संजीव कुमार
इस मौके पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए एक बड़ा ही राजनीतिक बयान दिया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि बिहार में अगर बिजली की स्थिति नहीं सुधरी तो वे लोगों के पास वोट मांगने नहीं जाएंगे। नीतीश कुमार का यह बयान सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह बयान हकीकत से कोसों दूर है। क्योंकि कोई राजनेता यह कहे कि वह अपने वादे के अनुसार काम नहीं कर पाया तो वोट मांगने नहीं जाएगा। कम से कम भारतीय राजनीति के अबतक के इतिहास में तो ऐसा देखने को नहीं मिला है। ऐसे में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह बयान कोरी लफ्फाजी ही लगता है।
गौरतलब है कि बिहार पर सात साल शासन करने वाले नीतीश कुमार को अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं है। लेकिन अपनी ही सरकार की वार्षिक रिपोर्ट पेश करते हुए उन्होंने अपने ही शासन की विफलताएं गिनाई। नीतीश कुमार ने आत्मालोचना के स्वर में कहा कि ‘‘जहांतक इंफ्रास्ट्रक्चर की बात है तो सड़कों वगैरह में कुछ सुधार जरूर हुआ है। हालांकि इस क्षेत्र में भी उतना सुधार नहीं हुआ है जितना कि होना चाहिए।’’ बिहार की जनता ने जिस तरह नीतीश कुमार को भारी बहुमत से सत्ता में पहुंचाया और हाल ही में नीतीश सरकार ने अपने शासन का सातवां साल पूरा किया है लेकिन अभी तक उन्होंने जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप काम नहीं किया है। यदि उन्हें लगता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर (सड़क और बिजली) की वजह से बिहार का विकास रुका हुआ है, तो सवाल यह उठता है कि उन्होंने इन सात सालों में क्या किया?
जहां तक इंफ्रास्ट्रक्चर की बात है तो सड़कों वगैरह में काफी सुधार हुआ है। लेकिन आज भी छोटे बसावट (टोले) पगडंडी और बांस के चचरी के युग में जी रहे हैं। यहां तक कि राजधानी पटना में बांस और लकड़ी के पुल बने हैं जो कुछ लोगों के चढ़ने पर ही ध्वस्त हो जाते हैं और बड़ी दुर्घटना हो जाती है। वहीं बिजली की बात करें तो कांटी और कलगाव के पॉवर स्टेशनों का सुधार हुआ है जिससे बिजली उत्पादन कुछ बढ़ा है। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि बिहार की एक बड़ी आबादी आज भी लालटेन और ढिबरी युग में जीने को मजबूर है।
कमोबेस यही हालत बिहार में कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों की भी है। हलांकि मुख्यमंत्री ने रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए कृषि रोड मैप, शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, उद्योग सहित विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे काम का हवाला देते हुए कहा कि अब बिहार के नाम की चर्चा देश-दुनिया में है। बिहार के विकास मॉडल की सब तारीफ कर रहे हैं। बिहार, अब शोध का विषय बन गया है। यह अलग बात है कि आज भी कृषि की हालत नहीं सुधरी है और छोटे किसान व मजदूर रोजगार के लिए पलायन कर रहे हैं। हां, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रवासी मजदूर जो बिहार से बाहर जाते थे, उनकी संख्या में कमी जरूर आई है। लेकिन इसके पीछे सबसे बड़ी वजह महात्मा गांधी ग्रामीण विकास योजना (मनरेगा) में लोगों को अपने ही राज्य में काम मिलना है। और यह केंद्र सरकार की योजना है।
पत्रकारों के एक सवाल बिहार की गरीबी के बाबत उनका कहना था कि गरीबी के आंकड़े जुटाने के फार्मूले में परिवर्तन की जरूरत है। जबतक उनकी संख्या का सही आकलन नहीं होगा, लोग गरीबी रेखा से ऊपर कैसे उठेंगे। लेकिन बिहार की समस्याओं का समाधान तब तक नहीं होगा जब तक बिहार में बड़े पैमाने पर भूमि सुधार को लागू नहीं किया जाएगा। गौरतलब है कि इसके लिए सरकार ने डी. बंद्योपाध्याय कमेटी बनाई थी, उस कमेटी ने सरकार को एक रिपोर्ट भी दी है जिसे सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल रखा है। इस मामले में सरकार को राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने की जरूरत है।
वहीं उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि न्याय के साथ समेकित व समावेशी विकास हमारी प्राथमिकता है। इस लक्ष्य को हासिल करने में जो भी चुनौतियां सामने आएंगी, हम उसे अवसर में बदलेंगे। हम किसी को शिकायत करने का मौका नहीं देंगे। नई पीढ़ी के लिए कोई तगादा नहीं छोड़ना चाहते हैं। उनके अनुसार बिहार, विकास के मामले में भी देश को नई राह दिखा रहा है।
बहरहाल, नीतीश कुमार अपनी सातवीं रिपोर्ट कार्ड में अपने सरकार की उपलब्धियां गिनाकर खुद ही अपनी पीठ थपथपा रहे हों, लेकिन बिहार के हर समुदाय के लोगों को उनसे बड़ी अपेक्षाएं थीं, लेकिन सरकार के अबतक के कामकाज से सभी लोगों को बेहद निराशा हुई है। नीतीश सरकार के कामकाज को देखकर यही कहा जा सकता है- ‘सात साल में चले ढाई कोस!’
‘‘यह रिपोर्ट कार्ड बिहार की जनता के साथ धोखा है। मुख्यमंत्री कागजी घोड़े दौड़ा रहे हैं। जमीन पर कहीं बदलाव दिखाई नहीं दे रहा। जगह-जगह हो रहे विरोध प्रदर्शन से साफ है कि उन्होंने जनता का समर्थन खो दिया है। मुख्यमंत्री ने अपने दूसरे कार्यकाल में ‘सुशासन के कार्यक्रम’ नामक पुस्तिका जारी की थी। इसमें 185 संकल्पों का जिक्र था। इसमें से एक भी संकल्प अबतक पूरा नहीं हो पाया है।’’
-रामविलास पासवान, लोजपा अध्यक्ष
‘‘रिपोर्ट कार्ड में फिजूल की बातें हैं। विकास व अधिकार यात्रा के नाम पर मुख्यमंत्री ने लोगों को बेवकूफ बनाने का भरपूर प्रयास किया है। जनता अब उनकी बातों को अच्छी तरह से समझने लगी है। राज्य में शिक्षा व विधि व्यवस्था चौपट हो गई है। मुख्यमंत्री को इस रिपोर्ट कार्ड में माफी मांगनी चाहिए थी कि राज्य में महिलाओं के साथ दुष्कर्म व कमजोर तबके के साथ अत्याचार हो रहा है।’’
-लालू प्रसाद यादव, राजद अध्यक्ष
‘‘नीतीश सरकार का रिपोर्ट कार्ड झूठ का पुलिंदा है। पिछले सात वर्षों में बिहार में एक भी निवेश नहीं हुआ। एक मेगावाट बिजली का उत्पादन शुरू नहीं हो सका है। राज्य में अपहरण, बलात्कार, हत्या, लूट एवं डकैती की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है। बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की बात करना हास्यास्पद है। राज्य में जो विकास के कार्यक्रम चल रहे हैं, वे केंद्र प्रायोजित योजनाओं से है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार फर्जी आंकड़ा देकर जनता को दिग्भ्रमित कर रहे है।’’
-चौधरी महबूब अली कैसर, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष
क्या है मुख्यमंत्री ग्राम संपर्क योजना
इस योजना से मुख्यमंत्री ने राज्य के ढाई सौ की आबादी वाले बसावट (टोला) को पक्की सड़क से जोड़ने का एलान किया है। ‘मुख्यमंत्री ग्राम संपर्क योजना’ नाम के इस योजना पर 23 हजार 881 करोड़ रुपये खर्च होंगे। एक लाख 41 हजार बसावट पक्की सड़क से जुड़ेंगे। अगले पांच साल में 34 हजार 116 किलोमीटर सड़क बनेगी। इस योजना के अंतर्गत निर्माण कार्य इसी वर्ष से शुरू होगा।
बीते 24 नवंबर को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी सरकार की दूसरे कार्यकाल के दो साल पूरा होने पर 96 पृष्ठों का एक रिपोर्ट कार्ड पेश किया। इस रिपोर्ट कार्ड में उनके शासन की उपलब्धि व चुनौतियां दर्ज हैं। इस मौके पर उन्होंने ‘मुख्यमंत्री ग्राम संपर्क योजना’ का एलान किया तो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की भी मांग की। उनके अनुसार बेशक बिहार आगे बढ़ रहा है लेकिन इस गति से भी राष्ट्रीय औसत के करीब पहुंचने में 25 वर्ष लग जाएगा। इतना लंबा इंतजार कौन करेगा?
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य के ढाई सौ की आबादी वाले बसावट को पक्की सड़क से जोड़ने के लिए ‘मुख्यमंत्री ग्राम संपर्क योजना’ एलान किया है। वे अपनी सरकार की दूसरी पारी के दो साल पूरा पर रिपोर्ट कार्ड पेश कर रहे थे। वहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टालरेंस’ की बात दोहराते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ हमारी जंग जारी रहेगी। उनका दावा है कि ‘गुणवत्ता के साथ हर मोर्चे पर काम हो रहा है। और इसकी लगातार मॉनिटरिंग भी हो रही है।’इस मौके पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए एक बड़ा ही राजनीतिक बयान दिया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि बिहार में अगर बिजली की स्थिति नहीं सुधरी तो वे लोगों के पास वोट मांगने नहीं जाएंगे। नीतीश कुमार का यह बयान सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह बयान हकीकत से कोसों दूर है। क्योंकि कोई राजनेता यह कहे कि वह अपने वादे के अनुसार काम नहीं कर पाया तो वोट मांगने नहीं जाएगा। कम से कम भारतीय राजनीति के अबतक के इतिहास में तो ऐसा देखने को नहीं मिला है। ऐसे में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह बयान कोरी लफ्फाजी ही लगता है।
गौरतलब है कि बिहार पर सात साल शासन करने वाले नीतीश कुमार को अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं है। लेकिन अपनी ही सरकार की वार्षिक रिपोर्ट पेश करते हुए उन्होंने अपने ही शासन की विफलताएं गिनाई। नीतीश कुमार ने आत्मालोचना के स्वर में कहा कि ‘‘जहांतक इंफ्रास्ट्रक्चर की बात है तो सड़कों वगैरह में कुछ सुधार जरूर हुआ है। हालांकि इस क्षेत्र में भी उतना सुधार नहीं हुआ है जितना कि होना चाहिए।’’ बिहार की जनता ने जिस तरह नीतीश कुमार को भारी बहुमत से सत्ता में पहुंचाया और हाल ही में नीतीश सरकार ने अपने शासन का सातवां साल पूरा किया है लेकिन अभी तक उन्होंने जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप काम नहीं किया है। यदि उन्हें लगता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर (सड़क और बिजली) की वजह से बिहार का विकास रुका हुआ है, तो सवाल यह उठता है कि उन्होंने इन सात सालों में क्या किया?
जहां तक इंफ्रास्ट्रक्चर की बात है तो सड़कों वगैरह में काफी सुधार हुआ है। लेकिन आज भी छोटे बसावट (टोले) पगडंडी और बांस के चचरी के युग में जी रहे हैं। यहां तक कि राजधानी पटना में बांस और लकड़ी के पुल बने हैं जो कुछ लोगों के चढ़ने पर ही ध्वस्त हो जाते हैं और बड़ी दुर्घटना हो जाती है। वहीं बिजली की बात करें तो कांटी और कलगाव के पॉवर स्टेशनों का सुधार हुआ है जिससे बिजली उत्पादन कुछ बढ़ा है। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि बिहार की एक बड़ी आबादी आज भी लालटेन और ढिबरी युग में जीने को मजबूर है।
कमोबेस यही हालत बिहार में कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों की भी है। हलांकि मुख्यमंत्री ने रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए कृषि रोड मैप, शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, उद्योग सहित विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे काम का हवाला देते हुए कहा कि अब बिहार के नाम की चर्चा देश-दुनिया में है। बिहार के विकास मॉडल की सब तारीफ कर रहे हैं। बिहार, अब शोध का विषय बन गया है। यह अलग बात है कि आज भी कृषि की हालत नहीं सुधरी है और छोटे किसान व मजदूर रोजगार के लिए पलायन कर रहे हैं। हां, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रवासी मजदूर जो बिहार से बाहर जाते थे, उनकी संख्या में कमी जरूर आई है। लेकिन इसके पीछे सबसे बड़ी वजह महात्मा गांधी ग्रामीण विकास योजना (मनरेगा) में लोगों को अपने ही राज्य में काम मिलना है। और यह केंद्र सरकार की योजना है।
पत्रकारों के एक सवाल बिहार की गरीबी के बाबत उनका कहना था कि गरीबी के आंकड़े जुटाने के फार्मूले में परिवर्तन की जरूरत है। जबतक उनकी संख्या का सही आकलन नहीं होगा, लोग गरीबी रेखा से ऊपर कैसे उठेंगे। लेकिन बिहार की समस्याओं का समाधान तब तक नहीं होगा जब तक बिहार में बड़े पैमाने पर भूमि सुधार को लागू नहीं किया जाएगा। गौरतलब है कि इसके लिए सरकार ने डी. बंद्योपाध्याय कमेटी बनाई थी, उस कमेटी ने सरकार को एक रिपोर्ट भी दी है जिसे सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल रखा है। इस मामले में सरकार को राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने की जरूरत है।
वहीं उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि न्याय के साथ समेकित व समावेशी विकास हमारी प्राथमिकता है। इस लक्ष्य को हासिल करने में जो भी चुनौतियां सामने आएंगी, हम उसे अवसर में बदलेंगे। हम किसी को शिकायत करने का मौका नहीं देंगे। नई पीढ़ी के लिए कोई तगादा नहीं छोड़ना चाहते हैं। उनके अनुसार बिहार, विकास के मामले में भी देश को नई राह दिखा रहा है।
बहरहाल, नीतीश कुमार अपनी सातवीं रिपोर्ट कार्ड में अपने सरकार की उपलब्धियां गिनाकर खुद ही अपनी पीठ थपथपा रहे हों, लेकिन बिहार के हर समुदाय के लोगों को उनसे बड़ी अपेक्षाएं थीं, लेकिन सरकार के अबतक के कामकाज से सभी लोगों को बेहद निराशा हुई है। नीतीश सरकार के कामकाज को देखकर यही कहा जा सकता है- ‘सात साल में चले ढाई कोस!’
‘‘यह रिपोर्ट कार्ड बिहार की जनता के साथ धोखा है। मुख्यमंत्री कागजी घोड़े दौड़ा रहे हैं। जमीन पर कहीं बदलाव दिखाई नहीं दे रहा। जगह-जगह हो रहे विरोध प्रदर्शन से साफ है कि उन्होंने जनता का समर्थन खो दिया है। मुख्यमंत्री ने अपने दूसरे कार्यकाल में ‘सुशासन के कार्यक्रम’ नामक पुस्तिका जारी की थी। इसमें 185 संकल्पों का जिक्र था। इसमें से एक भी संकल्प अबतक पूरा नहीं हो पाया है।’’
-रामविलास पासवान, लोजपा अध्यक्ष
‘‘रिपोर्ट कार्ड में फिजूल की बातें हैं। विकास व अधिकार यात्रा के नाम पर मुख्यमंत्री ने लोगों को बेवकूफ बनाने का भरपूर प्रयास किया है। जनता अब उनकी बातों को अच्छी तरह से समझने लगी है। राज्य में शिक्षा व विधि व्यवस्था चौपट हो गई है। मुख्यमंत्री को इस रिपोर्ट कार्ड में माफी मांगनी चाहिए थी कि राज्य में महिलाओं के साथ दुष्कर्म व कमजोर तबके के साथ अत्याचार हो रहा है।’’
-लालू प्रसाद यादव, राजद अध्यक्ष
‘‘नीतीश सरकार का रिपोर्ट कार्ड झूठ का पुलिंदा है। पिछले सात वर्षों में बिहार में एक भी निवेश नहीं हुआ। एक मेगावाट बिजली का उत्पादन शुरू नहीं हो सका है। राज्य में अपहरण, बलात्कार, हत्या, लूट एवं डकैती की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है। बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की बात करना हास्यास्पद है। राज्य में जो विकास के कार्यक्रम चल रहे हैं, वे केंद्र प्रायोजित योजनाओं से है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार फर्जी आंकड़ा देकर जनता को दिग्भ्रमित कर रहे है।’’
-चौधरी महबूब अली कैसर, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष
क्या है मुख्यमंत्री ग्राम संपर्क योजना
इस योजना से मुख्यमंत्री ने राज्य के ढाई सौ की आबादी वाले बसावट (टोला) को पक्की सड़क से जोड़ने का एलान किया है। ‘मुख्यमंत्री ग्राम संपर्क योजना’ नाम के इस योजना पर 23 हजार 881 करोड़ रुपये खर्च होंगे। एक लाख 41 हजार बसावट पक्की सड़क से जुड़ेंगे। अगले पांच साल में 34 हजार 116 किलोमीटर सड़क बनेगी। इस योजना के अंतर्गत निर्माण कार्य इसी वर्ष से शुरू होगा।

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