आगरा एक ऐतिहासिक नगर है। यहां आप किसी भी मौसम में जाएं यहां की खूबसूरती आपको आकर्षित करेगी। आगरा का इतिहास मुख्यतः मुगल काल से मिलता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसका संबंध महर्षि अंगिरा से है। वैसे आगरा का जिक्र पहली बार महाभारत में मिलता है, जहां इसे ‘अग्रवाण’ या ‘अग्रवन’ कहा जाता था। ऐसा कहा जाता है कि पहले यह ‘आयग्रह’ नगर के नाम से भी जाना जाता था। आगरा की ऐतिहासिकता इसके कण-कण में समाई हुई। अगर आप मुगल काल के इतिहास से बातें करना चाहते हैं, वहां ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण कर उसकी वास्तुकला से रु-ब-रु होना चाहते हैं, दुनिया के सात अजूबों में से एक ताजमहल की खूबसूरती निहारना चाहते हैं और ऊंट की सवारी करना चाहते हैं तो आगरा जरूर घूमिए। सीतामढ़ी के निवासी संजीव कुमार जो ‘प्रथम प्रवक्ता’ पत्रिका के विशेष संवाददाता हैं। वे हाल ही में ऐतिहासिक नगरी आगरा की सैर कर लौटे हैं। पेश है उनके यात्रा की कहानी उन्हीं की जुबानी...
यात्रा करना और घूमना मुझे बहुत पसंद है। अब तक तो मैं कई जगहों की यात्राएं कर चुका हूं लेकिन अपनी शादी के बाद आगरा घूमना अविस्मरणीय अनुभव था। मुगल सम्राट सिकंदर लोदी ने 1506 ई. में यमुना नदी के तट पर आगरा शहर बसाया। आज यह कई खूबसूरत ऐतिहासिक धरोहरों के लिए जाना जाता है। लेकिन प्रसिद्ध तो यह विश्व के सात अजूबों में से एक ताज महल के लिए ही है। यही वजह है कि ताज महल के बारे में प्रसिद्ध शायर साहिर लुधियानवी ने लिखा है-
‘‘ये चमनज़ार, ये जमुना का किनारा ये महल
ये मुनक़्क़श, दर-ओ-दीवार, ये महराब ये ताक़।
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर,
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है म़ज़ाक।’’
साहिर ने भले ही अपने इस नज्म में ताजमहल को गरीबों के मुहब्बत का मजाक बताया हो लेकिन इसमें किसी को संदेह नहीं है कि यह शाहजहां के प्रेम की निशानी है। जिसे शाहजहां ने अपने प्रिय बेगम मुमताज महल की याद में बनवाया था। इसके अलावा आगरे का किला और फतेहपुर सीकरी की इमारतें विश्व की सांस्कृतिक धरोहर स्थल की सूची में शामिल हैं।
ऐसे ऐतिहासिक धरोहरों को पास से देखने, उसे महसूस करने और उससे बातें करने में जो आनंद आता है वह दुर्लभ है। वैसे यहां जून-जुलाई (गर्मी के महीने) को छोड़कर किसी भी महीने में जाया जा सकता है। अगर फरवरी महीने में घूमने का प्रोग्राम बना रहे हैं तो 18-27 फरवरी के दौरान जाने का कार्यक्रम बनाएं। क्योंकि इन दिनों वहां ताज महोत्सव होता है। वैसे हमारा जाना मई के तीसरे हफ्ते में हुआ था। अगर आप रेल मार्ग से आगरा जाना चाहते हैं तो वहां का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन आगरा कैंट है। मुझे रेल से सफर करना अच्छा लगता है इसलिए हमने पटना से दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़ी। अगले दिन सुबह हम दिल्ली पहुंचे। वहां एक रिश्तेदार के यहां हमलोग ठहरे। वहां से हमलोगों ने भाड़े पर टैक्सी लिया। अगला दिन शुक्रवार था। और हमें यह पता था कि शुक्रवार को ताजमहल बंद रहता है इसलिए हमलोगों ने उस दिन मथुरा और वृंदावन घूमने का निश्चय किया। हमारी यात्रा टैक्सी से सुबह 6 बजे शुरू हुई। सुबह-सुबह यात्रा करना अच्छा लग रहा था। सुबह-सुबह लोगों को जगकर अपने काम के लिए तैयार होते और जाते हुए देखना अच्छा लग रहा था। यात्रा के बीच में हमलोगों एक ढ़ाबे पर चाय पी। वहां चाय मिट्टी के कुल्हड़ में मिल रही थी। मुझे बहुत दिनों बाद कुल्हड़ में चाय पीने को मिला। लेकिन उस चाय को पीने में जो आनंद आया वह दुर्लभ था। चाय पीने के बाद हमलोग फिर अपनी टैक्सी से मथुरा के लिए चल पड़े।
सुबह 10 बजे हमलोग पौराणिक नगरी मथुरा पहुंचे। वहां हमलोगों ने इंटरनेशनल गेस्ट हाउस में एक रूम पहले से ही बुक करवा रखा था। रूम में सामान रखने के बाद सबसे पहले हमलोगों कृष्ण जन्मभूमि देखा। जिस कृष्ण को सिर्फ पौराणिक ग्रंथ के माध्यम से जानता था उसे हमलोगों ने उनकी जन्मभूमि देखकर महसूस किया। उसके बाद हमने कालिया दह देखा भगवान कृष्ण ने सर्पराज कालिया नाग को वंश में किया था। उसके बाद हमने उस यमुना किनारे के कदंब के पेड़ को देखा जिस पर बैठकर कृष्ण बांसुरी बजाते थे। फिर चिर घाट होते हुए कृष्णा की लीला भूमि सेवाकुंज पहुंचे। ऐसी मान्यता है कि वृंदावन में यही वह निधि वन है जहां कृष्ण राधा रानी और गोपियों के रास रचाते थे। यहां यह भी सुनने को मिला कि कृष्ण आज भी यहां रात्रि में रास लीला करते हैं। लेकिन जो कोई इस लीला को देखने की चेष्टा करते वह कुछ भी बताने लायक नहीं रहता। इस बात पर आश्चर्य करते हुए ईश्वर की महिमा का गुनगान और राधा-कृष्ण के अलौकिक प्रेम को स्मरण करते हुए अंत में बांके बिहारी का दर्शन किया। रात्रि विश्राम अपने होटल में किया।
अगले दिन सुबह 6 बजे आगरा के लिए निकला। 8 बजे ऐतिहासिक नगरी आगरा पहुंचा। नास्ता करने के बाद सुबह-सुबह ही हमलोग ताजमहल देखने पहुंचे। ताजमहल में प्रवेश करने से पहले ही इसके भव्यता का अंदाजा हमलोगों को होने लगा। ताज को एक लालबलुआ पत्थर के चबूतरे पर बने श्वेत संगमर्मर के चबूतरे पर बनाया गया है। इसे फारसी वास्तुकार उस्ताद ईसा खां के निर्देशन में यमुना किनारे बनाया गया। इसे बनाने में लगभग 20 हजार मजदूरों का अथक परिश्रम और लगभग 22 वर्षों(1630-52) का समय लगा। यहां मुगल शैली के चार बाग भी हैं जो ताजमहल को और अधिक संुदर बनाते हैं। इसके मुख्य द्वार पर कुरआन की आयतें खुदी हुई हैं। उसके ऊपर बाइस छोटे गुंबद हैं, जो कि इसके निर्माण के वर्षों की संख्या बताते हैं। लेकिन ताज की सुंदरता, इसके इमारत के बराबर ऊंचे महान गुंबद में बसी है। यह 60 फीट व्यास का, 80 फीट ऊंचा है। इसी के नीचे मुमताज की कब्र है। इसके बराबर में ही शाहजहां का भी कब्र है। ताजमहल के अंदरूनी भाग में रत्नों व बहुमूल्य पत्थरों का काम मुगल स्थापत्य कला से हमें रूबरू कराता है। ताजमहल के पिछवाड़े बहती यमुना नदी हालांकि अब स्वच्छ नहीं है फिर भी मनोरम और सुंदर दिखती है।
उसके बाद हमलोग आगरे का किला देखने गए। इसे कभी आगरे का लाल किला भी कहा जाता था। आगरा के किले से भी ताजमहल को देखा जा सकता है। यहां से शाहजहां अपने जीवन के अंतिम आठ वर्षों में (अपने पुत्र औरंगजेब द्वारा कैद किए जाने के बाद) ताजमहल को देखा करता था, जहां से यह हवा में तैरता हुआ प्रतीत होता है।
आगरे का किला शहर के बीचोंबीच है। इसकी बनावट अर्ध-चद्राकार है जिसे अकबर ने 1565 में बनवाया था। बाद में शाहजहां ने इस किले का पुनरूद्धार लाल बलुआ पत्थर से करवाया। और इसे किले से महल के रूप में बदला। यहां संगमर्मर पर महीन नक्काशी का कार्य किया गया है जो किले की सुंदरता में चार चांद लगाता है। इस किले की मुख्य इमारतों में मोती मस्जिद, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, जहांगीर महल, खास महल, शीश महल एवं मुसम्मन बुर्ज आते हैं। हर महल अपने आप में इतिहास की स्मृतियों को समेटे हुए है। इस किले की पूरी परिधि है 2.4 किलोमीटर है, जो दोहरे परकोटे वाली चारदीवारी से घिरी है। इस दीवार में छोटे अंतरालों पर बुर्जियां हैं। इस दीवार को एक 9 मीटर चौड़ी व 10 मीटर गहरी खाई घेरे हुए है।
रात्रि को होटल में विश्राम किया और अगले दिन सुबह फतेपुर सीकरी देखने निकला। यह आगरा से 35 किलोमीटर दूर है। इसे मुगल सम्राट अकबर ने बसाया था। यहां कई भव्य इमारतें जो हमारे स्वर्णिम इतिहास से हमें रूबरू कराता है। यहां का बुलंद दरवाजा, एक वैश्विक धरोहर है। यह बुलंद दरवाजा मुगल सम्राट अबकर ने बनवाया था। यह लाल और बलुआ पत्थर से बना है। और इसे काले और सफेद संगमर्मर की नक्कासी से सजाया गया है। इसके अलावा कई अन्य दर्शनीय स्थल भी है जहां इतिहास के पन्नों को पलटा जा सकता है। इसी दिन हमें दिल्ली के लिए लौटना पड़ा। लौटते वक्त हमें अलौकिक प्रेम की नगरी से लौकिक प्रेम की नगरी तक की यात्रा करना इस यात्रा को अविस्मणीय बना दिया।
क्विक व्यू
पटना से आगरा (उत्तर प्रदेश) की दूरी लगभग 884 किलोमीटर है।
कैसे पहुंचें
पटना से आगरा आप ट्रेन से भी जा सकते हैं। पटना जंक्शन से पटना-मथुरा एक्सप्रेस 11.50 बजे है। यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन आगरा कैंट है। यहां देश के किसी भी शहर से आसानी से पहुंचा जा सकता है। यहां हवाई मार्ग से भी जाया जा सकता है। आगरा से 7 किलोमीटर की दूरी पर हवाई अड्डा स्थित है। यह देश के कई प्रमुख शहरों से जुड़ा है।
कब जाएं
वैसे तो यहां कभी भी जा सकते हैं लेकिन फरवरी में जाना बढ़िया रहेगा। क्योंकि 18-27 फरवरी के दौरान ताज महोत्सव का आयोजन किया जाता है।
होटल
यहां पर्यटकों के ठहरने के लिए कई होटलें हैं। जो आपके बजट के अनुसार हो वहां ठहर सकते हैं। यहां के अच्छे होटलों में कठपुतली नृत्य एवं परंपरा के अनुसार भोजन भी परोसा जाता है। यहां अनेक पर्यटकों को स्थानीय निवासियों द्वारा बनाए गए पारंपरिक व्यंजन लुभाते हैं।
अन्य दर्शनीय स्थल
आगरे का किला, फतेहपुर सीकरी, जामा मस्जिद, बुलंद दरवाजा, एतमादुद्दौला का मकबरा, सिकंदरा, मरियम मकबरा, चीनी का रोजा, रामबाग, दयाल बाग और मेहताब बाग आदि देखकर इतिहास के यादों को संजोया जा सकता है। यहां से मथुरा और वृंदावन भी जाया जा सकता है।
‘‘ये चमनज़ार, ये जमुना का किनारा ये महल
ये मुनक़्क़श, दर-ओ-दीवार, ये महराब ये ताक़।
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर,
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है म़ज़ाक।’’
साहिर ने भले ही अपने इस नज्म में ताजमहल को गरीबों के मुहब्बत का मजाक बताया हो लेकिन इसमें किसी को संदेह नहीं है कि यह शाहजहां के प्रेम की निशानी है। जिसे शाहजहां ने अपने प्रिय बेगम मुमताज महल की याद में बनवाया था। इसके अलावा आगरे का किला और फतेहपुर सीकरी की इमारतें विश्व की सांस्कृतिक धरोहर स्थल की सूची में शामिल हैं।
ऐसे ऐतिहासिक धरोहरों को पास से देखने, उसे महसूस करने और उससे बातें करने में जो आनंद आता है वह दुर्लभ है। वैसे यहां जून-जुलाई (गर्मी के महीने) को छोड़कर किसी भी महीने में जाया जा सकता है। अगर फरवरी महीने में घूमने का प्रोग्राम बना रहे हैं तो 18-27 फरवरी के दौरान जाने का कार्यक्रम बनाएं। क्योंकि इन दिनों वहां ताज महोत्सव होता है। वैसे हमारा जाना मई के तीसरे हफ्ते में हुआ था। अगर आप रेल मार्ग से आगरा जाना चाहते हैं तो वहां का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन आगरा कैंट है। मुझे रेल से सफर करना अच्छा लगता है इसलिए हमने पटना से दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़ी। अगले दिन सुबह हम दिल्ली पहुंचे। वहां एक रिश्तेदार के यहां हमलोग ठहरे। वहां से हमलोगों ने भाड़े पर टैक्सी लिया। अगला दिन शुक्रवार था। और हमें यह पता था कि शुक्रवार को ताजमहल बंद रहता है इसलिए हमलोगों ने उस दिन मथुरा और वृंदावन घूमने का निश्चय किया। हमारी यात्रा टैक्सी से सुबह 6 बजे शुरू हुई। सुबह-सुबह यात्रा करना अच्छा लग रहा था। सुबह-सुबह लोगों को जगकर अपने काम के लिए तैयार होते और जाते हुए देखना अच्छा लग रहा था। यात्रा के बीच में हमलोगों एक ढ़ाबे पर चाय पी। वहां चाय मिट्टी के कुल्हड़ में मिल रही थी। मुझे बहुत दिनों बाद कुल्हड़ में चाय पीने को मिला। लेकिन उस चाय को पीने में जो आनंद आया वह दुर्लभ था। चाय पीने के बाद हमलोग फिर अपनी टैक्सी से मथुरा के लिए चल पड़े।
सुबह 10 बजे हमलोग पौराणिक नगरी मथुरा पहुंचे। वहां हमलोगों ने इंटरनेशनल गेस्ट हाउस में एक रूम पहले से ही बुक करवा रखा था। रूम में सामान रखने के बाद सबसे पहले हमलोगों कृष्ण जन्मभूमि देखा। जिस कृष्ण को सिर्फ पौराणिक ग्रंथ के माध्यम से जानता था उसे हमलोगों ने उनकी जन्मभूमि देखकर महसूस किया। उसके बाद हमने कालिया दह देखा भगवान कृष्ण ने सर्पराज कालिया नाग को वंश में किया था। उसके बाद हमने उस यमुना किनारे के कदंब के पेड़ को देखा जिस पर बैठकर कृष्ण बांसुरी बजाते थे। फिर चिर घाट होते हुए कृष्णा की लीला भूमि सेवाकुंज पहुंचे। ऐसी मान्यता है कि वृंदावन में यही वह निधि वन है जहां कृष्ण राधा रानी और गोपियों के रास रचाते थे। यहां यह भी सुनने को मिला कि कृष्ण आज भी यहां रात्रि में रास लीला करते हैं। लेकिन जो कोई इस लीला को देखने की चेष्टा करते वह कुछ भी बताने लायक नहीं रहता। इस बात पर आश्चर्य करते हुए ईश्वर की महिमा का गुनगान और राधा-कृष्ण के अलौकिक प्रेम को स्मरण करते हुए अंत में बांके बिहारी का दर्शन किया। रात्रि विश्राम अपने होटल में किया।
अगले दिन सुबह 6 बजे आगरा के लिए निकला। 8 बजे ऐतिहासिक नगरी आगरा पहुंचा। नास्ता करने के बाद सुबह-सुबह ही हमलोग ताजमहल देखने पहुंचे। ताजमहल में प्रवेश करने से पहले ही इसके भव्यता का अंदाजा हमलोगों को होने लगा। ताज को एक लालबलुआ पत्थर के चबूतरे पर बने श्वेत संगमर्मर के चबूतरे पर बनाया गया है। इसे फारसी वास्तुकार उस्ताद ईसा खां के निर्देशन में यमुना किनारे बनाया गया। इसे बनाने में लगभग 20 हजार मजदूरों का अथक परिश्रम और लगभग 22 वर्षों(1630-52) का समय लगा। यहां मुगल शैली के चार बाग भी हैं जो ताजमहल को और अधिक संुदर बनाते हैं। इसके मुख्य द्वार पर कुरआन की आयतें खुदी हुई हैं। उसके ऊपर बाइस छोटे गुंबद हैं, जो कि इसके निर्माण के वर्षों की संख्या बताते हैं। लेकिन ताज की सुंदरता, इसके इमारत के बराबर ऊंचे महान गुंबद में बसी है। यह 60 फीट व्यास का, 80 फीट ऊंचा है। इसी के नीचे मुमताज की कब्र है। इसके बराबर में ही शाहजहां का भी कब्र है। ताजमहल के अंदरूनी भाग में रत्नों व बहुमूल्य पत्थरों का काम मुगल स्थापत्य कला से हमें रूबरू कराता है। ताजमहल के पिछवाड़े बहती यमुना नदी हालांकि अब स्वच्छ नहीं है फिर भी मनोरम और सुंदर दिखती है।
उसके बाद हमलोग आगरे का किला देखने गए। इसे कभी आगरे का लाल किला भी कहा जाता था। आगरा के किले से भी ताजमहल को देखा जा सकता है। यहां से शाहजहां अपने जीवन के अंतिम आठ वर्षों में (अपने पुत्र औरंगजेब द्वारा कैद किए जाने के बाद) ताजमहल को देखा करता था, जहां से यह हवा में तैरता हुआ प्रतीत होता है।
आगरे का किला शहर के बीचोंबीच है। इसकी बनावट अर्ध-चद्राकार है जिसे अकबर ने 1565 में बनवाया था। बाद में शाहजहां ने इस किले का पुनरूद्धार लाल बलुआ पत्थर से करवाया। और इसे किले से महल के रूप में बदला। यहां संगमर्मर पर महीन नक्काशी का कार्य किया गया है जो किले की सुंदरता में चार चांद लगाता है। इस किले की मुख्य इमारतों में मोती मस्जिद, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, जहांगीर महल, खास महल, शीश महल एवं मुसम्मन बुर्ज आते हैं। हर महल अपने आप में इतिहास की स्मृतियों को समेटे हुए है। इस किले की पूरी परिधि है 2.4 किलोमीटर है, जो दोहरे परकोटे वाली चारदीवारी से घिरी है। इस दीवार में छोटे अंतरालों पर बुर्जियां हैं। इस दीवार को एक 9 मीटर चौड़ी व 10 मीटर गहरी खाई घेरे हुए है।
रात्रि को होटल में विश्राम किया और अगले दिन सुबह फतेपुर सीकरी देखने निकला। यह आगरा से 35 किलोमीटर दूर है। इसे मुगल सम्राट अकबर ने बसाया था। यहां कई भव्य इमारतें जो हमारे स्वर्णिम इतिहास से हमें रूबरू कराता है। यहां का बुलंद दरवाजा, एक वैश्विक धरोहर है। यह बुलंद दरवाजा मुगल सम्राट अबकर ने बनवाया था। यह लाल और बलुआ पत्थर से बना है। और इसे काले और सफेद संगमर्मर की नक्कासी से सजाया गया है। इसके अलावा कई अन्य दर्शनीय स्थल भी है जहां इतिहास के पन्नों को पलटा जा सकता है। इसी दिन हमें दिल्ली के लिए लौटना पड़ा। लौटते वक्त हमें अलौकिक प्रेम की नगरी से लौकिक प्रेम की नगरी तक की यात्रा करना इस यात्रा को अविस्मणीय बना दिया।
क्विक व्यू
पटना से आगरा (उत्तर प्रदेश) की दूरी लगभग 884 किलोमीटर है।
कैसे पहुंचें
पटना से आगरा आप ट्रेन से भी जा सकते हैं। पटना जंक्शन से पटना-मथुरा एक्सप्रेस 11.50 बजे है। यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन आगरा कैंट है। यहां देश के किसी भी शहर से आसानी से पहुंचा जा सकता है। यहां हवाई मार्ग से भी जाया जा सकता है। आगरा से 7 किलोमीटर की दूरी पर हवाई अड्डा स्थित है। यह देश के कई प्रमुख शहरों से जुड़ा है।
कब जाएं
वैसे तो यहां कभी भी जा सकते हैं लेकिन फरवरी में जाना बढ़िया रहेगा। क्योंकि 18-27 फरवरी के दौरान ताज महोत्सव का आयोजन किया जाता है।
होटल
यहां पर्यटकों के ठहरने के लिए कई होटलें हैं। जो आपके बजट के अनुसार हो वहां ठहर सकते हैं। यहां के अच्छे होटलों में कठपुतली नृत्य एवं परंपरा के अनुसार भोजन भी परोसा जाता है। यहां अनेक पर्यटकों को स्थानीय निवासियों द्वारा बनाए गए पारंपरिक व्यंजन लुभाते हैं।
अन्य दर्शनीय स्थल
आगरे का किला, फतेहपुर सीकरी, जामा मस्जिद, बुलंद दरवाजा, एतमादुद्दौला का मकबरा, सिकंदरा, मरियम मकबरा, चीनी का रोजा, रामबाग, दयाल बाग और मेहताब बाग आदि देखकर इतिहास के यादों को संजोया जा सकता है। यहां से मथुरा और वृंदावन भी जाया जा सकता है।

