वात्सल्य ग्राम की परिकल्पना को लेकर वात्सल्य ग्राम की संस्थापिका साध्वी ऋतंभरा से संजीव कुमार की बातचीत के प्रमुख अंश-
1. अपने देश में अनाथालयों की कमी नहीं है। ऐसे में वात्सल्य ग्राम उन अनाथालयों से किस तरह भिन्न है?
वात्सल्य ग्राम अनाथ बच्चों को सनाथ बनाता है। यहां बच्चों को एक मां की गोद मिलती है और अपना घर मिलता है। साथ में भाई-बहन, मां-मौसी और नानी के रूप में रिश्ता मिलता है। इस तरह वात्सल्य ग्राम अपने बच्चों को संबंधों का एक सुख देता है। रोटी, कपड़ा और मकान के साथ जो रिश्ता और परिवार का प्यार मिलता है, वह वात्सल्य ग्राम को अन्य अनाथालयों से भिन्न करता है।
2. क्या यह जरूरी है कि वात्सल्य ग्राम की माताएं बच्चों को उतना ही प्यार दे पाती हैं जितना एक सगी मां अपने बच्चे से करती हैं?
प्यार सगे और पराए को नहीं पहचानता। जननी तो सिर्फ जन्म देती है। अगर कोई बच्चा दूसरे जगह चला जाए तो उसे वहां स्वाभाविक रूप से प्यार मिलना शुरू हो जाता है। दूसरी बात कोई भी स्त्री तभी अपना जीवन वात्सल्य ग्राम को देती है जब वह वात्सल्यमयी होती है। ममतामयी होती है। जो प्यार देने के लिए ही नहीं, प्यार पाने के लिए भी आतुर होती हैं। यहां की माताओं और बच्चों का रिश्ता जीविका का नहीं, जीवन और प्यार का रिश्ता है। वात्सल्य ग्राम अनाथालय नहीं एक परिवार है। इसके माध्यम से मैं एक भावात्मक परिवार अर्थात् ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की भारतीय ऋषि कल्पना को साकार करने की साधना कर रही हूं।
3. जब वात्सल्य ग्राम के बच्चों को यह पता चलता है कि उन्हें ममता की शीतल छाया देने वाली मां उनकी असली मां नहीं है तब उनकी क्या प्रतिक्रिया होती है?
वात्सल्य ग्राम के बच्चे जब बड़े होते हैं और जन्म की प्रक्रिया के बारे में पता चलता है तो वे यह समझ जाते हैं कि यही वह मां है जिसने हमें अपना जीवन दिया है। ऐसे में अपनी इस मां के प्रति उनकी श्रद्धा और बढ़ जाती है। क्योंकि वे ये समझने लगते हैं कि जो मेरे खून के रिश्ते थे वे मुझे छोड़ गए और एक यह मां है जिसने अपनी जिंदगी मेरे लिए न्योछावर कर दी है। इस अहसास के बाद तो इन बच्चांे का अपनी इस मां के प्रति श्रद्धा व प्यार और बढ़ जाता है।
4. इन बच्चों का अपने भाई-बहनों के प्रति कैसा व्यवहार होता है?
आश्रम के बच्चे अपने बाद आने वाले बच्चों के प्रति स्वाभाविक रूप से संवेदनशील होते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि ये बच्चे अपने भाई-बहनों के रूचियों का ख्याल रखते हैं। उन्हें इस बात का स्वाभाविक रूप से भान होता है कि यह बच्चा पालने में आया है। इसे भी कोई छोड़ गया होगा। ऐसे में इन बच्चों के प्रति उनके मन में प्रेम स्वाभाविक रूप से पनपता है। इसके लिए हमें कोई लेक्चर या प्रवचन देने की जरूरत नहीं होती।
5. वात्सल्य ग्राम से निकले अबतक कितने बच्चे सामान्य जीवन जी रहे हैं?
वात्सल्य ग्राम को 12 साल हुए हैं लेकिन मैं इस कार्य से 22 साल से जुड़ी हंू। हमारी कई बच्चियां अपने-अपने क्षेत्रों में अपने पैरों पर खड़ी हो रही है। हमारी एक बच्ची आईआईटी से इंजिनियरिंग तो दूसरी डेंटल (डॉक्टरी) की पढ़ाई कर रही है। वहीं एक बच्ची इंटीरियर डिजाइनिंग का काम कर रही है। इस तरह सभी अपना सामान्य जीवन जी रहे हैं। वे अपने जीवन में अच्छी पढ़ाई-लिखाई तो कर ही रहे हैं। और अब वे समाज के लिए क्या करेंगे यह तो आने वाला समय ही बताएगा। वैसे वात्सल्य परिवार की पहली बच्ची का दिल्ली के एक गोयल परिवार मे ब्याह हुआ है। वह दो बच्चों की मां है। और घर-परिवार ठीक से चला रही है। एक अनाथ बच्ची का समाज के मुख्य धरा में शामिल होना ही वात्सल्य ग्राम की एक उपलब्धि है। सबसे अच्छी बात यह है कि इस बच्चों को अपनाने के लिए समाज ही आगे आ रहा है।
6. वात्सल्य ग्राम के बच्चों को लेकर आपकी क्या सोच है?
मैं समझती हंू कि कोई भी बच्चा ईश्वरीय कृति है। ये बच्चे किसी परिवार, समाज या देश की ही नहीं मानवता की भी धरोहर हैं। मैं इन बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा देने का प्रयत्न कर रही हूं। जिससे वे अपने व्यक्तित्व में पूर्णता, नैतिकता और आध्यत्मिकता के साथ-साथ अपनी राष्ट्रीय भूमिका भी निभाए। एक अच्छा और प्रमाणिक इंसान बनाने की प्रक्रिया ही हमारे वात्सल्य ग्राम की सोच है। मेरी यह कामना है कि वे देश और समाज के लिए जिएं। वे काम करें, धन कमाएं, किंतु स्वयं अकेले न खाकर आसपास के लोगों को खिलाकर खाएं।
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