इंतेहां हो गई इंतजार की
संजीव कुमार
लिब्राहन आयोग का कार्यकाल बढ़ने से भले ही भारतीय जनता पार्टी ने फिलहाल राहत की सांस ली हो, लेकिन अगर इस आयोग की रिपोर्ट अगले लोकसभा चुनाव से पहले आती है, तो निश्चय ही भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी?
लिब्राहन आयोग, वह आयोग है जिसका गठन अयोधया में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विधवंस की जांच के लिए किया गया था। गौरतलब है कि 6 दिसंबर-1992 को अयोधया में बाबरी मस्जिद को तोड़ा दिया गया था। मस्जिद विध्वंस के दस दिनों के अंदर ही 16 दिसंबर-1992 को गृह मंत्रालय के आदेश से न्यायाधीश एम.एस. लिब्राहन की अधयक्षता में इस आयोग का गठन हुआ। आयोग को इस घटना के कारणों और परिस्थितियों की जांच करनी थी और यह पता लगाना था कि इस घटना को अंजाम देने में कौन-कौन लोग शामिल थे। गौरतलब है कि आयोग को सरकार की तरफ से जांच के लिए सिर्फ तीन महीने का समय दिया गया था, लेकिन आयोग ने 16 वर्षों के बाद भी अपनी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को नहीं सौंपी है।
ऐसे में इस आयोग पर प्रश्नचिह्न उठने लगा है। आखिर वह कौन-सा कारण है, जिसके चलते आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने में देरी हो रही है? घटना के इतने दिनों बाद, क्या इस जांच रिपोर्ट का कोई इंतजार कर भी रहा है या नहीं? अब तक इस आयोग पर भारत सरकार का 746.67 लाख रुपये खर्च हो चुका है। ऐसे में यह भी प्रश्न उठता है कि अगर यह आयोग समय पर अपनी रिपोर्ट नहीं दे सकता तो इस पर इतने पैसे की बरबादी क्यों? क्या अब इसे भंग नहीं कर दिया जाना चाहिए? मेरे विचार में अब लिब्राहन आयोग को भंग कर देने में ही देश और जनता दोनों की भलाई है। सिर्फ यही आयोग नहीं, बल्कि उन सभी आयोगों को भंग कर दिया जाना चाहिए, जो तय समय सीमा के अंदर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने में असमर्थ रहे हैं अथवा वैसे आयोग, जिनका कार्यकाल अनेक बार बढ़ाया जा चुका है। अकेले लिब्राहन आयोग पर ही आम जनता की गाढ़ी कमाई की बड़ी धनराशि खर्च हो चुकी है। अगर देश के अंदर बने सभी आयोगों पर सरकारी व्यय का हिसाब लगाया जाए तो खर्च अरबों-खरबों में पहुंच जाएगा। क्या आम जनता इसीलिए सरकार को टैक्स देती है कि उसका पैसा इन फालतू के आयोगों पर पानी की तरह बहाया जाए? हाल ही में गोधरा कांड की जांच के लिए गठित नानावटी आयोग की रिपोर्ट आई है और कुछ दिनों पहले रेल मंत्रालय द्वारा गठित बनर्जी आयोग की भी रिपोर्ट आई है। दोनों आयोगों की रिपोर्टों में जो भिन्नता देखने को मिल रही है, उससे जनता के सामने इन आयोगाें की हकीकत सामने आ चुकी है। इससे एक तरफ तो आयोगों की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है, तो दूसरी तरफ जनता खुद को ठगा हुआ महसूस करती है।
लिब्राहन आयोग स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे लंबा चलने वाला जांच आयोग है। हाल ही में 30 सितंबर को आयोग का कार्यकाल समाप्त हो रहा था, जिसे 47 वीं बार 31 मार्च-2009 तक फिर से 6 महीने के लिए बढ़ा दिया गया है। कितनी बड़ी विषमता है कि जिस आयोग को मात्र तीन महीने का समय दिया गया था, उसने 16 साल बाद भी अपनी रिपोर्ट देना मुनासिब नहीं समझा। इन सोलह वर्षों में कई बार केंद्र की सरकार में परिवर्तन भी हुआ, लेकिन किसी भी सरकार ने आयोग से इस देरी का कारण नहीं पूछा, जबकि आयोग द्वारा सबूतों की रिकार्डिंग का काम 3 जून 2005 को ही पूरा हो गया था। इस घटना के अंतिम गवाह के रूप में कल्याण सिंह की भी सुनवाई पिछले साल अगस्त महीने में ही हो गई, जो घटना के समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी थे और जिन्हें बाद में बरखास्त कर दिया गया था। पिछले 15 सालों में आयोग के सामने सौ से ऊपर गवाहियां हो चुकी हैं, जिनमें अनेक राजनेताओं, पुलिस अधिकारियों, प्रशासकों और पत्रकारों के बयान शामिल हैं। इनमें कल्याण सिंह, स्व.नरसिम्हा राव, अर्जुन सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अशोक सिंघल, साक्षी महाराज, उमा भारती, मुलायम सिंह यादव, आईबी के संयुक्त निदेशक एन.सी. पंधी, उत्तर प्रदेश के कैबिनेट सचिव प्रभात कुमार, केंद्रीय गृह सचिव माधव गोडबोले, उत्तर प्रदेश के जिला अधिकारी आर.एन. श्रीवास्तव और अयोध्या के एसएसपी डी.बी. रॉय आदि का नाम प्रमुख है।
इस पूरे जांच प्रकरण में अगर किसी एक व्यक्ति का बयान बदला है तो वे हैं, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह। घटना के बाद जब मीडिया ने कारसेवकों के बारे में कल्याण सिंह से पूछा तो उन्होंने कहा कि मुझे भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने गुमराह कर अंधेरे में रखा और कहा कि इन कारसेवकों से किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी। बाद में कल्याण सिंह ने आयोग को बताया कि राज्य प्रशासन ने विवादास्पद धरोहर को बचाने के लिए अपना सर्वोत्ताम प्रयास किया। साथ ही उन्होंने उस समय की कांग्रेस सरकार को इस धवंस के लिए जिम्मेदार ठहराया। पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने अपना बचाव करते हुए इसके लिए उत्तार प्रदेश की तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार को दोषी बताया था। वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण अडवाणी ने आयोग को बताया कि इस घटना का दिन मेरे जीवन का सबसे दुखद दिन था।
लिब्राहन आयोग का कार्यकाल बढ़ने से भले ही भारतीय जनता पार्टी ने फिलहाल राहत की सांस ली हो, लेकिन अगर इस आयोग की रिपोर्ट अगले लोकसभा चुनाव से पहले आती है, तो निश्चय ही भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी? एक न एक दिन तो इसकी रिपोर्ट आनी ही है।
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