शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

प्रत्येक महीने 70 किसान करते हैं आत्महत्या

संजीव कुमार

देशभर में प्रत्येक महीने 70 से अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं, जबकि आज भी 1.25 लाख किसान परिवार सूदखोरों के चंगुल में फंसे हुए हैं। सूचना के अधिकार कानून के जरिए यह बात सामने आई है।

 

भारत में 2008 से 2011 के बीच 3,340 किसानों ने आत्महत्या की है। इसका मतलब यह है कि देशभर में प्रत्येक महीने 70 से अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं। सूचना के अधिकार कानून के तहत कृषि मंत्रालय के कृषि एवं सहकारिता विभाग ने यह जानकारी दी है। मंत्रालय से मिली जानकारी के अनुसार, इस दौरान सबसे अधिक महाराष्ट्र में 1,862 किसानों ने आत्महत्या की है, जबकि आंध्र प्रदेश में 1,065 किसानों ने आत्महत्या की। तो कर्नाटक में इस अवधि में 371 किसानों ने आत्महत्या की। वहीं पंजाब में इस दौरान 31 किसानों ने आत्महत्या की है। केरल में यह आंकड़ा 11 का है। गौरतलब है कि इन किसानों ने सूदखोरों के कर्ज से तंग आकर मौत को गले लगाया है।
देशभर में 2008 से 2011 के बीच 3,340 किसानों ने आत्महत्या की है। इसका मतलब यह है कि देशभर में प्रत्येक महीने 70 से अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं। इस दौरान सबसे अधिक महाराष्ट्र में 1,862 किसानों ने आत्महत्या की है, जबकि आंध्र प्रदेश में 1,065 किसानों ने आत्महत्या की है।
सूचना के अधिकार से यह जानकारी भी मिली है कि देशभर में सबसे अधिक कर्ज किसानों ने सूदखोरों से ही लिया है। यह जानकारी नेशनल सेम्पल सर्वे संगठन(एनएसएसओ) ने दी है। एनएसएसओ से मिली जानकारी के अनुसार, देश में किसानों के 1,25,000 परिवारों ने सूदखोरों एवं महाजनों से कर्ज लिया है, जबकि 53,902 किसान परिवारों ने व्यापारियों से कर्ज लिया। बैंकों से कर्ज लेने वाले किसान परिवारों की संख्या 1,17,100 है, जबकि को-ऑपरेटिव सोसाइटी से 1,14,785 किसान परिवारों ने कर्ज लिया है। सरकार से 14,769 किसान परिवारों ने और रिश्तेदारों एवं मित्रों से 77,602 किसान परिवारों ने कर्ज लिया है। आरटीआई कार्यकर्ता गोपाल प्रसाद ने सूचना के अधिकार के तहत 2007-12 के दौरान भारत में किसानों की मौतों का क्षेत्रवार ब्यौरा मांगा था। साथ ही उन किसानों की संख्या के बारे में भी जानकारी मांगी थी जिन्होंने सूदखोरों से कर्ज लिया था।
राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक, 2011 में देश भर में 14 हजार 27 किसानों ने आत्महत्या की है। वहीं 1995 से अबतक देश में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या दो लाख 70 हजार 940 पर पहुंच गई है। पिछले एक दशक से देश भर में किसानों की आत्महत्या के मामले में पांच राज्य शीर्ष पर बने हुए हैं। इनमें महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश शामिल हैं। 2011 में भी पूरे देश में किसानों द्वारा की गई आत्महत्याओं का 64 फीसदी इन्ही पांच राज्यों में ही रहा।
यह विडंबना ही है कि केंद्र व राज्य सरकार के अनेकानेक दावों के बावजूद आज भी कर्ज के बोझ तले दबे किसान आत्महत्या को मजबूर हैं। और यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। दूसरी तरफ सरकार के दावे हवा में ही झूल रहे हैं।
इन आत्महत्याओं को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि सरकार किसानों के प्रति पूरी तरह उदासीन है। हमारी सरकार को तो सिर्फ कॉरपोरेट घरानों की ही चिंता है। यदि सरकार थोड़ी-बहुत चिंता हमारे किसान भाइयों की भी करते तो यह दिन हमें देखना न पड़ता।
विशेषज्ञों की मानें तो किसानों के लिए सिर्फ योजनाएं बनाने से नहीं होगा बल्कि उन योजनाओं का लाभ उन किसानों को मिल रहा है या नहीं इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है। इस बाबत कृषि मामलों के जानकार देवेन्द्र शर्मा का कहना है कि ‘‘यदि किसानों को सही समय और उचित मूल्य पर खेती के लिए खाद, बीज और अन्य उर्वरक मिल जाए तो किसानों को आत्महत्या करने की नौबत नहीं आएगी। साथ ही सरकार ऐसी व्यवस्था करे जिससे हमारे किसानों को स्थानीय सूदखोरों की चंगुल में फंसना न पड़े।’’
वर्ष 2011 में आत्महत्या करने वाले किसान
राज्य         आत्महत्याएं
महाराष्ट्र    3,337       
आंध्र प्रदेश    2,206       
कर्नाटक     2,100       
मध्य प्रदेश    1,326       
पश्चिम बंगाल    807       
उत्तर प्रदेश    645       
गुजरात    578       
हरियाणा    384       
पंजाब        98
झारखंड    94
बिहार        83       
हिमाचल प्रदेश    46       
उत्तराखंड    25
(सभी आंकड़े राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार)


 

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