संजीव कुमार
वात्सल्य ग्राम, न केवल ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की कल्पना को साकार करता है बल्कि आज के इस भौतिकवादी दौर में जहां कोई किसी का सगा नहीं है वहां यह आत्मिक रिश्तों का संसार भी रचता है।वात्सल्य ग्राम। मथुरा-वृंदावन रोड पर 50 एकड़ भूमि में फैला एक गांव। एक ऐसा गांव जहां 16 आवासीय भवनों में 127 बच्चे, 16 मां, 10 नानियां और छह मौसियां। हर मां का एक स्वतंत्र परिवार। एक वात्सल्य परिवार में 5 बालिकाएं, 2 बालक, एक मां, मौसी और नानी होते हैं, जो एक परिवार की भांति रहते हैं। एक ऐसा गांव जहां नवजात, युवा और बुजुर्ग एक साथ रहते हैं, लेकिन यहां कोई अनाथ, अवैध, नाजायज, बांझ, विधवा और पारित्यक्ता नहीं है। एक ऐसा गांव जहां हर बच्चे के माता-पिता की जगह सिर्फ ‘मां’ का नाम जुड़ता है। एक ऐसा गांव जहां जात-पात का भेदभाव नहीं है। यहां सब एक ही जाति और गोत्र के नाम से जाने जाते हैं। वह है- ‘परमानंद’। स्वामी परमानंद वात्सल्य ग्राम की संस्थापिका साध्वी ऋतंभरा के गुरु हैं। एक ऐसा गांव जहां रक्त संबंध न होते हुए भी देश के अलग-अलग हिस्सों के लोग एक परिवार की तरह रहते हैं।
इस वात्सल्य ग्राम को साध्वी ऋतंभरा का आश्रम भी कहा जाता है। इस परिसर में उन्हें ‘दीदी मां’ कहा जाता है। साध्वी ऋतंभरा अपने इस आश्रम में रहने वाले 127 बाल-गोपालों पर अपना सर्वस्व न्योछावर करती हैं। श्रीराम मंदिर आंदोलन के समय हिंदुत्व की फायर ब्रांड नेता मानी जाने वाली साध्वी ऋतंभरा ने वात्सल्य ग्राम से जो वात्सल्य की गंगा बहायी है वह अन्यत्र दुर्लभ है। वाल्सल्य ग्राम, वात्सल्य भाव की केवल प्रयोग भूमि ही नहीं है, यह एक अतिप्रेरक संदेश और संकेत भी है कि भारत के पुनर्जन्म की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है।
वात्सल्य ग्राम सिर्फ वात्सल्य की भूमि पर ही केंद्रित नहीं है, यहां राष्ट्रभाव की भी प्राण-प्रतिष्ठा की गई है। इसके प्रांगण में भारतमाता की भव्य प्रतिमा इसी का संदेश देता है। कृष्ण और यशोदा का वात्सल्य भाव अगर कहीं सुरक्षित रह सकता है तो वह भारतमाता का आंचल ही हो सकता है। इसी भाव को दर्शाती एक आकृति प्रवेश द्वार के कुछ आगे स्थापित की गई है। मां यशोदा की गोद में बालकृष्ण विराजमान हैं। मां यशोदा बालकृष्ण को निहार रही हैं और बालकृष्ण मां यशोदा को। इन दोनों के बीच वात्सल्य की जो अविरल धारा प्रवाहित हो रही है वह अद्भुत है। उसी तरह वात्सल्य ग्राम से प्रवाहित हो रही वात्सल्य की यह गंगा समस्त जीव-जगत के कल्याण के लिए है। यह लौकिक माता-पिता की स्नेहिल छाया से वंचित शिशुओं के लिए मातृ प्रेम का सजीव अंागन है। यह मातृत्व और पितृत्व से वंचित वयस्कों के लिए भी है तो कर्तव्य-बोध से अज्ञात सामान्यजन के लिए भी है।
इस प्रयोगभूमि के आरंभ की कहानी भी कम दिलचस्व नहीं। परमशक्ति पीठ से जुड़े भानुप्रताप शुक्ल न्यास के सचिव योगेन्द्र पाल त्यागी बताते हैं कि एक बार दीदी मां साध्वी ऋतंभरा को एक अनाथ शिशु मिला। उन्होंने सोचा कि कोई अकेली रहनेवाली माता इसे स्वीकार कर ले तो दोनों का एकाकीपन दूर हो जाएगा और कोई बेसहारा भी नहीं रहेगा। ‘रघुनाथ’ और ‘विश्वनाथ’ के इस देश में कोई ‘अनाथ’ और ‘बेसहारा’ कैसे हो सकता है?’ इसी सिद्धांत को आधार बनाकर दिल्ली के पटपड़गज में वात्सल्य भाव से ही परमशक्ति पीठ की स्थापना (1992) और फिर वात्सल्य मंदिर का जन्म हुआ। इस योजना को इतना समर्थन मिला कि आज यह ‘वात्सल्य मंदिर’ से ‘वात्सल्य ग्राम’ में तब्दील हो चुका है।
वात्सल्य ग्राम में अधिकांशतः वैसे ही बच्चे पलते हैं जिनके अभागे मां-बाप अपनी मजबूरियों की वजह से उन्हें कूड़ेदान या झाड़ियों में डाल देते हैं। वात्सल्य की बगिया इन्हीं कूड़ेदान और झाड़ियों से उठाए गए ‘फूलों’ से सजी है। वात्सल्य ग्राम के शिशु मंगल में एक वर्ष से कम आयु के बच्चे रहते हैं। आज इस शिशु मंगल में 50 के करीब बच्चे हैं। इन बच्चों का लालन-पालन मां सुमन परमानंद करती हैं। सुमन परमानंद इस परिसर की प्रमुख हैं। एक वर्ष के बाद बच्चे को गोकुलम के एक परिवार को सौंप दिया जाता है, जहां उनका प्रेम पूर्वक लालन-पालन किया जाता है। यहां वे नौ वर्ष की आयु तक रहते हैं। उसके बाद उन्हें अध्यापक के अनुशासन में छात्रावास में भेज दिया जाता है। यहां उनका शिक्षा के साथ-साथ समग्र शारीरिक और मानसिक विकास पर ध्यान दिया जाता है। छठी कक्षा के बाद बच्चों को परमशक्ति पीठ के खर्चे पर ही बाहर पढ़ने के लिए भेज दिया जाता है।
परमशक्ति पीठ को बने आज 20 वर्ष से अधिक हो गए हैं। इसलिए वात्सल्य मंदिर में पली-बढ़ी पहली बच्ची अंकिता की शादी दिल्ली के ही एक अच्छे परिवार में हो चुकी है। पिछले दिनों उसके पैर में चोट लगी तो उसकी मां शोभा परमानंद को तबतक चैन नहीं आया, जबतक उन्होंने दिल्ली जाकर अपनी बेटी से मिल नहीं लिया। इससे यह भी पता चलता है कि वात्सल्य ग्राम के मां-बच्चों का रिश्ता कुछ वर्षों का नहीं है, बल्कि जीवन भर का है। इतना ही नहीं अंकिता जब वात्सल्य ग्राम आती है तो उसका वात्सल्य ग्राम में उसी तरह स्वागत होता है जैसे एक बेटी का उसके मायके में होता है। यह है वात्सल्य ग्राम की बगिया का वात्सल्य।
और कहां-कहां है वात्सल्य ग्राम
1- अग्रसेन आवास, इंद्रप्रस्थ विस्तार, दिल्ली
2- नालागढ़, सोलन, हिमाचल प्रदेश
3- ओंकारेश्वर, खांडवा, मध्य प्रदेश
4- छतरपुर, खजुराहो, मध्य प्रदेश
वात्सल्य ग्राम के प्रकल्प
गोकुलम् वात्सल्य आवास: आधुनिक सुविधा संपन्न आवासीय परिसर। यहां बालक नौ वर्ष की आयु तक रहते हैं।
स्वस्ति चिकित्सालयः प्राकृतिक चिकित्सा, योग एवं व्यायाम के माध्यम से असाध्य रोगों का निदान इस आरोग्य केंद्र का लक्ष्य है।
समविद् गुरुकुलमः बालक-बालिकाओं के लिए आवासीय विद्यालय जहां मूल्य आधारित समग्र शिक्षा प्रदान की जाती है।
खेलकूद अकादमीः वात्सल्य ग्राम वासियों को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ एवं सबल बनाने के लिए।
संस्कार केंद्रः समाज में पवित्र वातावरण का निर्माण और ग्राम वासियों के जीवन में धर्म-संस्कार व नैतिकता की प्रस्थापना के लिए यज्ञ, कथा, प्रवचन और कर्मकांड की शिक्षा दी जाती है।
गृह उद्योग प्रशिक्षण केंद्रः गृह उद्योग, कुटीर उद्योग और वन्य उत्पाद आधारित उद्योगों द्वारा अर्थोपार्जन की शिक्षा देकर मातृ शक्ति को जीवन में स्वावलंबी बनाना इस केंद्र का लक्ष्य है।
कामधेनु गौगृहः गोधाम के माध्यम से संपूर्ण गौवंश का संरक्षण, संवर्धन करना। साथ ही वात्सल्य ग्राम के सभी शिशुओं को गोदुग्ध उपलब्ध हो सके।
मातृ प्रशिक्षण केंद्रः ऐसी मार्गदर्शिका, राष्ट्रसेविका और धर्मप्रचारिका नारी का निर्माण केंद्र जहां माताओं को सम्मानजनक स्थान प्रदान करने के साथ शिशु पालन व परिवार की देखरेख का प्रशिक्षण दिया जाता है।
संत निवासः सद्गुरु सन्निधि के निर्माण के उद्येश्य से विभिन्न स्थानों से आए साधकों व संतों को एक पवित्र व धार्मिक वातावरण में प्रवास उपलब्ध कराना।
मीरा माधव निलयम अतिथि गृहः भारत व विदेशों से आए वात्सल्य ग्राम योजना के सहयोगियों व भ्रमणार्थियों को प्रवास स्थान उपलब्ध कराना इस प्रकल्प का उद्येश्य है।

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