शनिवार, 20 दिसंबर 2008
शीला दीक्षित और विजय कुमार मल्होत्रा से बातचीत
दिल्ली विधानसभा चुनाव में 'हैट्रिक' बनाने वाली कांग्रेस पार्टी की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से हमारे संवाददाता संजीव कुमार ने जीत के कारणों, राष्ट्रमंडल खेलों और भविष्य की रूपरेखा को लेकर विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश-
- दिल्ली में लगातार तीसरी जीत को किस रूप में देखती हैं?
कांग्रेस पार्टी की लगातार तीसरी जीत बहुत बड़ा मायने रखती है। दिल्ली की जीत, विकास की जीत है। इतनी बड़ी जीत की हमें आशा नहीं थी, लेकिन जिस तरह से जनता ने हमारी सरकार के प्रति विश्वास व्यक्त किया है, उससे लगता है कि जनता ने हमारे काम को सराहा है। कांग्रेस पार्टी की यह शानदार विजय उसी का परिणाम है। इसके लिए मैं जनता की आभारी हूं। वैसे मेरा अंतर्मन जीत के प्रति आश्वस्त था।
- दिल्ली में जीत के पीछे आप क्या कारण मानती हैं?
वैसे तो जीत के पीछे अनेक कारण और मुद्दे होते हैं। लेकिन मेरे विचार से यह जीत 'काम को ईनाम' है। इसके अलावा सोनिया जी का सफल नेतृत्व, सही उम्मीदवारों का चयन एवं कार्यकर्ताओं का उत्साह भी सम्मिलित रूप से जीत के कारक बने।
- भाजपा ने जिस तरह आतंकवाद और महंगाई का मुद्दा उठाया था, क्या उसका असर कांग्रेस की जीत पर भी पड़ा?
नहीं। महंगाई और आतंकवाद जैसे भावनात्मक मुद्दे उठाकर अब जनता को बहलाया नहीं जा सकता। जनता अब समझदार हो चुकी है। इसलिए उसने भाजपा के महंगाई और आतंकवाद के मुद्दे को पूरी तरह नकार दिया। उसे पता है कि आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है और महंगाई वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ घटती-बढ़ती है।
- तीसरे कार्यकाल में आपकी प्राथमिकताएं क्या होंगी?
जनता ने जिस विश्वास के साथ हमें वोट किया है, उस पर पूरी तरह खरा उतरने का प्रयास करूंगी। दिल्ली में और अच्छे व बेहतर विकास के कार्य करने का प्रयास करूंगी। राष्ट्रमंडल खेल 2010 में होने वाले हैं। सबसे पहले उसे सफलतापूर्वक पूरा करवाने की भी जिम्मेदारी है। इसके अलावा परिवहन और प्रदूषण ऐसे क्षेत्र हैं, जहां और अधिक काम करने की जरूरत है।
- बीआरटी कॉरिडोर और अनधिकृत कॉलोनियों को लेकर सरकार का नजरिया क्या होगा?
बीआरटी कॉरिडोर की पुन: समीक्षा की जाएगी। यदि इस पर कार्य करना उचित होगा, तो इस प्रोजेक्ट पर कार्य किया जाएगा, अन्यथा इसे बंद कर दिया जाएगा। जहां तक अनधिकृत कॉलोनियों के नियमितीकरण का सवाल है तो इसके लिए हमने पहले ही 1639 कॉलोनियों को प्रोविजनल सर्टिफिकेट दे दिया है। इन कॉलोनियों में सड़कें, बिजली, पानी और सीवर के लिए 2800 करोड़ रुपये हमने अपने घोषणा-पत्र में निर्धारित किए हैं। इससे लगभग 50 लाख लोगों का जीवन स्तर अच्छा होगा।
हां, महंगाई आतंकवाद नहीं चले
चुनावी आकलनों के आधार पर भाजपा को जीत का भरोसा था, लेकिन उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा। चुनाव से ठीक पहले भाजपा द्वारा विजय कुमार मल्होत्रा को मुख्यमंत्री घोषित करने के बाद भी दिल्ली में कोई करिश्मा नहीं हो सका। भाजपा की करारी हार के बाद भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार विजय कुमार मल्होत्रा से हमारे संवाददाता संजीव कुमार ने बात की। बातचीत के प्रमुख अंश-
- आप 35 से 40 सीट जीतने की बात कर रहे थे, क्या हुआ?
हमें जो फीड बैक मिला था, उसके अनुसार भाजपा को 35 से 40 सीट मिल रही थी, क्योंकि 'एंटीइंकमबेंसी' फैक्टर भाजपा के पक्ष में था। लेकिन चुनाव के परिणाम के बाद हमारी धारणा निर्मूल साबित हुई। हमें सिर्फ 23 सीटें मिल सकीं, जो हमारी अपेक्षा से बहुत कम हैं। मेरे विचार से कांग्रेस की जीत में विकास का मुद्दा प्रमुख रहा। वह मास्टर प्लान में से अनेक कार्य पूर्ण कर चुकी है और अनेक पर कार्य प्रारंभ है। इसे देखते हुए ही जनता ने उसे वोट दिया है।
- क्या भाजपा का महंगाई और आतंकवाद का मुद्दा नहीं चला?
चुनाव परिणाम के बाद तो यही कहा जा सकता है कि महंगाई और आतंकवाद का मुद्दा नहीं चला। वैसे प्रत्येक चुनाव में अनेक मुद्दे होते हैं। अब कौन मुद्दा चला और कौन नहीं चला, इसकी पड़ताल में हम लोग लगे हुए हैं। जो भी होगा, हम आप लोगों को बताएंगे।
- ऐसा कहा जा रहा है कि उम्मीदवारों का चुनाव भी भाजपा की हार की प्रमुख वजह रही?
नहीं। उम्मीदवारों का चुनाव पार्टी के प्रदेश अधयक्ष और संसदीय कमेटी के मध्य तय होता है। हम लोगों ने अधिकतर उपयुक्त उम्मीदवारों को ही टिकट दिया था। हां, कुछ लोग पार्टी से अवश्य नाराज हुए, जिन्हें हम मनाने में सफल नहीं हो सके। कुछ सीटों पर इसका खामियाजा पार्टी को अवश्य हुआ है।
- दिल्ली में भाजपा की हार के बाद आप केंद्र की राजनीति करेंगे या राज्य की राजनीति?
यह निर्णय लेना पार्टी की संसदीय कमेटी का काम है। मैं इस हार से सीख लेने की कोशिश कर रहा हूं। हार के लिए जिम्मेदार कारणों की पहचान करने में लगा हुआ हूं कि वह कौन सा ऐसा क्षेत्र था, जहां हम गलत साबित हुए।
- क्या आप विधानसभा में विपक्ष के नेता होंगे या लोकसभा में दल के उपनेता?
यह निर्णय करना भी पार्टी के नेताओं का काम है। मैं पार्टी के निर्णय का पालन करूंगा।
दिल्ली विधानसभा चुनाव का परिणाम
दिल्ली के दिल में शीला ही
संजीव कुमार
मतदाताओं ने विकास के मुद्दे पर मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस को लगातार तीसरी बार राजधानी दिल्ली की सत्ताा सौंप दी है। यह परिणाम सारे चुनावी सर्वेक्षणों और मीडिया विश्लेषकों को मुंह चिढ़ाता प्रतीत हो रहा है
दिल्ली विधानसभा चुनाव का परिणाम पूरी तरह चौंकाने वाला है। यह परिणाम सारे चुनावी सर्वेक्षणों और मीडिया विश्लेषकों को मुंह चिढ़ाता प्रतीत हो रहा है। दिल्ली चुनाव में मतदाताओं ने विकास के मुद्दे पर मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस को लगातार तीसरी बार राजधानी दिल्ली की सत्ताा सौंप दी है। भाजपा के आतंकवाद और महंगाई के मुद्दे को यहां की जनता ने सिरे से नकारते हुए विधानसभा की 69 सींटों में से 42 सीटों पर विजय दिलाई, जबकि भाजपा को सिर्फ 23 सीटों से संतोष करना पड़ा। वैसे 2003 के विधानसभा चुनाव से इस चुनाव की तुलना करें तो पाते हैं कि कांग्रेस को 5 सीटों की हानि और भाजपा को 3 सीटों का लाभ हुआ है। गौरतलब है कि 2003 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 47 और भाजपा को 20 सीटें मिली थीं। इस चुनाव में बसपा को 2 और अन्य को 2 सीटें मिली हैं। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित सहित उनके मंत्रिमंडल के सभी सदस्य डॉ. ए.के. वालिया, अरविंदर सिंह लवली, मंगतराम सिंघल, योगानंद शास्त्री, हारून यूसुफ और राजकुमार चौहान भारी मतों से विजयी हुए हैं। इनके अलावा पार्टी के तीनों प्रदेश अधयक्ष चौ. प्रेम सिंह, सुभाष चोपड़ा और रामबाबू शर्मा चुनाव जीतने वालों में प्रमुख हैं।
दिल्ली विधानसभा चुनाव में पूरी तैयारी से आई मायावती की पार्टी बसपा को बदरपुर और गोकुलपुरी की सीट मिली है, जहां से क्रमश: रामसिंह नेताजी और सुरेंद्र कुमार विजयी हुए हैं। मटिया महल सीट रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी को मिली है, तो नजफगढ़ में इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) ने जीत हासिल की है। यहां से क्रमश: शोएब इकबाल और भरत सिंह विजयी हुए हैं। इतना ही नहीं, दिल्ली में बसपा 2 सीटें जीतने के साथ पांच सीटों पर नंबर दो पर रही है तो लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल ओखला विधानसभा सीट पर दूसरे नंबर पर रही है। इस प्रकार क्षेत्रीय पार्टियों ने इस चुनाव में राजधानी दिल्ली में भी अपनी उपस्थिति का अहसास कराया है। दूसरी तरफ जनता ने भी दोनों प्रमुख दलों को यह अहसास कराया है कि आप लोग विकास की राजनीति करें, अन्यथा जनता का आपको समर्थन नहीं मिलेगा।
अगर कांग्रेस की सीटों का आकलन करें तो पाते हैं कि इस चुनाव में कांग्रेस का दिल्ली के सभी क्षेत्रों में समान रूप से दबदबा कायम रहा है। विश्लेषण के खयाल से पूरी दिल्ली को पांच क्षेत्रों में बांटा जा सकता है- पूर्वी दिल्ली, पश्चिमी दिल्ली, उत्तारी दिल्ली, दक्षिणी दिल्ली और मध्य दिल्ली। पूर्वी दिल्ली के अंतर्गत 16 सीटें आती हैं। इनमें से 10 सीटों पर कांग्रेस और 5 सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की है, जबकि एक सीट बसपा को मिली है। गौरतलब है कि भाजपा ने तीन सीटों पर बहुत कम अंतर से जीत दर्ज की है। अब तक स्वच्छ छवि रखने वाले भाजपा के प्रदेश अधयक्ष डॉ. हर्षवर्धन को कांग्रेस की प्रत्याशी दीपिका खुल्लर ने अच्छी टक्कर दी और उन्हें बमुश्किल सिर्फ 3204 वोटों से ही जीत हासिल हुई। पूर्वी दिल्ली में कांग्रेस ने लक्ष्मीनगर, गांधीनगर, विश्वास नगर, पटपड़गंज, कोंडली, शहादरा, सीलमपुर, रोहतास नगर, सीमापुरी और मुस्तफाबाद सीट पर जीत दर्ज की है, जबकि भाजपा को कृष्णानगर, करावल नगर, घोंडा, बाबरपुर और त्रिलोकपुरी की सीट पर जीत हासिल हुई है। इस क्षेत्र में गोकुलपुरी की सीट बसपा को मिली है। यहां से बसपा के सुरेंद्र कुमार ने विजय पाई है। पटपड़गंज सीट की काफी चर्चा थी, क्योंकि यहां से दो युवा नेता पहली बार मैदान-ए-जंग में थे। ये दोनों पूर्व में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के नेता रह चुके हैं। यहां से नकुल भारद्वाज से कई चक्रों तक पीछे चल रहे कांग्रेस के अनिल चौधरी आखिरकार जीत गए। इन दोनों के बीच जीत का अंतर बहुत ही कम रहा। सीमापुरी से वीर सिंह घिंगान ने 19268 वोटों से जीत हासिल की है। इनके अलावा कांग्रेस के ए.के. वालिया, अरविंद सिंह लवली, मतीन अहमद, नसीब सिंह और रामबाबू शर्मा बड़े अंतर से विजयी हुए, जबकि भाजपा के मोहन सिंह बिष्ट ने 25135 वोटों से जीत दर्ज की।
पश्चिम दिल्ली के अंतर्गत 16 सीटें हैं। इनमें से 15 के परिणाम घोषित हुए हैं। यहां आठ सीटें कांग्रेस, 6 सीटें भाजपा और 1 सीट इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के खाते में गई हैं। यहां से जीतने वालों में दिल्ली के शहरी विकास मंत्री राजकुमार चौहान सहित मुकेश शर्मा, महाबल मिश्रा, सुमेश शौकीन, बिजेंदर सिंह, मालाराम गंगवाल, दयानंद चंदेला और नंद किशोर जैसे कांग्रेस प्रत्याशी शामिल हैं। भाजपा के प्रो. जगदीश मुखी, जनकपुरी से तथा हरिनगर से हरशरण सिंह बल्ली लगातार चौथी बार विजयी हुए हैं। बाहरी दिल्ली में मटियाला, बिजवासन, पालम और दिल्ली कैंट की सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की है। दूसरी तरफ, भाजपा का इनेलो के साथ चुनावी तालमेल न होने के कारण नजफगढ़ की सीट गंवानी पड़ी है। यहां से इनेलो के भरत सिंह ने जीत दर्ज की।
उत्तारी दिल्ली की 16 सीटों में से नौ सीट पर कांग्रेस और सात सीटों पर भाजपा के प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की है। नरेला, बादली, बवाना, सुल्तानपुर माजरा, मॉडल टाउन, तिमारपुर, आदर्श नगर, त्रिनगर और वजीरपुर की सीट कांग्रेस के खाते में गई है, जबकि रिठाला, किराड़ी, रोहिणी, बुराड़ी, शालीमार बाग और शकूरबस्ती की सीट भाजपा के पाले में गई। रोहिणी, भाजपा का गढ़ माना जाता है। वहां से भाजपा के जय भगवान अग्रवाल ने चौथी बार जीत दर्ज की है। वहीं सुल्तानपुर माजरा से कांग्रेस के जयकिशन ने दूसरी बार जीत दर्ज की। कांग्रेस के धाकड़ नेता एस.सी. वत्स शकूरबस्ती से चुनाव हार गए हैं तो मॉडल टाउन से कुंवर करण सिंह ने जीत दर्ज की है। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मांगेराम गर्ग को इस बार वजीरपुर से हार का स्वाद चखना पड़ा है। आदर्श नगर से दिल्ली सरकार के मंत्री मंगतराम सिंघल चुनाव जीत गए, लेकिन इस बार जीत का अंतर बहुत कम रहा।
दक्षिणी दिल्ली में भी कांग्रेस का दबदबा कायम रहा। यहां की 14 सीटों में से 10 सीटों पर कांग्रेस ने कब्जा किया, जबकि तीन सीटों पर भाजपा और एक सीट पर बसपा ने जीत दर्ज की। जंगपुरा, कस्तूरबा नगर, ओखला, मालवीय नगर, आरके पुरम, कालकाजी, देवली, अंबेडकर नगर, छतरपुर और महरौली सीट कांग्रेस के खाते में गई। वहीं ग्रेटर कैलाश, तुगलकाबाद और संगम विहार की सीट पर भाजपा उम्मीदवार विजयी रहे हैं। बदरपुर सीट पर बसपा के उम्मीदवार राम सिंह नेताजी ने जीत दर्ज की है। जंगपुरा सीट से तरविंदर सिंह मारवाह ने लगातार तीसरी बार जीत दर्ज की, तो लगातार तीन बार चुनाव जीतने वाले भाजपा के सुशील चौधरी को कस्तूरबा नगर से हार का स्वाद चखना पड़ा है। इन्हें युवा नेता नीरज बसोया ने हराया है। भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार विजय कुमार मल्होत्रा ने ग्रेटर कैलाश से जीत दर्ज की है। इनके अलावा भाजपा के एचसीएल गुप्ता और रमेश बिधूड़ी ने भी संगम विहार और तुगलकाबाद से जीत दर्ज की है।
मध्य दिल्ली के अंतर्गत 8 निर्वाचन क्षेत्र हैं, जिनमें से 5 सीटों पर कांग्रेस, दो सीटों पर भाजपा और एक सीट पर लोक जनशक्ति पार्टी के उम्मीदवार विजयी रहे हैं। सदर बाजार, चांदनी चौक, बल्लीमारान, पटेल नगर, नई दिल्ली की सीट पर कांग्रेस के प्रत्याशी विजयी रहे तो करोलबाग और मोती नगर सीट पर भाजपा प्रत्याशी। और मटिया महल की सीट लोक जनशक्ति पार्टी के खाते में गई है। गौरतलब है कि इस सीट से शोएब इकबाल ने चौथी बार जीत दर्ज की है। मध्य दिल्ली इस खयाल से और भी महत्तवपूर्ण है, क्योंकि इस क्षेत्र से दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित खड़ी थीं और उन्होंने भाजपा के प्रत्याशी विजय जौली को हराया है। इनके अलावा दिल्ली के परिवहन मंत्री हारून यूसुफ ने बल्लीमारान सीट से भाजपा के प्रत्याशी मोतीलाल सोढ़ी को धूल चटाई है। वहीं चांदनी चौक सीट से कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी प्रहलाद सिंह साहनी ने तीसरी बार विजय दर्ज की है। दिल्ली
कुल सीटें-70
पार्टी 2003 2008
कांग्रेस 47 43 (-4)
भाजपा 20 23 (+3)
बसपा 0 2
अन्य 3 2
डॉ।हर्षवर्धन, डॉ.जगदीश मुखी, हरशरण सिंह बल्ली, जयभगवान अग्रवाल, राजकुमार चौहान, मुकेश शर्मा, चौ. प्रेम सिंह, ए.के. वालिया, मतीन अहमद, हारून यूसुफ, शोएब इकबाल, साहिब सिंह चौहान।
तीसरी बार जीतने वाले विधायक
शीला दीक्षित, तरविंदर सिंह मारवाह, महाबल मिश्र, परवेज हाशमी, सुभाष चोपड़ा, डॉ. योगानंद शास्त्री, मालाराम गंगवाल, अमरीश गौतम, अरविंदर सिंह लवली, नसीब सिंह, नरेंद्रनाथ, वीर सिंह झिंगान, प्रहलाद सिंह साहनी, कंवर करण सिंह, राजेश जैन।
सबसे ज्यादा अंतर से जीते
अरविंदर सिंह लवली (गांधी नगर) - 31925 वोट
राजकुमार चौहान (मंगोलपुरी) - 29863 वोट
हरशरण सिंह बल्ली (हरिनगर) - 28758 वोट
कुलवंत राणा (नरेला) - 26346 वोट
मतीन अहमद (सीलमपुर) - 26274 वोट
जयभगवान अग्रवाल (रोहिणी) -25774 वोट
ए.के. वालिया (लक्ष्मीनगर)- 22397 वोट
सबसे कम अंतर से जीते
दयानंद चंदेला (राजौरी गार्डन) - 46 वोट
परवेज हाशमी (ओखला) - 541 वोट
साहिब सिंह चौहान (घाेंडा) - 580 वोट
सुनील कुमार वैद्य (त्रिलोकपुरी) - 654 वोट
अनिल चौधरी (पटपड़गंज) - 663 वोट
जसवंत राणा (नरेला) - 835 वोट
नंद किशोर (विकासपुरी) - 943 वोट
मंगलवार, 2 दिसंबर 2008
लिब्राहन आयोग
संजीव कुमार
लिब्राहन आयोग का कार्यकाल बढ़ने से भले ही भारतीय जनता पार्टी ने फिलहाल राहत की सांस ली हो, लेकिन अगर इस आयोग की रिपोर्ट अगले लोकसभा चुनाव से पहले आती है, तो निश्चय ही भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी?
लिब्राहन आयोग, वह आयोग है जिसका गठन अयोधया में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विधवंस की जांच के लिए किया गया था। गौरतलब है कि 6 दिसंबर-1992 को अयोधया में बाबरी मस्जिद को तोड़ा दिया गया था। मस्जिद विध्वंस के दस दिनों के अंदर ही 16 दिसंबर-1992 को गृह मंत्रालय के आदेश से न्यायाधीश एम.एस. लिब्राहन की अधयक्षता में इस आयोग का गठन हुआ। आयोग को इस घटना के कारणों और परिस्थितियों की जांच करनी थी और यह पता लगाना था कि इस घटना को अंजाम देने में कौन-कौन लोग शामिल थे। गौरतलब है कि आयोग को सरकार की तरफ से जांच के लिए सिर्फ तीन महीने का समय दिया गया था, लेकिन आयोग ने 16 वर्षों के बाद भी अपनी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को नहीं सौंपी है।
ऐसे में इस आयोग पर प्रश्नचिह्न उठने लगा है। आखिर वह कौन-सा कारण है, जिसके चलते आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने में देरी हो रही है? घटना के इतने दिनों बाद, क्या इस जांच रिपोर्ट का कोई इंतजार कर भी रहा है या नहीं? अब तक इस आयोग पर भारत सरकार का 746.67 लाख रुपये खर्च हो चुका है। ऐसे में यह भी प्रश्न उठता है कि अगर यह आयोग समय पर अपनी रिपोर्ट नहीं दे सकता तो इस पर इतने पैसे की बरबादी क्यों? क्या अब इसे भंग नहीं कर दिया जाना चाहिए? मेरे विचार में अब लिब्राहन आयोग को भंग कर देने में ही देश और जनता दोनों की भलाई है। सिर्फ यही आयोग नहीं, बल्कि उन सभी आयोगों को भंग कर दिया जाना चाहिए, जो तय समय सीमा के अंदर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने में असमर्थ रहे हैं अथवा वैसे आयोग, जिनका कार्यकाल अनेक बार बढ़ाया जा चुका है। अकेले लिब्राहन आयोग पर ही आम जनता की गाढ़ी कमाई की बड़ी धनराशि खर्च हो चुकी है। अगर देश के अंदर बने सभी आयोगों पर सरकारी व्यय का हिसाब लगाया जाए तो खर्च अरबों-खरबों में पहुंच जाएगा। क्या आम जनता इसीलिए सरकार को टैक्स देती है कि उसका पैसा इन फालतू के आयोगों पर पानी की तरह बहाया जाए? हाल ही में गोधरा कांड की जांच के लिए गठित नानावटी आयोग की रिपोर्ट आई है और कुछ दिनों पहले रेल मंत्रालय द्वारा गठित बनर्जी आयोग की भी रिपोर्ट आई है। दोनों आयोगों की रिपोर्टों में जो भिन्नता देखने को मिल रही है, उससे जनता के सामने इन आयोगाें की हकीकत सामने आ चुकी है। इससे एक तरफ तो आयोगों की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है, तो दूसरी तरफ जनता खुद को ठगा हुआ महसूस करती है।
लिब्राहन आयोग स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे लंबा चलने वाला जांच आयोग है। हाल ही में 30 सितंबर को आयोग का कार्यकाल समाप्त हो रहा था, जिसे 47 वीं बार 31 मार्च-2009 तक फिर से 6 महीने के लिए बढ़ा दिया गया है। कितनी बड़ी विषमता है कि जिस आयोग को मात्र तीन महीने का समय दिया गया था, उसने 16 साल बाद भी अपनी रिपोर्ट देना मुनासिब नहीं समझा। इन सोलह वर्षों में कई बार केंद्र की सरकार में परिवर्तन भी हुआ, लेकिन किसी भी सरकार ने आयोग से इस देरी का कारण नहीं पूछा, जबकि आयोग द्वारा सबूतों की रिकार्डिंग का काम 3 जून 2005 को ही पूरा हो गया था। इस घटना के अंतिम गवाह के रूप में कल्याण सिंह की भी सुनवाई पिछले साल अगस्त महीने में ही हो गई, जो घटना के समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी थे और जिन्हें बाद में बरखास्त कर दिया गया था। पिछले 15 सालों में आयोग के सामने सौ से ऊपर गवाहियां हो चुकी हैं, जिनमें अनेक राजनेताओं, पुलिस अधिकारियों, प्रशासकों और पत्रकारों के बयान शामिल हैं। इनमें कल्याण सिंह, स्व.नरसिम्हा राव, अर्जुन सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अशोक सिंघल, साक्षी महाराज, उमा भारती, मुलायम सिंह यादव, आईबी के संयुक्त निदेशक एन.सी. पंधी, उत्तर प्रदेश के कैबिनेट सचिव प्रभात कुमार, केंद्रीय गृह सचिव माधव गोडबोले, उत्तर प्रदेश के जिला अधिकारी आर.एन. श्रीवास्तव और अयोध्या के एसएसपी डी.बी. रॉय आदि का नाम प्रमुख है।
इस पूरे जांच प्रकरण में अगर किसी एक व्यक्ति का बयान बदला है तो वे हैं, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह। घटना के बाद जब मीडिया ने कारसेवकों के बारे में कल्याण सिंह से पूछा तो उन्होंने कहा कि मुझे भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने गुमराह कर अंधेरे में रखा और कहा कि इन कारसेवकों से किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी। बाद में कल्याण सिंह ने आयोग को बताया कि राज्य प्रशासन ने विवादास्पद धरोहर को बचाने के लिए अपना सर्वोत्ताम प्रयास किया। साथ ही उन्होंने उस समय की कांग्रेस सरकार को इस धवंस के लिए जिम्मेदार ठहराया। पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने अपना बचाव करते हुए इसके लिए उत्तार प्रदेश की तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार को दोषी बताया था। वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण अडवाणी ने आयोग को बताया कि इस घटना का दिन मेरे जीवन का सबसे दुखद दिन था।
लिब्राहन आयोग का कार्यकाल बढ़ने से भले ही भारतीय जनता पार्टी ने फिलहाल राहत की सांस ली हो, लेकिन अगर इस आयोग की रिपोर्ट अगले लोकसभा चुनाव से पहले आती है, तो निश्चय ही भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी? एक न एक दिन तो इसकी रिपोर्ट आनी ही है।
दिल्ली चुनाव : संपत्ति का मामला हो या अपराधिक रिकॉर्ड का।
को बड़-छोट कहत अपराधू ?
संजीव कुमार
दिल्ली चुनाव में उतरे प्रत्याशियों में कौन बड़ा है और कौन छोटा, यह निर्णय करना मुश्किल हो रहा है। छोटी-बड़ी सभी पार्टियों के उम्मीदवारों में से कोई किसी से कम नहीं है। चाहे वह संपत्ति का मामला हो या आपराधिक रिकॉर्ड का।
दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार 863 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। 2008 के चुनाव में 69 पार्टियां चुनाव लड़ रही हैं जबकि 2003 में 62 पार्टियां चुनाव मैदान में थीं। साफ है कि राजनीतिक विघटन बढ़ा है। नई दिल्ली विधानसभा सीट से इस बार सबसे अधिक 25 प्रत्याशी हैं। यह समझना होगा कि इनमें उधार के उम्मीदवार भी हैं, जिन्हें बड़ी पार्टियों ने अपने फायदे के लिए अनेक छोटी पार्टियों से डमी उम्मीदवार के रूप में खड़ा किया है। गौरतलब है कि यहां से दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और भाजपा के विजय जौली आमने-सामने हैं। सबसे कम तीन प्रत्याशी घोंडा विधानसभा सीट से हैं और पांच प्रत्याशी ब्रिजवासन विधानसभा से हैं। कुल 69 पार्टियों में से 41 पार्टियां, 3 या उससे कम सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं। इस चुनाव में ऐसी 23 पार्टियां हैं जो सिर्फ एक सीट पर चुनाव मैदान में हैं।
दिल्ली चुनाव में उतरे प्रत्याशियों में कौन बड़ा है और कौन छोटा, यह निर्णय करना मुश्किल हो रहा है। छोटी-बड़ी सभी पार्टियों के उम्मीदवारों में से कोई किसी से कम नहीं है। चाहे वह संपत्ति का मामला हो या आपराधिक रिकॉर्ड का। दिल्ली चुनाव के 863 उम्मीदवारों में से 645 उम्मीदवारों के हलफनामों पर 'दिल्ली इलेक्शन वाच' संस्था द्वारा अधययन किया गया। इस अधययन के बाद पता चला कि 153 ऐसे उम्मीदवार हैं, जिन्होंने अपनी कुल संपत्ति एक करोड़ रुपये से ऊपर बताई है। इनमें से 41 कांग्रेस पार्टी, 47 भाजपा और 32 उम्मीदवार बसपा के हैं। आंकड़े के आधार पर यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार भाजपा के उम्मीदवारों से अधिक चालाक बनते हुए उनसे कम संपत्ति दिखाया है। लेकिन विडंबना यह है कि इनमें से अधिकतर करोड़पतियों ने अपना पैन नंबर नहीं दिया है। पैन नंबर न देने वालों में भाजपा के जीतेंद्र सिंह शंटी, कांग्रेस की अंजली राय और बीएसपी के राम सिंह नेताजी प्रमुख हैं।
यहां यह प्रश्न उठता है कि क्या इन उम्मीदवारों ने अपनी संपत्ति का सही ब्योरा दिया है या सिर्फ कागजी खानापूर्ति की है। क्योंकि इन लोगों ने जो अपने मकान और जमीन का मूल्य लगाया है वह बाजार मूल्य का आधा ही प्रतीत होता है। अधिकतर उम्मीदवारों ने अपनी संपत्ति का आधा-अधूरा ही ब्योरा दिया है। ऐसे में इस हलफनामे का क्या औचित्य रह जाता है? इतना ही नहीं, इन उम्मीदवारों में 21 ऐसे हैं जिन्होंने अपने हलफनामे में बताया है कि उनके पास किसी प्रकार का कोई वाहन नहीं है। इनमें 6 उम्मीदवार ऐसे हैं जिन्होंने अपनी कुल संपत्ति 90 लाख से ऊपर बताई है। हलफनामे के अनुसार, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और भाजपा विधायक ओ.पी. बब्बर के पास अपना कोई वाहन नहीं है। अगर इन विधायकों के पास अपना वाहन नहीं है, तो क्या ये लोग पैदल ही सत्ता के गलियारे का चक्कर लगाते हैं। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने पिछले पांच साल में 74 लाख, 12 हजार, 458 रुपये की संपत्ति अर्जित की है और ओ.पी बब्बर ने 81 लाख, 88 हजार, 334 रुपये की संपत्ति बनाई है।
पांच सबसे बड़े धन-कुबेर
सीट उम्मीदवार का नाम कुल संपत्ति
महरौली वेदप्रकाश (बसपा) 2,170,599,550
छतरपुर कंवर सिंह तंवर (बसपा) 1,570,818,348
आरकेपुरम सूरजभान (राजअपा) 500,070,000
महरौली शेर सिंह डागर (भाजपा) 465,266,481
जंगपुरा मनजिंदर सिंह सिरसा(भाजपा)437,033,791
इस चुनाव में 12 ऐसे उम्मीदवार हैं, जिनके पास शून्य नकद राशि और शून्य जमा राशि है। इस सूची में एक उम्मीदवार से हैं जिनकी कुल संपत्तिा का मूल्य 4 करोड़ से ऊपर है। गैरतलब है कि छतरपुर सीट से राष्ट्रीय लोकदल के प्रत्याशी प्रेमराज की कुल संपत्तिा का मूल्य 45,96,00 रुपये है, लेकिन इनकी जमा और नकद राशि शून्य है। क्या यह विश्वास करने के लायक है कि किसी के पास 4 करोड़ से ऊपर की संपत्तिा हो और उनके पास जमा और नकद राशि शून्य हो। इनमें पांच उम्मीदवार ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपनी कुल संपत्तिा शून्य बताई है। कहने का अर्थ यह है कि उनके पास चल-अचल संपत्तिा कुछ भी नहीं है, फिर चुनाव किस बूते पर लड़ने चले हैं।
2008 दिल्ली विधानसभा चुनाव में 45 ऐसे वर्तमान विधायक हैं जो फिर से चुनाव मैदान में हैं। 2003 और 2008 में दिए अपने हलफनामे में इन विधायकों में से अधिकतर ने अपनी संपत्तिायों में भारी वृध्दि दिखाई है। यह वृध्दि प्रति विधायक औसतन 211 प्रतिशत या 1.8 करोड़ रुपये प्रति विधायक है। क्या इन विधायकों से यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि पिछले 5 वर्षों में आपने लगभग 2 करोड़ की संपत्तिा कैसे बनाई कहां से आया यह धन पशु क्या वेतन और भत्तो से इतना पैसा बच जाता है कि पांच वर्षों में दो करोड़ रुपये से अधिाक की संपत्तिा बनाई जा सके।
पांच वर्षों में बनाई सबसे अधिक संपत्ति
सीट - उम्मीदवार का नाम - वृध्दि प्रतिशत में
दिल्ली कैंट-अशोक अहूजा (कांग्रेस) -1312 प्रतिशत
पटपड़गंज - मदन सिंह (बसपा) -1237 प्रतिशत
आरकेपुरम- बरखा सिंह (कांग्रेस) -1002 प्रतिशत
तिमारपुर- सुरिंदर पाल सिंह(कांग्रेस) - 972 प्रतिशत
चांदनी चौक-प्रहलाद सिंह साहनी(कांग्रेस)-662 प्रतिशत
पालम - धर्मदेव सोलंकी (भाजपा) - 548 प्रतिशत
तिलक नगर- ओ.पी. बब्बर (भाजपा) -502 प्रतिशत
बल्लीमारान- हारून यूसुफ (कांग्रेस) -482 प्रतिशत
हरिनगर - हरशरण सिंह बल्ली (भाजपा)-456 प्रतिशत
करोल बाग- सुरेंद्रर पाल रतवाल (भाजपा)-438 प्रतिशत
इस चुनाव में अनेक ऐसे उम्मीदवार हैं जिन्होंने अपने हलफनामे में पैन कार्ड नं. का उल्लेख नहीं किया है, जबकि हलफनामे में पैन कार्ड के लिए अलग से जगह दी गई थी। पैन कार्ड नंबर न देने वालों में बसपा के, भाजपा के, कांग्रेस के 7 और अन्य 16 उम्मीदवार शामिल हैं। इनमें से कई उम्मीदवारों की संपत्तिा 1 करोड़ रुपये से अधिाक है।
ये तो हुई उम्मीदवारों की संपत्तिा की बात। अब उनके क्रिमिनल रिकॉर्ड की बात करते हैं। इस बार दिल्ली विधानसभा में 91 ऐसे प्रत्याशी हैं जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें से कुछ प्रमुख पार्टियों से भी आते हैं। गौरतलब है कि दिल्ली विधान सभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के 19-19 ऐसे प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं, जिनके खिलाफ हत्या, हत्या का प्रयास और अपहरण के मामले लंबित चल रहे हैं। यही नहीं आंकड़ों पर नजर डालें तो चुनाव लड़ रहे कुल 863 प्रत्याशियों में से 91 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें भाजपा के एक प्रत्याशी सहित अन्य तीन के खिलाफ हत्या जैसे गंभीर आरोप के केस चल रहे हैं।
हत्या जैसे संगीन अपराधा के आरोपी प्रत्याशियों में नरेला से लोजपा के उम्मीदवार अमित कुमार, अंबेडकर नगर से भाजपा उम्मीदवार सुरेश चंद और सीलमपुर से बसपा प्रत्याशी हाजी अफजल शामिल हैं। संस्था की रिपोर्ट के अनुसार हाजी अफजल का रिकार्ड अपने आप में चौंकाने वाला है। उसके खिलाफ हत्या के 20 मामले दर्ज हैं। संस्था ने 875 प्रत्याशियों में से 645 प्रत्याशियों के हलफनामें की जांच की है। इसके अलावा अन्य 20 प्रत्याशियों पर हत्या, अपहरण और फिरौती जैसे संगीन आरोप हैं।
सोमवार, 1 दिसंबर 2008
दिल्ली चुनाव : दिल्ली में त्रिकोणीय संघर्ष
संजीव कुमार
बॉक्स-
किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं।
भाजपा को 25 और कांग्रेस को 20 सीटें मिलने के आसार।
विधानसभा में बसपा की मौजूदगी संभव।
दिल्ली चुनाव में मतदान के बाद अब चुनावी नतीजों पर अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं। सत्ताा की दावेदार दोनों प्रमुख पार्टियां कांग्रेस और भाजपा में से कोई भी पार्टी जादुई आंकड़ा (36 सीट) छूती दिखाई नहीं देती। 'यूपी तो हुई हमारी, अब दिल्ली की बारी' के नारे के साथ चुनाव मैदान में उतरी मायावती की पार्टी बसपा भी सत्ताा के गलियारे के करीब पहुंचती नहीं दिख रही। लेकिन बसपा ने दिल्ली चुनाव को त्रिकोणीय अवश्य बना दिया है। 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा में सरकार बनाने के लिए किसी भी दल को 36 सीटें चाहिए। भाजपा और कांग्रेस में से कोई भी दल 25 का आंकड़ा पार करता दिखाई नहीं देता। दूसरी तरफ, हालात ऐसे बन रहे हैं कि दिल्ली विधानसभा में बसपा की मौजूदगी से इनकार नहीं किया जा सकता।
परिसीमन ने न केवल सीटों का भूगोल बदला है बल्कि कई सीटों के समीकरण भी बदले हैं। नए परिसीमन के चलते कुछ सीटों पर कांग्रेस को हानि तो भाजपा को लाभ होता दिखाई दे रहा है। इस चुनाव में मुद्दे की बात करें तो दोनों दलों के पास इसका अभाव दिखाई देता है। पिछले 10 सालों से शासन कर रही कांग्रेस ने दिल्ली के विकास और अपनी उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा बनाया, तो भाजपा ने आतंकवाद, महंगाई और दिल्ली सरकार की विफलता को मुद्दा बनाया हुआ है। दूसरी तरफ, बसपा 'बहुजन के सम्मान में' दिल्ली चुनाव में उतरी है और सरकार को सभी मोर्चे पर विफल बता रही है।
चुनाव से ठीक पहले भाजपा ने जिस तरह से प्रदेश अधयक्ष डॉ.हर्षवर्धान, महामंत्री विजय गोयल और विपक्ष के नेता रहे जगदीश मुखी पर वरीयता देते हुए विजय कुमार मल्होत्रा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया, उसका लाभ भाजपा को मिलता दिखाई नहीं देता। वैसे विजय कुमार मल्होत्रा का दावा है कि भाजपा को तीन-चौथाई बहुमत मिलेगा। उनके अनुसार, दिल्ली की जनता कांग्रेस राज में पिछले दस सालों मेें किए गए कार्यों से पूरी तरह नाराज है।
चुनावी सर्वेक्षणों को आधार मानें तो यह कहा जा सकता है कि बसपा, कांग्रेस को सत्ताा में आने से रोक सकती है। क्योंकि बसपा, भाजपा से अधिक कांग्रेस के ही वोट बैंक में सेंध लगा रही है। जिस तरह नगर निगम चुनाव में बसपा ने न सिर्फ 10 फीसदी वोट पाए बल्कि उसे 17 सीटें भी मिली। इतना ही नहीं, कोंडली और तुगलकाबाद में वह नंबर एक पर रही। यही कारण है कि दिल्ली चुनाव को प्रमुखता देते हुए मायावती अपने 140 विधायकों और पार्षदों सहित दिल्ली में सक्रिय रही हैं। यदि दिल्ली में माया की माया चलती है तो उसे 10 से 15 सीटें मिल सकती हैं। अगर इतनी सीटें नहीं भी मिलती हैं तो भी बसपा इस बार चुनावी खेल अवश्य बिगाड़ेगी। वैसे इतिहास अपने आप को नहीं दुहराता, लेकिन यदि दुहराता है तो दिल्ली में भाजपा की सरकार अवश्य बनेगी। गौरतलब है कि 1993 में जनता दल ने 18 फीसदी वोट प्राप्त करते हुए चार सीटों पर विजय प्राप्त की थी। और उस चुनाव में मुसलमानों ने जनता दल को एकतरफा वोट किया था। इस चुनाव में सर्वहारा वर्ग का वोट बसपा की झोली में जाता दिखाई दे रहा है। अगर 1993 की दिल्ली विधानसभा चुनाव की पुनरावृत्तिा हो जाए, कोई आश्चर्य की बात नहीं।
दूसरी तरफ, सत्ताा के दावेदार दोनों दल कांग्रेस और भाजपा बागी उम्मीदवारों से जूझ रहे हैं। पार्टी के अंदर की गुटबाजी की वजह से कमजोर उम्मीदवारों को टिकट मिल गया। इससे कार्यकर्ताओं के भीतर रोष व्याप्त है। यह नाराजगी भितरघात के रूप में सामने आ सकती है। इन सीटों पर दोनों दलों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। कांग्रेस ने नए परिसीमन में समाप्त हुई सीटों पर बगल के विधायकों को टिकट देकर उन सीटों पर भाजपा की विजय निश्चित कर दी है तो वहीं भाजपा ने चार सीटें आकली दल को देकर उसे कांग्रेस के खाते में दान कर दिया है।
कुछ सीटों को छोड़ दें तो बसपा ने लगभग 40 सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। करीब 10 सीटों पर वह अच्छे मुकाबले में है। इसके अलावा जनता दल (यू), राष्ट्रीय जनता दल, लोक जनशक्ति पार्टी जैसी छोटी पार्टियां भी पांच-दस सीटों पर नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं। अगर ये छोटे दल एक-दो सीटें भी झटक लेते है तो ये किंगमेकर की भूमिका भी निभा सकते हैं।
सूत्रों के अनुसार, दोनों दल चाहे जो भी दावे करें लेकिन किसी का भी आंकड़ा 36 के आस-पास दिखाई नहीं देता। अनुमान के अनुसार भाजपा 25 सीटों और कांग्रेस 20 सीटों पर आगे है। दोनों पार्टियों की परंपरागत सीटों के अलावा लगभग 20 सीटों पर कांटे की टक्कर है। इसमें से जिसे 10 सीट मिल जाएगी, दिल्ली में उसी की सरकार बनेगी।