दिल्ली में त्रिकोणीय संघर्ष
संजीव कुमार
बॉक्स-
किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं।
भाजपा को 25 और कांग्रेस को 20 सीटें मिलने के आसार।
विधानसभा में बसपा की मौजूदगी संभव।
दिल्ली चुनाव में मतदान के बाद अब चुनावी नतीजों पर अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं। सत्ताा की दावेदार दोनों प्रमुख पार्टियां कांग्रेस और भाजपा में से कोई भी पार्टी जादुई आंकड़ा (36 सीट) छूती दिखाई नहीं देती। 'यूपी तो हुई हमारी, अब दिल्ली की बारी' के नारे के साथ चुनाव मैदान में उतरी मायावती की पार्टी बसपा भी सत्ताा के गलियारे के करीब पहुंचती नहीं दिख रही। लेकिन बसपा ने दिल्ली चुनाव को त्रिकोणीय अवश्य बना दिया है। 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा में सरकार बनाने के लिए किसी भी दल को 36 सीटें चाहिए। भाजपा और कांग्रेस में से कोई भी दल 25 का आंकड़ा पार करता दिखाई नहीं देता। दूसरी तरफ, हालात ऐसे बन रहे हैं कि दिल्ली विधानसभा में बसपा की मौजूदगी से इनकार नहीं किया जा सकता।
परिसीमन ने न केवल सीटों का भूगोल बदला है बल्कि कई सीटों के समीकरण भी बदले हैं। नए परिसीमन के चलते कुछ सीटों पर कांग्रेस को हानि तो भाजपा को लाभ होता दिखाई दे रहा है। इस चुनाव में मुद्दे की बात करें तो दोनों दलों के पास इसका अभाव दिखाई देता है। पिछले 10 सालों से शासन कर रही कांग्रेस ने दिल्ली के विकास और अपनी उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा बनाया, तो भाजपा ने आतंकवाद, महंगाई और दिल्ली सरकार की विफलता को मुद्दा बनाया हुआ है। दूसरी तरफ, बसपा 'बहुजन के सम्मान में' दिल्ली चुनाव में उतरी है और सरकार को सभी मोर्चे पर विफल बता रही है।
चुनाव से ठीक पहले भाजपा ने जिस तरह से प्रदेश अधयक्ष डॉ.हर्षवर्धान, महामंत्री विजय गोयल और विपक्ष के नेता रहे जगदीश मुखी पर वरीयता देते हुए विजय कुमार मल्होत्रा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया, उसका लाभ भाजपा को मिलता दिखाई नहीं देता। वैसे विजय कुमार मल्होत्रा का दावा है कि भाजपा को तीन-चौथाई बहुमत मिलेगा। उनके अनुसार, दिल्ली की जनता कांग्रेस राज में पिछले दस सालों मेें किए गए कार्यों से पूरी तरह नाराज है।
चुनावी सर्वेक्षणों को आधार मानें तो यह कहा जा सकता है कि बसपा, कांग्रेस को सत्ताा में आने से रोक सकती है। क्योंकि बसपा, भाजपा से अधिक कांग्रेस के ही वोट बैंक में सेंध लगा रही है। जिस तरह नगर निगम चुनाव में बसपा ने न सिर्फ 10 फीसदी वोट पाए बल्कि उसे 17 सीटें भी मिली। इतना ही नहीं, कोंडली और तुगलकाबाद में वह नंबर एक पर रही। यही कारण है कि दिल्ली चुनाव को प्रमुखता देते हुए मायावती अपने 140 विधायकों और पार्षदों सहित दिल्ली में सक्रिय रही हैं। यदि दिल्ली में माया की माया चलती है तो उसे 10 से 15 सीटें मिल सकती हैं। अगर इतनी सीटें नहीं भी मिलती हैं तो भी बसपा इस बार चुनावी खेल अवश्य बिगाड़ेगी। वैसे इतिहास अपने आप को नहीं दुहराता, लेकिन यदि दुहराता है तो दिल्ली में भाजपा की सरकार अवश्य बनेगी। गौरतलब है कि 1993 में जनता दल ने 18 फीसदी वोट प्राप्त करते हुए चार सीटों पर विजय प्राप्त की थी। और उस चुनाव में मुसलमानों ने जनता दल को एकतरफा वोट किया था। इस चुनाव में सर्वहारा वर्ग का वोट बसपा की झोली में जाता दिखाई दे रहा है। अगर 1993 की दिल्ली विधानसभा चुनाव की पुनरावृत्तिा हो जाए, कोई आश्चर्य की बात नहीं।
दूसरी तरफ, सत्ताा के दावेदार दोनों दल कांग्रेस और भाजपा बागी उम्मीदवारों से जूझ रहे हैं। पार्टी के अंदर की गुटबाजी की वजह से कमजोर उम्मीदवारों को टिकट मिल गया। इससे कार्यकर्ताओं के भीतर रोष व्याप्त है। यह नाराजगी भितरघात के रूप में सामने आ सकती है। इन सीटों पर दोनों दलों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। कांग्रेस ने नए परिसीमन में समाप्त हुई सीटों पर बगल के विधायकों को टिकट देकर उन सीटों पर भाजपा की विजय निश्चित कर दी है तो वहीं भाजपा ने चार सीटें आकली दल को देकर उसे कांग्रेस के खाते में दान कर दिया है।
कुछ सीटों को छोड़ दें तो बसपा ने लगभग 40 सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। करीब 10 सीटों पर वह अच्छे मुकाबले में है। इसके अलावा जनता दल (यू), राष्ट्रीय जनता दल, लोक जनशक्ति पार्टी जैसी छोटी पार्टियां भी पांच-दस सीटों पर नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं। अगर ये छोटे दल एक-दो सीटें भी झटक लेते है तो ये किंगमेकर की भूमिका भी निभा सकते हैं।
सूत्रों के अनुसार, दोनों दल चाहे जो भी दावे करें लेकिन किसी का भी आंकड़ा 36 के आस-पास दिखाई नहीं देता। अनुमान के अनुसार भाजपा 25 सीटों और कांग्रेस 20 सीटों पर आगे है। दोनों पार्टियों की परंपरागत सीटों के अलावा लगभग 20 सीटों पर कांटे की टक्कर है। इसमें से जिसे 10 सीट मिल जाएगी, दिल्ली में उसी की सरकार बनेगी।
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