गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

ऐतिहासिक नगरी आगरा


आगरा एक ऐतिहासिक नगर है। यहां आप किसी भी मौसम में जाएं यहां की खूबसूरती आपको आकर्षित करेगी। आगरा का इतिहास मुख्यतः मुगल काल से मिलता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसका संबंध महर्षि अंगिरा से है। वैसे आगरा का जिक्र पहली बार महाभारत में मिलता है, जहां इसे ‘अग्रवाण’ या ‘अग्रवन’ कहा जाता था। ऐसा कहा जाता है कि पहले यह ‘आयग्रह’ नगर के नाम से भी जाना जाता था। आगरा की ऐतिहासिकता इसके कण-कण में समाई हुई। अगर आप मुगल काल के इतिहास से बातें करना चाहते हैं, वहां ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण कर उसकी वास्तुकला से रु-ब-रु होना चाहते हैं, दुनिया के सात अजूबों में से एक ताजमहल की खूबसूरती निहारना चाहते हैं और ऊंट की सवारी करना चाहते हैं तो आगरा जरूर घूमिए। सीतामढ़ी के निवासी संजीव कुमार जो ‘प्रथम प्रवक्ता’ पत्रिका के विशेष संवाददाता हैं। वे हाल ही में ऐतिहासिक नगरी आगरा की सैर कर लौटे हैं। पेश है उनके यात्रा की कहानी उन्हीं की जुबानी... 

यात्रा करना और घूमना मुझे बहुत पसंद है। अब तक तो मैं कई जगहों की यात्राएं कर चुका हूं लेकिन अपनी शादी के बाद आगरा घूमना अविस्मरणीय अनुभव था। मुगल सम्राट सिकंदर लोदी ने 1506 ई. में यमुना नदी के तट पर आगरा शहर बसाया। आज यह कई खूबसूरत ऐतिहासिक धरोहरों के लिए जाना जाता है। लेकिन प्रसिद्ध तो यह विश्व के सात अजूबों में से एक ताज महल के लिए ही है। यही वजह है कि ताज महल के बारे में प्रसिद्ध शायर साहिर लुधियानवी ने लिखा है-
‘‘ये चमनज़ार, ये जमुना का किनारा ये महल
ये मुनक़्क़श, दर-ओ-दीवार, ये महराब ये ताक़।
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर,
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है म़ज़ाक।’’  
साहिर ने भले ही अपने इस नज्म में ताजमहल को गरीबों के मुहब्बत का मजाक बताया हो लेकिन इसमें किसी को संदेह नहीं है कि यह शाहजहां के प्रेम की निशानी है। जिसे शाहजहां ने अपने प्रिय बेगम मुमताज महल की याद में बनवाया था। इसके अलावा आगरे का किला और फतेहपुर सीकरी की इमारतें विश्व की सांस्कृतिक धरोहर स्थल की सूची में शामिल हैं।
ऐसे ऐतिहासिक धरोहरों को पास से देखने, उसे महसूस करने और उससे बातें करने में जो आनंद आता है वह दुर्लभ है। वैसे यहां जून-जुलाई (गर्मी के महीने) को छोड़कर किसी भी महीने में जाया जा सकता है। अगर फरवरी महीने में घूमने का प्रोग्राम बना रहे हैं तो 18-27 फरवरी के दौरान जाने का कार्यक्रम बनाएं। क्योंकि इन दिनों वहां ताज महोत्सव होता है। वैसे हमारा जाना मई के तीसरे हफ्ते में हुआ था। अगर आप रेल मार्ग से आगरा जाना चाहते हैं तो वहां का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन आगरा कैंट है। मुझे रेल से सफर करना अच्छा लगता है इसलिए हमने पटना से दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़ी। अगले दिन सुबह हम दिल्ली पहुंचे। वहां एक रिश्तेदार के यहां हमलोग ठहरे। वहां से हमलोगों ने भाड़े पर टैक्सी लिया। अगला दिन शुक्रवार था। और हमें यह पता था कि शुक्रवार को ताजमहल बंद रहता है इसलिए हमलोगों ने उस दिन मथुरा और वृंदावन घूमने का निश्चय किया। हमारी यात्रा टैक्सी से सुबह 6 बजे शुरू हुई। सुबह-सुबह यात्रा करना अच्छा लग रहा था। सुबह-सुबह लोगों को जगकर अपने काम के लिए तैयार होते और जाते हुए देखना अच्छा लग रहा था। यात्रा के बीच में हमलोगों एक ढ़ाबे पर चाय पी। वहां चाय मिट्टी के कुल्हड़ में मिल रही थी। मुझे बहुत दिनों बाद कुल्हड़ में चाय पीने को मिला। लेकिन उस चाय को पीने में जो आनंद आया वह दुर्लभ था। चाय पीने के बाद हमलोग फिर अपनी टैक्सी से मथुरा के लिए चल पड़े।
सुबह 10 बजे हमलोग पौराणिक नगरी मथुरा पहुंचे। वहां हमलोगों ने इंटरनेशनल गेस्ट हाउस में एक रूम पहले से ही बुक करवा रखा था। रूम में सामान रखने के बाद सबसे पहले हमलोगों कृष्ण जन्मभूमि देखा। जिस कृष्ण को सिर्फ पौराणिक ग्रंथ के माध्यम से जानता था उसे हमलोगों ने उनकी जन्मभूमि देखकर महसूस किया। उसके बाद हमने कालिया दह देखा भगवान कृष्ण ने सर्पराज कालिया नाग को वंश में किया था। उसके बाद हमने उस यमुना किनारे के कदंब के पेड़ को देखा जिस पर बैठकर कृष्ण बांसुरी बजाते थे। फिर चिर घाट होते हुए कृष्णा की लीला भूमि सेवाकुंज पहुंचे। ऐसी मान्यता है कि वृंदावन में यही वह निधि वन है जहां कृष्ण राधा रानी और गोपियों के रास रचाते थे। यहां यह भी सुनने को मिला कि कृष्ण आज भी यहां रात्रि में रास लीला करते हैं। लेकिन जो कोई इस लीला को देखने की चेष्टा करते वह कुछ भी बताने लायक नहीं रहता। इस बात पर आश्चर्य करते हुए ईश्वर की महिमा का गुनगान और राधा-कृष्ण के अलौकिक प्रेम को स्मरण करते हुए अंत में बांके बिहारी का दर्शन किया। रात्रि विश्राम अपने होटल में किया।
अगले दिन सुबह 6 बजे आगरा के लिए निकला। 8 बजे ऐतिहासिक नगरी आगरा पहुंचा। नास्ता करने के बाद सुबह-सुबह ही हमलोग ताजमहल देखने पहुंचे। ताजमहल में प्रवेश करने से पहले ही इसके भव्यता का अंदाजा हमलोगों को होने लगा। ताज को एक लालबलुआ पत्थर के चबूतरे पर बने श्वेत संगमर्मर के चबूतरे पर बनाया गया है। इसे फारसी वास्तुकार उस्ताद ईसा खां के निर्देशन में यमुना किनारे बनाया गया। इसे बनाने में लगभग 20 हजार मजदूरों का अथक परिश्रम और लगभग 22 वर्षों(1630-52) का समय लगा। यहां मुगल शैली के चार बाग भी हैं जो ताजमहल को और अधिक संुदर बनाते हैं। इसके मुख्य द्वार पर कुरआन की आयतें खुदी हुई हैं। उसके ऊपर बाइस छोटे गुंबद हैं, जो कि इसके निर्माण के वर्षों की संख्या बताते हैं। लेकिन ताज की सुंदरता, इसके इमारत के बराबर ऊंचे महान गुंबद में बसी है। यह 60 फीट व्यास का, 80 फीट ऊंचा है। इसी के नीचे मुमताज की कब्र है। इसके बराबर में ही शाहजहां का भी कब्र है। ताजमहल के अंदरूनी भाग में रत्नों व बहुमूल्य पत्थरों का काम मुगल स्थापत्य कला से हमें रूबरू कराता  है। ताजमहल के पिछवाड़े बहती यमुना नदी हालांकि अब स्वच्छ नहीं है फिर भी मनोरम और सुंदर दिखती है।
उसके बाद हमलोग आगरे का किला देखने गए। इसे कभी आगरे का लाल किला भी कहा जाता था। आगरा के किले से भी ताजमहल को देखा जा सकता है। यहां से शाहजहां अपने जीवन के अंतिम आठ वर्षों में (अपने पुत्र औरंगजेब द्वारा कैद किए जाने के बाद) ताजमहल को देखा करता था, जहां से यह हवा में तैरता हुआ प्रतीत होता है।  
 आगरे का किला शहर के बीचोंबीच है। इसकी बनावट अर्ध-चद्राकार है जिसे अकबर ने 1565 में बनवाया था। बाद में शाहजहां ने इस किले का पुनरूद्धार लाल बलुआ पत्थर से करवाया। और इसे किले से महल के रूप में बदला। यहां संगमर्मर पर महीन नक्काशी का कार्य किया गया है जो किले की सुंदरता में चार चांद लगाता है। इस किले की मुख्य इमारतों में मोती मस्जिद, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, जहांगीर महल, खास महल, शीश महल एवं मुसम्मन बुर्ज आते हैं। हर महल अपने आप में इतिहास की स्मृतियों को समेटे हुए है। इस किले की पूरी परिधि है 2.4 किलोमीटर है, जो दोहरे परकोटे वाली चारदीवारी से घिरी है। इस दीवार में छोटे अंतरालों पर बुर्जियां हैं। इस दीवार को एक 9 मीटर चौड़ी व 10 मीटर गहरी खाई घेरे हुए है।
रात्रि को होटल में विश्राम किया और अगले दिन सुबह फतेपुर सीकरी देखने निकला। यह आगरा से 35 किलोमीटर दूर है। इसे मुगल सम्राट अकबर ने बसाया था। यहां कई भव्य इमारतें जो हमारे स्वर्णिम इतिहास से हमें रूबरू कराता है। यहां का बुलंद दरवाजा, एक वैश्विक धरोहर है। यह बुलंद दरवाजा मुगल सम्राट अबकर ने बनवाया था। यह लाल और बलुआ पत्थर से बना है। और इसे काले और सफेद संगमर्मर की नक्कासी से सजाया गया है। इसके अलावा कई अन्य दर्शनीय स्थल भी है जहां इतिहास के पन्नों को पलटा जा सकता है। इसी दिन हमें दिल्ली के लिए लौटना पड़ा। लौटते वक्त हमें अलौकिक प्रेम की नगरी से लौकिक प्रेम की नगरी तक की यात्रा करना इस यात्रा को अविस्मणीय बना दिया।

क्विक व्यू
पटना से आगरा (उत्तर प्रदेश) की दूरी लगभग 884 किलोमीटर है।
कैसे पहुंचें
पटना से आगरा आप ट्रेन से भी जा सकते हैं। पटना जंक्शन से पटना-मथुरा एक्सप्रेस 11.50 बजे है। यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन आगरा कैंट है। यहां देश के किसी भी शहर से आसानी से पहुंचा जा सकता है। यहां हवाई मार्ग से भी जाया जा सकता है। आगरा से 7 किलोमीटर की दूरी पर हवाई अड्डा स्थित है। यह देश के कई प्रमुख शहरों से जुड़ा है।
कब जाएं
वैसे तो यहां कभी भी जा सकते हैं लेकिन फरवरी में जाना बढ़िया रहेगा। क्योंकि 18-27 फरवरी के दौरान ताज महोत्सव का आयोजन किया जाता है।
होटल
यहां पर्यटकों के ठहरने के लिए कई होटलें हैं। जो आपके बजट के अनुसार हो वहां ठहर सकते हैं। यहां के अच्छे होटलों में कठपुतली नृत्य एवं परंपरा के अनुसार भोजन भी परोसा जाता है। यहां अनेक पर्यटकों को स्थानीय निवासियों द्वारा बनाए गए पारंपरिक व्यंजन लुभाते हैं।
अन्य दर्शनीय स्थल
आगरे का किला, फतेहपुर सीकरी, जामा मस्जिद, बुलंद दरवाजा,  एतमादुद्दौला का मकबरा, सिकंदरा, मरियम मकबरा, चीनी का रोजा, रामबाग, दयाल बाग और मेहताब बाग आदि देखकर इतिहास के यादों को संजोया जा सकता है। यहां से मथुरा और वृंदावन भी जाया जा सकता है।

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

वात्सल्य ग्राम अनाथालय नहीं एक परिवार है



वात्सल्य ग्राम की परिकल्पना को लेकर वात्सल्य ग्राम की संस्थापिका साध्वी ऋतंभरा से संजीव कुमार की बातचीत के प्रमुख अंश-
1.  अपने देश में अनाथालयों की कमी नहीं है। ऐसे में वात्सल्य ग्राम उन अनाथालयों से किस तरह भिन्न है?
वात्सल्य ग्राम अनाथ बच्चों को सनाथ बनाता है। यहां बच्चों को एक मां की गोद मिलती है और अपना घर मिलता है। साथ में  भाई-बहन, मां-मौसी और नानी के रूप में रिश्ता मिलता है। इस तरह वात्सल्य ग्राम अपने बच्चों को संबंधों का एक सुख देता है। रोटी, कपड़ा और मकान के साथ जो रिश्ता और परिवार का प्यार मिलता है, वह वात्सल्य ग्राम को अन्य अनाथालयों से भिन्न करता है।
2. क्या यह जरूरी है कि वात्सल्य ग्राम की माताएं बच्चों को उतना ही प्यार दे पाती हैं जितना एक सगी मां अपने बच्चे से करती हैं?
प्यार सगे और पराए को नहीं पहचानता। जननी तो सिर्फ जन्म देती है। अगर कोई बच्चा दूसरे जगह चला जाए तो उसे वहां स्वाभाविक रूप से प्यार मिलना शुरू हो जाता है। दूसरी बात कोई भी स्त्री तभी अपना जीवन वात्सल्य ग्राम को देती है जब वह वात्सल्यमयी होती है। ममतामयी होती है। जो प्यार देने के लिए ही नहीं, प्यार पाने के लिए भी आतुर होती हैं। यहां की माताओं और बच्चों का रिश्ता जीविका का नहीं, जीवन और प्यार का रिश्ता है। वात्सल्य ग्राम अनाथालय नहीं एक परिवार है। इसके माध्यम से मैं एक भावात्मक परिवार अर्थात् ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की भारतीय ऋषि कल्पना को साकार करने की साधना कर रही हूं।
3. जब वात्सल्य ग्राम के बच्चों को यह पता चलता है कि उन्हें ममता की शीतल छाया देने वाली मां उनकी असली मां नहीं है तब उनकी क्या प्रतिक्रिया होती है?
वात्सल्य ग्राम के बच्चे जब बड़े होते हैं और जन्म की प्रक्रिया के बारे में पता चलता है तो वे यह समझ जाते हैं कि यही वह मां है जिसने हमें अपना जीवन दिया है। ऐसे में अपनी इस मां के प्रति उनकी श्रद्धा और बढ़ जाती है। क्योंकि वे ये समझने लगते हैं कि जो मेरे खून के रिश्ते थे वे मुझे छोड़ गए और एक यह मां है जिसने अपनी जिंदगी मेरे लिए न्योछावर कर दी है। इस अहसास के बाद तो इन बच्चांे का अपनी इस मां के प्रति श्रद्धा व प्यार और बढ़ जाता है।
4. इन बच्चों का अपने भाई-बहनों के प्रति कैसा व्यवहार होता है?
आश्रम के बच्चे अपने बाद आने वाले बच्चों के प्रति स्वाभाविक रूप से संवेदनशील होते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि ये बच्चे अपने भाई-बहनों के रूचियों का ख्याल रखते हैं। उन्हें इस बात का स्वाभाविक रूप से भान होता है कि यह बच्चा पालने में आया है। इसे भी कोई छोड़ गया होगा। ऐसे में इन बच्चों के प्रति उनके मन में प्रेम स्वाभाविक रूप से पनपता है। इसके लिए हमें कोई लेक्चर या प्रवचन देने की जरूरत नहीं होती। 
5. वात्सल्य ग्राम से निकले अबतक कितने बच्चे सामान्य जीवन जी रहे हैं?
वात्सल्य ग्राम को 12 साल हुए हैं लेकिन मैं इस कार्य से 22 साल से जुड़ी हंू। हमारी कई बच्चियां अपने-अपने क्षेत्रों में अपने पैरों पर खड़ी हो रही है। हमारी एक बच्ची आईआईटी से इंजिनियरिंग तो दूसरी डेंटल (डॉक्टरी) की पढ़ाई कर रही है। वहीं एक बच्ची इंटीरियर डिजाइनिंग का काम कर रही है। इस तरह सभी अपना सामान्य जीवन जी रहे हैं। वे अपने जीवन में अच्छी पढ़ाई-लिखाई तो कर ही रहे हैं। और अब वे समाज के लिए क्या करेंगे यह तो आने वाला समय ही बताएगा। वैसे वात्सल्य परिवार की पहली बच्ची का दिल्ली के एक गोयल परिवार मे ब्याह हुआ है। वह दो बच्चों की मां है। और घर-परिवार ठीक से चला रही है। एक अनाथ बच्ची का समाज के मुख्य धरा में शामिल होना ही वात्सल्य ग्राम की एक उपलब्धि है। सबसे अच्छी बात यह है कि इस बच्चों को अपनाने के लिए समाज ही आगे आ रहा है।
6. वात्सल्य ग्राम के बच्चों को लेकर आपकी क्या सोच है?
मैं समझती हंू कि कोई भी बच्चा ईश्वरीय कृति है। ये बच्चे किसी परिवार, समाज या देश की ही नहीं मानवता की भी धरोहर हैं। मैं इन बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा देने का प्रयत्न कर रही हूं। जिससे वे अपने व्यक्तित्व में पूर्णता, नैतिकता और आध्यत्मिकता के साथ-साथ अपनी राष्ट्रीय भूमिका भी निभाए। एक अच्छा और प्रमाणिक इंसान बनाने की प्रक्रिया ही हमारे वात्सल्य ग्राम की सोच है। मेरी यह कामना है कि वे देश और समाज के लिए जिएं। वे काम करें, धन कमाएं, किंतु स्वयं अकेले न खाकर आसपास के लोगों को खिलाकर खाएं।

वात्सल्य की बगिया वात्सल्य ग्राम

संजीव कुमार

वात्सल्य ग्राम, न केवल ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की कल्पना को साकार करता है बल्कि आज के इस भौतिकवादी दौर में जहां कोई किसी का सगा नहीं है वहां यह आत्मिक रिश्तों का संसार भी रचता है।  
 वात्सल्य ग्राम। मथुरा-वृंदावन रोड पर 50 एकड़ भूमि में फैला एक गांव। एक ऐसा गांव जहां 16 आवासीय भवनों में 127 बच्चे, 16 मां, 10 नानियां और छह मौसियां। हर मां का एक स्वतंत्र परिवार। एक वात्सल्य परिवार में 5 बालिकाएं, 2 बालक, एक मां, मौसी और नानी होते हैं, जो एक परिवार की भांति रहते हैं। एक ऐसा गांव जहां नवजात, युवा और बुजुर्ग एक साथ रहते हैं, लेकिन यहां कोई अनाथ, अवैध, नाजायज, बांझ, विधवा और पारित्यक्ता नहीं है। एक ऐसा गांव जहां हर बच्चे के माता-पिता की जगह सिर्फ ‘मां’ का नाम जुड़ता है। एक ऐसा गांव जहां जात-पात का भेदभाव नहीं है। यहां सब एक ही जाति और गोत्र के नाम से जाने जाते हैं। वह है- ‘परमानंद’। स्वामी परमानंद वात्सल्य ग्राम की संस्थापिका साध्वी ऋतंभरा के गुरु हैं। एक ऐसा गांव जहां रक्त संबंध न होते हुए भी देश के अलग-अलग हिस्सों के लोग एक परिवार की तरह रहते हैं।
इस वात्सल्य ग्राम को साध्वी ऋतंभरा का आश्रम भी कहा जाता है। इस परिसर में उन्हें ‘दीदी मां’ कहा जाता है। साध्वी ऋतंभरा अपने इस आश्रम में रहने वाले 127 बाल-गोपालों पर अपना सर्वस्व न्योछावर करती हैं। श्रीराम मंदिर आंदोलन के समय हिंदुत्व की फायर ब्रांड नेता मानी जाने वाली साध्वी ऋतंभरा ने वात्सल्य ग्राम से जो वात्सल्य की गंगा बहायी है वह अन्यत्र दुर्लभ है। वाल्सल्य ग्राम, वात्सल्य भाव की केवल प्रयोग भूमि ही नहीं है, यह एक अतिप्रेरक संदेश और संकेत भी है कि भारत के पुनर्जन्म की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है।
वात्सल्य ग्राम सिर्फ वात्सल्य की भूमि पर ही केंद्रित नहीं है, यहां राष्ट्रभाव की भी प्राण-प्रतिष्ठा की गई है। इसके प्रांगण में भारतमाता की भव्य प्रतिमा इसी का संदेश देता है। कृष्ण और यशोदा का वात्सल्य भाव अगर कहीं सुरक्षित रह सकता है तो वह भारतमाता का आंचल ही हो सकता है। इसी भाव को दर्शाती एक आकृति प्रवेश द्वार के कुछ आगे स्थापित की गई है। मां यशोदा की गोद में बालकृष्ण विराजमान हैं। मां यशोदा बालकृष्ण को निहार रही हैं और बालकृष्ण मां यशोदा को। इन दोनों के बीच वात्सल्य की जो अविरल धारा प्रवाहित हो रही है वह अद्भुत है। उसी तरह वात्सल्य ग्राम से प्रवाहित हो रही वात्सल्य की यह गंगा समस्त जीव-जगत के कल्याण के लिए है। यह लौकिक माता-पिता की स्नेहिल छाया से वंचित शिशुओं के लिए मातृ प्रेम का सजीव अंागन है। यह मातृत्व और पितृत्व से वंचित वयस्कों के लिए भी है तो कर्तव्य-बोध से अज्ञात सामान्यजन के लिए भी है।
इस प्रयोगभूमि के आरंभ की कहानी भी कम दिलचस्व नहीं। परमशक्ति पीठ से जुड़े भानुप्रताप शुक्ल न्यास के सचिव योगेन्द्र पाल त्यागी बताते हैं कि एक बार दीदी मां साध्वी ऋतंभरा को एक अनाथ शिशु मिला। उन्होंने सोचा कि कोई अकेली रहनेवाली माता इसे स्वीकार कर ले तो दोनों का एकाकीपन दूर हो जाएगा और कोई बेसहारा भी नहीं रहेगा। ‘रघुनाथ’ और ‘विश्वनाथ’ के इस देश में कोई ‘अनाथ’ और ‘बेसहारा’ कैसे हो सकता है?’ इसी सिद्धांत को आधार बनाकर दिल्ली के पटपड़गज में वात्सल्य भाव से ही परमशक्ति पीठ की स्थापना (1992) और फिर वात्सल्य मंदिर का जन्म हुआ। इस योजना को इतना समर्थन मिला कि आज यह ‘वात्सल्य मंदिर’ से ‘वात्सल्य ग्राम’ में तब्दील हो चुका है।
वात्सल्य ग्राम में अधिकांशतः वैसे ही बच्चे पलते हैं जिनके अभागे मां-बाप अपनी मजबूरियों की वजह से उन्हें कूड़ेदान या झाड़ियों में डाल देते हैं। वात्सल्य की बगिया इन्हीं कूड़ेदान और झाड़ियों से उठाए गए ‘फूलों’ से सजी है। वात्सल्य ग्राम के शिशु मंगल में एक वर्ष से कम आयु के बच्चे रहते हैं। आज इस शिशु मंगल में 50 के करीब बच्चे हैं। इन बच्चों का लालन-पालन मां सुमन परमानंद करती हैं। सुमन परमानंद इस परिसर की प्रमुख हैं। एक वर्ष के बाद बच्चे को गोकुलम के एक परिवार को सौंप दिया जाता है, जहां उनका प्रेम पूर्वक लालन-पालन किया जाता है। यहां वे नौ वर्ष की आयु तक रहते हैं। उसके बाद उन्हें अध्यापक के अनुशासन में छात्रावास में भेज दिया जाता है। यहां उनका शिक्षा के साथ-साथ समग्र शारीरिक और मानसिक विकास पर ध्यान दिया जाता है। छठी कक्षा के बाद बच्चों को परमशक्ति पीठ के खर्चे पर ही बाहर पढ़ने के लिए भेज दिया जाता है।
परमशक्ति पीठ को बने आज 20 वर्ष से अधिक हो गए हैं। इसलिए वात्सल्य मंदिर में पली-बढ़ी पहली बच्ची अंकिता की शादी दिल्ली के ही एक अच्छे परिवार में हो चुकी है। पिछले दिनों उसके पैर में चोट लगी तो उसकी मां शोभा परमानंद को तबतक चैन नहीं आया, जबतक उन्होंने दिल्ली जाकर अपनी बेटी से मिल नहीं लिया। इससे यह भी पता चलता है कि वात्सल्य ग्राम के मां-बच्चों का रिश्ता कुछ वर्षों का नहीं है, बल्कि जीवन भर का है। इतना ही नहीं अंकिता जब वात्सल्य ग्राम आती है तो उसका वात्सल्य ग्राम में उसी तरह स्वागत होता है जैसे एक बेटी का उसके मायके में होता है। यह है वात्सल्य ग्राम की बगिया का वात्सल्य।

और कहां-कहां है वात्सल्य ग्राम
1- अग्रसेन आवास, इंद्रप्रस्थ विस्तार, दिल्ली
2- नालागढ़, सोलन, हिमाचल प्रदेश
3- ओंकारेश्वर, खांडवा, मध्य प्रदेश
4- छतरपुर, खजुराहो, मध्य प्रदेश

वात्सल्य ग्राम के प्रकल्प
गोकुलम् वात्सल्य आवास: आधुनिक सुविधा संपन्न आवासीय परिसर। यहां बालक नौ वर्ष की आयु तक रहते हैं।
स्वस्ति चिकित्सालयः प्राकृतिक चिकित्सा, योग एवं व्यायाम के माध्यम से असाध्य रोगों का निदान इस आरोग्य केंद्र का लक्ष्य है।
समविद् गुरुकुलमः बालक-बालिकाओं के लिए आवासीय विद्यालय जहां मूल्य आधारित समग्र शिक्षा प्रदान की जाती है।
खेलकूद अकादमीः वात्सल्य ग्राम वासियों को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ एवं सबल बनाने के लिए।
संस्कार केंद्रः समाज में पवित्र वातावरण का निर्माण और ग्राम वासियों के जीवन में धर्म-संस्कार व नैतिकता की प्रस्थापना के लिए यज्ञ, कथा, प्रवचन और कर्मकांड की शिक्षा दी जाती है।
गृह उद्योग प्रशिक्षण केंद्रः गृह उद्योग, कुटीर उद्योग और वन्य उत्पाद आधारित उद्योगों द्वारा अर्थोपार्जन की शिक्षा देकर मातृ शक्ति को जीवन में स्वावलंबी बनाना इस केंद्र का लक्ष्य है।
कामधेनु गौगृहः गोधाम के माध्यम से संपूर्ण गौवंश का संरक्षण, संवर्धन करना। साथ ही वात्सल्य ग्राम के सभी शिशुओं को गोदुग्ध उपलब्ध हो सके।
मातृ प्रशिक्षण केंद्रः ऐसी मार्गदर्शिका, राष्ट्रसेविका और धर्मप्रचारिका नारी का निर्माण केंद्र जहां माताओं को सम्मानजनक स्थान प्रदान करने के साथ शिशु पालन व परिवार की देखरेख का प्रशिक्षण दिया जाता है।
संत निवासः सद्गुरु सन्निधि के निर्माण के उद्येश्य से विभिन्न स्थानों से आए साधकों व संतों को एक पवित्र व धार्मिक वातावरण में प्रवास उपलब्ध कराना।
मीरा माधव निलयम अतिथि गृहः भारत व विदेशों से आए वात्सल्य ग्राम योजना के सहयोगियों व भ्रमणार्थियों को प्रवास स्थान उपलब्ध कराना इस प्रकल्प का उद्येश्य है।