शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

चाय की दुकान से मुख्यमंत्री भवन तक

संजीव कुमार

केवल मोदी कहने से नरेंद्र मोदी की पहचान हो जाती है। बच्चा-बच्चा उन्हें पहचान लेता है। इसकी अपनी-अपनी वजह है। भारतीय राजनीति में जमाने बाद कोई राजनेता इस तरह विरोधियों और समर्थकों के बीच समान रूप से जाना जाता है। गुजरात  में लगातार तीसरी बार भाजपा को अपने दम पर जीत दिलाने वाले 62 वर्षीय मोदी आज भाजपा में प्रधानमंत्री के उम्मीदवार बनने की क्षमता रखते हैं तो इसके पीछे एक पृष्ठभूमि है

 मोदी 17 सितंबर, 1950 को अहमदाबाद से सौ किलोमीटर दूर बड़नगर के एक साधारण परिवार में पैदा हुए थे। पिता दामोदरदास मूलचंद मोदी और माता इराबेन मोदी को कहां मालूम था कि आगे यह शिशु क्या कमाल करने वाला है। छह भाई-बहनों में मोदी तीसरे नंबर पर हैं। वे पूर्णतः शाकाहारी हैं। और दिन की शुरूआत योग से करते हैं। किताब पढ़ने और घूमने के शौकीन मोदी ने गुजरात यूनिवर्सिटी से राजनीतिक विज्ञान में एमए किया है। इनकी जाति घांची है। इस जाति का परंपरागत काम तेल निकालने (तेली) का है। नरेंद्र मोदी के सहपाठी रहे डॉ. सुधीर जोशी बताते हैं ‘‘बड़नगर रेलवे स्टेशन पर मोदी के पिता एक चाय की दुकान चलाते थे। तब रेलवे लाइन के दूसरी तरफ एक स्कूल था जिसमें नरेंद्र मोदी पढ़ते थे। और चाय की दुकान पर अपने पिता का हाथ भी बटाते थे। स्कूल की घंटी बजने पर लाइन पार करके स्कूल की कक्षा में चले जाते थे।’’
आरएसएस से जुड़ने के बाबत नरेंद्र मोंदी के बड़े भाई सोम भाई कहते हैं, ‘‘1958 में जब नरेंद्र मोदी आठ साल के थे तो बड़नगर की शाखा में गए थे। वहीं वे लक्ष्मणराव इनामदार के संपर्क में आए।’’ दूसरी तरफ बड़नगर में मोदी के शिक्षक रहे प्रह्लाद पटेल बताते हैं कि ‘‘हम नरेंद्र मोदी को एक साधारण छात्र के रूप में जानते हैं। लेकिन वे वाद-विवाद प्रतियोगिता में खूब जोर-शोर से हिस्सा लिया करते थे।’’ हलांकि मोदी के साथी रहे डॉ. सुधीर जोशी बताते हैं कि मोदी बचपन से ही निडर थे। वे बड़नगर झील में मगरमच्छ होने के बावजूद उसमें जाया करते थे।
मोदी के अनुसार, 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्होंने एक युवा स्वयंसेवक के रूप में रेलवे स्टेशनों पर सैनिकों की  सेवा की थी। मोदी के बड़े भाई सोम भाई बताते हैं कि नरेंद्र मोदी ने एक बार नमक और तेल खाना छोड़ दिया तो परिवार वालों को लगा कि मोदी संन्यासी होने वाला है। इसी समय मोदी की पहले मंगनी और फिर 13 साल की उम्र में शादी कर दी गई। लेकिन 18 साल की उम्र में मोदी हिमालय की तरफ निकल पड़े। इसलिए इनकी पत्नी जशोदा बेन का गौना नहीं हुआ। वैसे मोदी स्कूल शिक्षिका जसोदा बेन से अपनी इस कथित शादी के बारे में कुछ नहीं कहते। सभी आधिकारिक दस्तावेजों में वह वैवाहिक स्थिति के कॉलम को खाली छोड़ देते हैं। ऐसा कहा जाता है कि शादी के विरोध में ही नरेंद्र मोदी अज्ञात वास (हरिद्वार-ऋषिकेश) पर चले गए थे। इस दौरान यात्रा के स्रोत मोदी खुद ही हैं। इसके बारे में उनके परिवार के लोगों को भी कोई विशेष जानकारी नहीं है। फिर दो साल बाद अचानक जब मोदी वापस आए तो वे अहमदाबाद शहर के बस स्टैंड के पास अपने चाचा की कैंटीन में हाथ बंटाते थे। और थोड़े दिनों बाद यहीं गीता मंदिर के निकट उन्होंने अपनी चाय की दुकान खोल ली। जीवन के इसी मोड़ पर मोदी फिर से आरएसएस से जुड़ने लगे। ऐसा एक वरिष्ठ आरएसएस प्रचारक का कहना है जो उन दिनों अहमदाबाद में रह रहे थे। सुबह की शाखा के बाद कुछ आरएसएस प्रचारक मोदी की दुकान पर चाय पीते थे। यहां मोदी बड़नगर की अपनी आरएसएस पृष्ठभूमि की वजह से लोगों को प्रभावित करने में सफल रहे। और फिर उन्होंने अपनी चाय की दुकान बंद कर दी और गुजरात आरएसएस मुख्यालय में सहायक के तौर पर काम करने लगे।
इस बाबत खुद नरेंद्र मोदी ने अपने आधिकारिक जीवनीकार एनबी कामत कोे बताया ‘‘जब वकील साहब (लक्ष्मणराव इनामदार) ने मुझे अपने साथ जोड़ने के लिए बुलाया तो उस समय 10-12 लोग गुजरात के हेडगेवार भवन, आरएसएस मुख्यालय में रहते थे। उस समय मैं आरएसएस मुख्यालय में काम करता था। मैंने यह तय किया कि यही वह जगह है जिससे मैं ताल्लुक रखता हूं। उन दिनों मेरी दिनचर्या सुबह प्रचारकों के लिए चाय और नास्ते बनाने से शुरू होती थी। उसके बाद पूरी इमारत की सफाई करनी होती थी, जिसमें आठ-नौ कमरे थे। उसके बाद अपने और वकील साहब के कपड़े धोता था। ऐसा कम से कम एक साल तक चलता रहा। इस दौरान मैं  बहुत सारे लोगों से मिला।’’
उसके बाद मोदी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े। उन दिनों देश में इमरजेंसी लगी थी, गुजरात में बाबूभाई की सरकार थी। गुजरात में इमरजेंसी के खिलाफ अभियान चलाने वालों में नरेंद्र मोदी भी थे। इस दौरान वह लालकृष्ण आडवाणी के संपर्क में आए। आडवाणी उस समय जनसंघ के बड़े नेता थे। आडवाणी ने मोदी की सांगठनिक क्षमताओं को पहचाना। आडवाणी ने उन्हें हमेशा बढ़ावा दिया और हर संकट में साथ खड़े रहे। मोदी भी आडवाणी को समय-समय पर प्रभावित करते रहे। 1987 के नगर निकाय चुनावों में भाजपा की शानदार जीत के पीछे मोदी ही थे। उस समय 25 वर्षीय मोदी संघ प्रचारक थे। फिर 1987 में मोदी को गुजरात भाजपा का संगठन सचिव बनाया गया। वहां उन्होंने संगठन को अपना बहुमूल्य आठ साल दिया। 1987 से 1995 के बीच गुजरात में जो भी काम हुआ है संगठन के स्तर पर इसका श्रेय मोदी को जाता है। इस दौरान मोदी ने गुजरात में केशुभाई पटेल और शंकर सिंह बाघेला की तिकड़ी ने साथ मिलकर ‘न्याय यात्रा’ और ‘लोकशक्ति रथयात्रा’ भी निकाला। 1990 में जब आडवाणी की सोमनाथ यात्रा और 1991 में मुरली मनोहर जोशी की ‘एकता यात्रा’ केे संयोजन का काम नरेंद्र मोदी के जिम्मे था। इस काम मोदी ने बखूबी संभाला और केशुभाई पटेल और शंकर सिंह बाघेला को पीछे छोड़ते हुए मोदी दिल्ली आ गए। पार्टी में उन्हें सबसे कम उम्र में राष्ट्रीय सचिव बनाया गया। गुजरात के बाद राष्ट्रीय स्तर पर इन्होंने गोविंदाचार्य के साथ मिलकर संगठन का काम किया। दिल्ली में संगठन का काम करते हुए भाजपा की हिमाचल प्रदेश ईकाई को भी संभाला। इनके काम को देखते हुए इन्हें 1998 में संगठन का राष्ट्रीय सचिव बनाया गया।
दूसरी तरफ  गुजरात में सूखे, तूफानों और विनाशकारी भूकंप ने केशुभाई की लोकप्रियता को नुकसान पहुंचाया। वहीं भाजपा उपचुनाव और नगर निकाय के चुनाव हारने लगी। तभी मोदी ने पर्दे के पीछे केशुभाई के खिलाफ बगावत की जमीन तैयार की। मोदी ने चिंतित आडवाणी को यह भरोसा दिलाया कि वह केशुभाई के सामने सबसे बेहतर विकल्प हैं। 7 अक्टूबर, 2001 को भाजपा ने मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री बनाकर भेजा। कहा जाता है कि इसमें संघ के मदनदास देवी की भी बड़ी भूमिका थी। मोदी ने सबसे पहले वहां से संजय जोशी का बोरिया-बिस्तर समेटा।
27 फरवरी, 2002 को गोधरा कांड हुआ। इसके बाद गुजरात में बड़े पैमाने पर दंगे भड़क उठे। दंगों के दौरान मोदी सरकार की भूमिका आज भी संदेह के घेरे में है। इसका जवाब आज भी उन्हें देना है। लेकिन गुजरात में बढ़ती लोकप्रियता और आडवाणी के आशीर्वाद की वजह से वह अपनी गद्दी बचाने में कामयाब रहे। दंगे के बाद मोदी के अंदर का नेता पूरी तरह से जागा। उन्होंने गुजरात गौरव यात्रा कर गुजराती अस्मिता का आह्वान किया। चुनाव से पहले उनकी इस कवायद ने दिसंबर 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में मोदी ने भाजपा को (128 सीट) भारी जीत दिलाई।
2003 से वे ‘वाइब्रेंट गुजरात’ की तरफ बढ़े। साथ ही वे ‘गुजरात सिद्धि’ यात्रा पर निकले। वहीं सरकारी अधिकारियों की कार्यक्षमता में सुधार के लिए ‘कर्मयोगी सिद्धांत’ लाए। स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सामाजिक मानदंडों पर खराब प्रदर्शन के बावजूद ‘वाइब्रेंट गुजरात’ सम्मेलनों ने मोदी ब्रांड बनकर उभरे।
जब पश्चिम मोदी को नजरअंदाज कर रहा था तो उन्होंने पूरब का रुख किया। यह मोदी ब्रांड का ही जलवा था कि 2007 में जापान ‘वाइब्रेंट गुजरात’ सम्मेलन में साझेदार बना। तबतक गुजरात में 2007 का चुनाव आ गया। इसमें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मोदी को मौत का सौदागर कह दिया। इसके बाद मोदी ने कांग्रेस पर आक्रामक होते हुए आतंकवाद के मुद्दे को आगे बढ़ाया। और एक बार फिर गुजरात में 117 सीटों पर जीत दर्ज कर अपनी सरकार बनाई। वे 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के स्टार प्रचारक के रूप में उभरे। विदेशों और व्यापारिक घरानों का विश्वास जीता। यह उनकी व्यापारिक सोच का ही परिचायक है।
हिंदुत्व की राजनीति करने वाले मोदी ने अचानक 17 सितंबर, 2011 को मुसलमानों की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने के लिए सद्भावना मिशन की शुरुआत की। मोदी दूरदर्शी नेता के रूप में जाने जाते हैं। मोदी यह जानते थे कि उनकी हिंदुत्व वाली छवि एनडीए में शामिल दलों को दूर कर सकती है। लेकिन जब मुसलमानों को टिकट देने की बात आई तो उन्होंने एक भी टिकट मुसलमान को नहीं दिया। इसके बावजूद उनके विकास मॉडल ने एक बार फिर 2012 के विधानसभा चुनाव में हैट्रिक लगाकर भाजपा को जीत दिलाई। जानकारों की राय है कि अब मोदी की निगाह दिल्ली की गद्दी पर है। मोदी होशियार और स्वप्नदर्शी व्यक्ति के रूप में भी जाने जाते हैं। मोदी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि अगर दिल्ली की गद्दी पर काबिज होना है तो 2014 का लोकसभा चुनाव सबसे उचित समय है। क्योंकि मैदान खुला है।

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