, वह शुरू से ही सांप्रदायिक और राष्ट्रविरोधी रही है और यह बहुत सौभाग्य की बात है कि वह वर्तमान सरकार में नहीं है। लेकिन फिर भी उन्हें काफी वोट मिले हैं। उन्होंने इस बार 21 सीटें पाई हैं। लेकिन जो नई सरकार उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में बनी है वह निश्चय ही वहां सुधार लाएगी, क्योंकि वे राष्ट्रवादी हैं।
क्या लोगों ने उनका कहना नहीं माना या लोगों का इरादा देखकर उन्होंने अपना इरादा बदल लिया?
इरादा तो नहीं बदला। देखिए आज भी केंद्र सरकार ने आतंकवादियों को लेकर जो नया कानून बनाया है, महबूबा मुफ्ती ने ऐलान कर दिया है कि उसे वह कश्मीर में नहीं लागू होने देंगी। इससे पता चलता है कि उनका इरादा नहीं बदला है। इसी प्रकार वह हर तरह की बयान देती रहती हैं। कभी कहती हैं कि जम्मू-कश्मीर में सिर्फ कश्मीरी मुसलमान ही मुख्यमंत्री हो सकता है। यहां तक कि जम्मू का मुसलमान भी उनकी नजर में कश्मीर का मुख्यमंत्री नहीं हो सकता, जबकि भारत में हमने अनेकों मुसलमान मुख्यमंत्री बनाए हैं। बिहार में अब्दुल गफूर, महाराष्ट्र में अंतुले, राजस्थान में बरकतउल्ला खान इत्यादि; जबकि इन राज्यों में मुसलमान 10-12 प्रतिशत ही थे। कश्मीर में हिंदुओं की संख्या 30 प्रतिशत से ज्यादा है। यह उनके दृष्टिकोण को ही बताता है।
पाकिस्तान समर्थित जो ताकतें हैं, अब उनकी रणनीति क्या होगी?
उनकी नीति पहले की ही तरह होगी। आप कश्मीर के अखबार पढ़ें, तो पाण्ंगे कि मुंबई में जो हादसा हुआ, उस पर उनके बयान और संपादकीय आ रहे हैं। कहने का अर्थ यह है कि वे वही कह रहे हैं, जो पाकिस्तान कह रहा है।
क्या अब यह माना जाए कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल होगी या पहले की तरह ही विशेष राज्य का दर्जा उसका बना रहेगा?
यह तो कहना मुश्किल है। यह दिल्ली में जो हमारी सरकार है, उस पर निर्भर करता है। दिल्ली की सरकार अभी तक वोट की राजनीति में ही लगी हुई है। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि इस देश पर पहला हक मुसलमानों का है। अगर वे कहते कि इस देश के संसाधनों पर पहला हक गरीबों, मजलूमों और पिछड़े वर्ग का है, तो किसी को भी कोई दिक्कत नहीं होती। अगर इस तरह की सरकार रहेगी तो कश्मीर पहले की तरह ही विशेष राज्य का दर्जा पाए रहेगा। अभी चुनाव हो रहा है। मैं आशा करता हूं कि ऐसी सरकार बने, जो कि भारत के हित और भारत की सुरक्षा को प्राथमिकता दे और वोटों को ख्याल से न चले, तो हो सकता है कि कश्मीर भी हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बन जाए।
कश्मीर में पहले भी गठबंधन सरकारें बनती रही हैं। पहले और इस बार की गठबंधन सरकार में क्या अंतर है?
सबसे बड़ा अंतर यह है कि पीडीपी इस बार सरकार में नहीं है। कांग्रेस पहले भी सरकार में रही है और इस बार भी है। पीडीपी का कांग्रेस से बराबर सांठगांठ रहा है, लेकिन जब कांग्रेस पार्टी के सदस्य की मुख्यमंत्री बनने की बारी आई तो पीडीपी ने मंत्रिमंडल में रहते हुए कांग्रेस की पीठ में छुरा भोंका और विरोध किया। उनकी मांग थी कि सेना को कश्मीर से हटाओ। इसे पूरा न करने की स्थिति में हम सरकार चलने नहीं देंगे। पीडीपी मंत्रियों ने मंत्रिमंडल का बॉयकॉट किया। क्या यह काम राष्ट्रविरोधी नहीं है। उनकी मांग थी कि कश्मीर में डूएल करेंसी हो और कश्मीर पाकिस्तान और भारत के साझा नियंत्रण में हो। वे इस तरह की राष्ट्र विरोधी बातें करते रहते थे। ऐसे में गठबंधन सरकार चलना मुश्किल था। अभी जो नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस पार्टी की गठबंधन सरकार है, इनमें मतभेद कुछ मुद्दों पर हो सकता है, लेकिन मूल बात, जो भारत के संविधान की है, उससे बाहर दोनों में से कोई भी पार्टी जाना नहीं चाहती। तो ऐसे में यह गठबंधन पुराने गठबंधन की तुलना में बेहतर तरीके से कार्य कर सकता है।
अपने अनुभवों के अधार पर नए मुख्यमंत्री को क्या सलाह देंगे?
कश्मीर का मसला सुलझाने के लिए उमर अब्दुल्ला को मेरी सलाह है कि कश्मीर का मसला तभी सुलझेगा जब मामला कश्मीर केंद्रित न होकर, जम्मू-कश्मीर केंद्रित होगा। मेरे कहने का मतलब है कि ऐसा शासन हो, ऐसा प्रयास हो उमर अब्दुला की सरकार का, जिसमें सभी क्षेत्रों के हितों का पूरा ख्याल रखा जाए और उन्हें साथ लेकर चला जाए। न कि बात केवल कश्मीर पर केंद्रित हो। मोटे तौर पर नेशनल कांफ्रेंस का जो एजेंडा है, वे उसी पर चलेंगे। और जहां तक उनकी योग्यता का प्रश्न है, तो उम्र भले ही उनकी कम है, लेकिन इतने कम उम्र में भी उन्हें काफी अनुभव प्राप्त हुआ है। वे बहुत दिनों तक सांसद मंत्री रहे हैं। हम उम्मीद करते हैं कि वे इंग्लैंड के प्रधानमंत्री ब्रैड पीट की तरह बहुत ही सफल मुख्यमंत्री साबित होंगे।

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