संजीव कुमार
यूपीए 2 कैबिनेट की यह तीसरी और आखिरी फेरबदल आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर किया गया है। यह फेरबदल इस मायने में अलग है कि इसमें कांग्रेस ने अपने घटक दलों को कोई तवज्जो नहीं दी। वहीं कुछ नए चेहरों को मंत्रिमंडल में पहली बार शामिल किया है।
मनमोहन सरकार ने अपने मंत्रिमंडल में भारी फेरबदल किया है। सत्ता के गलियारों में इसकी चर्चा काफी दिनों से थी। इस बदलाव से यह साफ हो गया कि इसमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की नहीं चली। इस फेरबल में राहुल गांधी की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही थी। यह कहा जा रहा था कि आगामी लोकसभा चुनाव से पहले इन फेरबदल से कांग्रेस पार्टी पूरे देश में राहुल गांधी को अपने नेता के रूप में प्रोजेक्ट करेगी। लेकिन मंत्रिमंडल में हुए फेरबल कुछ और ही कहानी कहता है। ऐसा लगता है कि इस मंत्रिमंडल विस्तार में सिफ दस जनपथ की चली। यानी सोनिया गांधी की चली।
हां इसमें राहुल गांधी का असर सिर्फ इतना हुआ कि उन्होंने अपने युवा साथियों की पदोन्नति करवाई। इसमें सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मनीष तिवारी और पल्लम राजू जैसे युवा नेता शामिल हैं। ऐसा लगता है कि राहुल गांधी की युवा टीम अगली पारी के लिए तैयार हो रही है। लेकिन इस फेरबदल में राहुल अपनी टीम के कुछ और साथियों को शामिल करवा पाते तो उनके लिए बेहतर होता। राहुल काफी दिनों से युवा कांग्रेस के साथ काम कर रहे हैं इसलिए उम्मीद की जा रही थी कि युवा कांग्रेस से कुछ नए चेहरों को शामिल किया जा सकता है। इनमें मीनाक्षी नटराजन, प्रदीप मांझी, ज्योति मिर्धा आदि का नाम शामिल था लेकिन इन लोगों को इस बार मौका नहीं मिला।
इसके अलावा इस फेरबदल से एक संदेश जो साफ दिखाई देता है वह यह है कि कांग्रेस आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और पंजाब को खासा महत्व दिया है। साथ ही राजस्थान, कर्नाटक और केरल के नेताओं को भागीदारी मिली है। आंध्र प्रदेश में तेलंगाना और वाईएसआर कांग्रेस के गठन के बाद कांग्रेस की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं इसलिए यहां से 6 सांसदों को मंत्रिमंडल में जगह मिली है।
आध्र प्रदेश दक्षिण भारत का अकेला ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस की अपने दम पर सरकार है। हालांकि कांग्रेस ने चिरंजीवी की पार्टी को अपने विलय करा लिया लेकिन उनकी लोकप्रियता का कितना फायदा कांग्रेस को होगा यह तो समय ही बताएगा। एक बात साफ है कि कांग्रेस ने चिरंजीवी से विलय के समय जो वादा किया था, उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल कर उसे अब पूरा किया है।
वहीं पश्चिम बंगाल से तीन नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल कर कांग्रेस ने बंगाल में ममता बनर्जी से अलग चलने का संकेत दिया है। यही वजह है कि ममता बनर्जी के धुर विरोधी दीपा दासमुंशी और अधीर रंजन चौधरी को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है।
इस फेरबदल में महाराष्ट्र को तरजीह नहीं दिया गया है। विलासराव देशमुख के निधन और मुकुल वासनिक के इस्तीफे के बाद यहां से किसी भी नेता को शामिल नहीं किया जाना महाराष्ट्र की उपेक्षा है। ऐसा लगता है कि सुशील कुमार शिंदे को लोकसभा का नेता बनाकर कांग्रेस ने महाराष्ट्र का ध्यान पहले ही रख लिया है। यहां से एनसीपी के राज्यसभा सांसद तारिक अनवर को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। वहीं झारखंड से सुबोधकांत सहाय के इस्तीफे के बाद वहां से भी किसी भी नेता को शामिल नहीं किया समझ से परे है।
बहरहाल, इस मंत्रिमंडल विस्तार में कुछ लोगों का कद काफी बढ़ा है। इनमें सबसे ज्यादा महत्व सलमान खुर्शीद को मिला है। हलांकि सलमान खुर्शीद पर जिस तरह से भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, उससे उनकी छवि खराब हुई है। इसके बावजूद कांग्रेस ने उन्हें विदेश मंत्रालय का अहम विभाग सौंपा है। इससे सरकार ने सलमान खुर्शीद पर अरविंद केजरीवाल के आरोपों को सिरे से खारिज करने का संकेत दिया है। वहीं पल्लम राजू को कैबिनेट में मानव संसाधन विकास मंत्रालय का अहम पद भी आंध्रप्रदेश को अहमियत देने की वजह से मिला है। दूसरी तरफ जयपाल रेड्डी के विभाग बदला जाना कुछ पच नहीं रहा है। वहीं कुछ मंत्रियों को उनकी जिम्मेदारी से मुक्त किए जाने पर भी सवाल जरूर उठ रहे हैं।
गौरतलब है कि जिस तरह मंत्रियों से इस्तीफे लिए गए उसका कारण पार्टी में काम करना नहीं बल्कि अलग कारणों से इस्तीफा लिया गया था। इसलिए मंत्रिमंडल में इस फेरबदल को कामराज योजना से तुलना नहीं की जा सकती। लेकिन मंत्रिमंडल मंे हुए इस फेरबदल से यह स्पष्ट है कि कांग्रेस लोकसभा चुनावों की तैयारी में जुट गई है। क्योंकि इन बदलावों से सरकार के कामकाज पर कोई खास असर नहीं पड़ने वाला है। ये मंत्री अपने कामकाज से अपनी सरकार की छवि को सुधार पाएंगे, यह इतने कम समय में संभव नहीं दिखता। क्योंकि जबतक वे अपने काम को समझेंगे तबतक चुनाव का समय आ जाएगा। ऐसे में ये मंत्री इतने कम दिनों में क्या कर पाते हैं यह देखने वाली बात होगी।
बहरहाल मनमोहन कैबिनेट में शामिल मंत्री अपने इलाके और प्रदेशों में पार्टी को कितना फायदा पहुंचाएंगे यह देखने वाली बात होगी। यूपीए 2 का आखिरी फेरबदल कांग्रेस को आगामी लोकसभा चुनाव में कितना फायदेमंद होगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा।
आंध्र, प. बंगाल और पंजाब को खास तरजीह
मनमोहन सरकार ने अपने में फेरबदल आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर किया है। 2009 में जिन-जिन राज्यों में कांग्रेस को सफलता मिली उन-उन राज्यों पर कांग्रेस विशेष ध्यान दे रही है। इसलिए इस फेरबदल में तीन राज्यों का खास ख्याल किया गया है। वे हैं- आंध्र प्रदेश, पंजाब और पश्चिम बंगाल। इस फेरबदल में आध्र प्रदेश से सबसे अधिक 6 और पंजाब व पश्चिम बंगाल सेे 3-3 लोगों को जगह दी है।
आंध्र प्रदेश से चिरंजीवी, केजय सूर्य प्रकाश रेड्डी, एस सत्यनाराण, बलराम नायक, डॉ कृपारानी किल्ली को पहली बार मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। वहीं एमएम पल्लम राजू को प्रमोट कर मानव संसाधन मंत्री बनाया गया है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि 2009 में आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की सफलता के पीछे वाईएस राजशेखर रेड्डी का हाथ था। लेकिन उनके गुजरने के बाद उनके बेटे जगनमोहन रेड्डी से कांग्रेस ने किनारा कर लिया। हाल के उपचुनावों में जिस तरह जगनमोहन रेड्डी को सफलता मिली है उससे कांग्रेस नेतृत्व सकते में हैं। यही वजह है कि इस मंत्रिमंडल में आंध्र प्रदेश से सबसे अधिक लोगों को शामिल किया गया है। वैसे इनमें से एक भी नाम ऐसा नहीं है तो कांग्रेस को जगनमोहन के मुकाबले में खड़ा कर पाएगी। जिन लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है उसके विरोध वहां कई सांसदों ने इस्तीफा भी दे दिया है। चिरंजीवी सिने कलाकार हैं वे कांग्रेस का कितना भला करेंगे यह तो समय ही बताएगा।
वहीं पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के धुर विरोधी माने जाने वाले तीन कांग्रेसियों को केंद्र में मंत्री बनाए जाने से कांग्रेस को सांगठनिक फायदा होता जान पड़ता है। पश्चिम बंगाल से एएच खान चौधरी, अधीर रंजन चौधरी और दीपा दास मुंशी को मंत्रिमंडल में पहली बार शामिल किया गया है। हालांकि तीनों को राज्य मंत्री बनाया गया है लेकिन प. बंगाल में चल रही योजनाओं के मामले उन्हें निर्णय लेने की पूरी छूट होगी। रेल परियोजनाओं को लेकर प. बंगाल में ममता बनर्जी से अधीर रंजन चौधरी का कई बार टकराव हो चुका है। अब रेल राज्य मंत्री बनते ही अधीर रंजन ने अनुत्पादक परियोजनाओं को रद्द करने का ऐलान किया है। बंगाल में मालदा, मुर्शिदाबाद और दिनाजपुर जिले को कांग्रेस का गढ़ माना जाता है। इन जिलों से सटे जिलों में कांग्रेस को फायदा मिल सकता है। और बंगाल में कांग्रेस का पुनरुद्धार हो सकता है।
दूसरी तरफ पंजाब में हिंदू मतदाता को ध्यान में रखकर ही पवन बंसल, अश्विनी कुमार और मनीष तिवारी को मंत्रिमंडल में प्रमुखता दिया गया है। पंजाब में हिंदू या तो कांगेस के साथ होता है या भाजपा के साथ होता है। कांग्रेस ने यह दांव इसलिए खेला है क्योंकि सुखबीर सिंह बादल ने सिख और हिंदू मतदाता को अपने पाले में कर लिया है। पंजाब में बिना हिंदुओं के समर्थन के सरकार बनाना मुश्किल है। यह बात अब कांग्रेस के भी समझ में आ गई है। इसलिए वह पंजाब में 2014 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए पवन बंसल, अश्विनी कुमार और मनीष तिवारी जैसे हिंदू नेताओं को प्रमोट किया है। पवन बंसल और अश्विनी कुमार को पदोन्नत किया गया है तो मनीष तिवारी को राज्य मंत्री का स्वतंत्र प्रभार देते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनाया गया है।
हां इसमें राहुल गांधी का असर सिर्फ इतना हुआ कि उन्होंने अपने युवा साथियों की पदोन्नति करवाई। इसमें सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मनीष तिवारी और पल्लम राजू जैसे युवा नेता शामिल हैं। ऐसा लगता है कि राहुल गांधी की युवा टीम अगली पारी के लिए तैयार हो रही है। लेकिन इस फेरबदल में राहुल अपनी टीम के कुछ और साथियों को शामिल करवा पाते तो उनके लिए बेहतर होता। राहुल काफी दिनों से युवा कांग्रेस के साथ काम कर रहे हैं इसलिए उम्मीद की जा रही थी कि युवा कांग्रेस से कुछ नए चेहरों को शामिल किया जा सकता है। इनमें मीनाक्षी नटराजन, प्रदीप मांझी, ज्योति मिर्धा आदि का नाम शामिल था लेकिन इन लोगों को इस बार मौका नहीं मिला।
इसके अलावा इस फेरबदल से एक संदेश जो साफ दिखाई देता है वह यह है कि कांग्रेस आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और पंजाब को खासा महत्व दिया है। साथ ही राजस्थान, कर्नाटक और केरल के नेताओं को भागीदारी मिली है। आंध्र प्रदेश में तेलंगाना और वाईएसआर कांग्रेस के गठन के बाद कांग्रेस की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं इसलिए यहां से 6 सांसदों को मंत्रिमंडल में जगह मिली है।
आध्र प्रदेश दक्षिण भारत का अकेला ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस की अपने दम पर सरकार है। हालांकि कांग्रेस ने चिरंजीवी की पार्टी को अपने विलय करा लिया लेकिन उनकी लोकप्रियता का कितना फायदा कांग्रेस को होगा यह तो समय ही बताएगा। एक बात साफ है कि कांग्रेस ने चिरंजीवी से विलय के समय जो वादा किया था, उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल कर उसे अब पूरा किया है।
वहीं पश्चिम बंगाल से तीन नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल कर कांग्रेस ने बंगाल में ममता बनर्जी से अलग चलने का संकेत दिया है। यही वजह है कि ममता बनर्जी के धुर विरोधी दीपा दासमुंशी और अधीर रंजन चौधरी को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है।
इस फेरबदल में महाराष्ट्र को तरजीह नहीं दिया गया है। विलासराव देशमुख के निधन और मुकुल वासनिक के इस्तीफे के बाद यहां से किसी भी नेता को शामिल नहीं किया जाना महाराष्ट्र की उपेक्षा है। ऐसा लगता है कि सुशील कुमार शिंदे को लोकसभा का नेता बनाकर कांग्रेस ने महाराष्ट्र का ध्यान पहले ही रख लिया है। यहां से एनसीपी के राज्यसभा सांसद तारिक अनवर को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। वहीं झारखंड से सुबोधकांत सहाय के इस्तीफे के बाद वहां से भी किसी भी नेता को शामिल नहीं किया समझ से परे है।
बहरहाल, इस मंत्रिमंडल विस्तार में कुछ लोगों का कद काफी बढ़ा है। इनमें सबसे ज्यादा महत्व सलमान खुर्शीद को मिला है। हलांकि सलमान खुर्शीद पर जिस तरह से भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, उससे उनकी छवि खराब हुई है। इसके बावजूद कांग्रेस ने उन्हें विदेश मंत्रालय का अहम विभाग सौंपा है। इससे सरकार ने सलमान खुर्शीद पर अरविंद केजरीवाल के आरोपों को सिरे से खारिज करने का संकेत दिया है। वहीं पल्लम राजू को कैबिनेट में मानव संसाधन विकास मंत्रालय का अहम पद भी आंध्रप्रदेश को अहमियत देने की वजह से मिला है। दूसरी तरफ जयपाल रेड्डी के विभाग बदला जाना कुछ पच नहीं रहा है। वहीं कुछ मंत्रियों को उनकी जिम्मेदारी से मुक्त किए जाने पर भी सवाल जरूर उठ रहे हैं।
गौरतलब है कि जिस तरह मंत्रियों से इस्तीफे लिए गए उसका कारण पार्टी में काम करना नहीं बल्कि अलग कारणों से इस्तीफा लिया गया था। इसलिए मंत्रिमंडल में इस फेरबदल को कामराज योजना से तुलना नहीं की जा सकती। लेकिन मंत्रिमंडल मंे हुए इस फेरबदल से यह स्पष्ट है कि कांग्रेस लोकसभा चुनावों की तैयारी में जुट गई है। क्योंकि इन बदलावों से सरकार के कामकाज पर कोई खास असर नहीं पड़ने वाला है। ये मंत्री अपने कामकाज से अपनी सरकार की छवि को सुधार पाएंगे, यह इतने कम समय में संभव नहीं दिखता। क्योंकि जबतक वे अपने काम को समझेंगे तबतक चुनाव का समय आ जाएगा। ऐसे में ये मंत्री इतने कम दिनों में क्या कर पाते हैं यह देखने वाली बात होगी।
बहरहाल मनमोहन कैबिनेट में शामिल मंत्री अपने इलाके और प्रदेशों में पार्टी को कितना फायदा पहुंचाएंगे यह देखने वाली बात होगी। यूपीए 2 का आखिरी फेरबदल कांग्रेस को आगामी लोकसभा चुनाव में कितना फायदेमंद होगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा।
आंध्र, प. बंगाल और पंजाब को खास तरजीह
मनमोहन सरकार ने अपने में फेरबदल आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर किया है। 2009 में जिन-जिन राज्यों में कांग्रेस को सफलता मिली उन-उन राज्यों पर कांग्रेस विशेष ध्यान दे रही है। इसलिए इस फेरबदल में तीन राज्यों का खास ख्याल किया गया है। वे हैं- आंध्र प्रदेश, पंजाब और पश्चिम बंगाल। इस फेरबदल में आध्र प्रदेश से सबसे अधिक 6 और पंजाब व पश्चिम बंगाल सेे 3-3 लोगों को जगह दी है।
आंध्र प्रदेश से चिरंजीवी, केजय सूर्य प्रकाश रेड्डी, एस सत्यनाराण, बलराम नायक, डॉ कृपारानी किल्ली को पहली बार मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। वहीं एमएम पल्लम राजू को प्रमोट कर मानव संसाधन मंत्री बनाया गया है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि 2009 में आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की सफलता के पीछे वाईएस राजशेखर रेड्डी का हाथ था। लेकिन उनके गुजरने के बाद उनके बेटे जगनमोहन रेड्डी से कांग्रेस ने किनारा कर लिया। हाल के उपचुनावों में जिस तरह जगनमोहन रेड्डी को सफलता मिली है उससे कांग्रेस नेतृत्व सकते में हैं। यही वजह है कि इस मंत्रिमंडल में आंध्र प्रदेश से सबसे अधिक लोगों को शामिल किया गया है। वैसे इनमें से एक भी नाम ऐसा नहीं है तो कांग्रेस को जगनमोहन के मुकाबले में खड़ा कर पाएगी। जिन लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है उसके विरोध वहां कई सांसदों ने इस्तीफा भी दे दिया है। चिरंजीवी सिने कलाकार हैं वे कांग्रेस का कितना भला करेंगे यह तो समय ही बताएगा।
वहीं पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के धुर विरोधी माने जाने वाले तीन कांग्रेसियों को केंद्र में मंत्री बनाए जाने से कांग्रेस को सांगठनिक फायदा होता जान पड़ता है। पश्चिम बंगाल से एएच खान चौधरी, अधीर रंजन चौधरी और दीपा दास मुंशी को मंत्रिमंडल में पहली बार शामिल किया गया है। हालांकि तीनों को राज्य मंत्री बनाया गया है लेकिन प. बंगाल में चल रही योजनाओं के मामले उन्हें निर्णय लेने की पूरी छूट होगी। रेल परियोजनाओं को लेकर प. बंगाल में ममता बनर्जी से अधीर रंजन चौधरी का कई बार टकराव हो चुका है। अब रेल राज्य मंत्री बनते ही अधीर रंजन ने अनुत्पादक परियोजनाओं को रद्द करने का ऐलान किया है। बंगाल में मालदा, मुर्शिदाबाद और दिनाजपुर जिले को कांग्रेस का गढ़ माना जाता है। इन जिलों से सटे जिलों में कांग्रेस को फायदा मिल सकता है। और बंगाल में कांग्रेस का पुनरुद्धार हो सकता है।
दूसरी तरफ पंजाब में हिंदू मतदाता को ध्यान में रखकर ही पवन बंसल, अश्विनी कुमार और मनीष तिवारी को मंत्रिमंडल में प्रमुखता दिया गया है। पंजाब में हिंदू या तो कांगेस के साथ होता है या भाजपा के साथ होता है। कांग्रेस ने यह दांव इसलिए खेला है क्योंकि सुखबीर सिंह बादल ने सिख और हिंदू मतदाता को अपने पाले में कर लिया है। पंजाब में बिना हिंदुओं के समर्थन के सरकार बनाना मुश्किल है। यह बात अब कांग्रेस के भी समझ में आ गई है। इसलिए वह पंजाब में 2014 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए पवन बंसल, अश्विनी कुमार और मनीष तिवारी जैसे हिंदू नेताओं को प्रमोट किया है। पवन बंसल और अश्विनी कुमार को पदोन्नत किया गया है तो मनीष तिवारी को राज्य मंत्री का स्वतंत्र प्रभार देते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनाया गया है।

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