संजीव कुमार
प्रो. अजय तिवारी ने संगोष्ठी में बीज भाषण देते हुए कहा कि रामविलास जी का इतिहास बोध तथ्यों और तर्कों से बना था। उन्होंने हमारे सामने एक वैकल्पिक इतिहास बोध प्रस्तुत किया। उनका सारा लेखन जनता के हित को आगे बढ़ाने वाले तत्वों को सामने लाने के लिए है। प्रो. तिवारी ने गांधी और रामविलास जी की तुलना करते हुए कहा कि आधुनिक हिंदी मानस के निर्माण करने वालों में पहले व्यक्ति महात्मा गांधी हैं तो दूसरे व्यक्ति रामविलास शर्मा हैं। दोनों का इतिहास बोध तथ्यों और तर्कों पर आधारित है और दोनों ने धर्म को संस्कृति से अलग करके देखा और समझा है।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए साहित्य अकादेमी के कार्यकारी अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि मैं दो लेखकों का सर्वाधिक सम्मान करता हंू और वह है हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा। इन दोनों लेखकों ने जितनी कालजयी कृतियां हिन्दी समाज को दीं और किसी ने नहीं दीं। रामविलास जी के साथ अपने एक साक्षात्कार का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वे मार्क्सवाद को परंपरा का निषेध नहीं बल्कि उसे परंपरा का विकास मानते थे। उनकी आलोचना का मुख्य तत्व साम्राज्यवाद का विरोध था। उनका जीवन ऋषि तुल्य साधक का था। वहीं उनके पुत्र विजय मोहन शर्मा ने कहा कि लेखकों के जन्मशती को कोई स्थायी रूप देने के लिए हिन्दी साहित्यकारों को आगे आना चाहिए।
‘हिन्दी आलोचना और रामविलास शर्मा’ विशयक पहले सत्र की अध्यक्षता करते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि जातीयता और साम्राज्यवाद के विरोध को हिन्दी साहित्य के भाव बोध का अभिन्न अंग बनाने का काम रामविलास शर्मा ने किया। वह केवल एक आलोचक ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय समाज की चिंताओं पर विचार करने वाले चिंतक थे। आगे उन्होंने कहा कि करुण रस की जैसी व्याख्या रामविलास शर्मा ने किया वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। साथ ही उन्होंने पहली बार इस तथ्य की महत्ता को स्थापित किया कि कोई भी रचना अपने समय और समाज से संदर्भित होती है।
वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने कहा कि रामविलास जी ऐसे आलोचक थे जिनसे असहमत होना असंभव है। उन्होंने हिन्दी समीक्षा को नया चेहरा दिया। राजेन्द्र कुमार ने शर्माजी के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि उन्होंने आलोचना शब्द को नया अर्थ विस्तार दिया है। वहीं रवि श्रीवास्तव ने कहा कि परंपरा का मूल्यांकन और जातीयता की अवधारणा उनके आलोचना के मूल में है।
संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में ‘भारतीयता की अवधारणा और हिन्दी जाति’ विषय पर रमेश कुंतल ‘मेघ’ की अध्यक्षता में रवि भूषण, कृष्णदत्त पालीवाल और अजय बिसारिया ने अपने विचार रखें।
संगोष्ठी के दूसरे दिन और तीसरे सत्र में ‘हिंदी नवजागरण का स्वरूप’ विषय पर बोलते हुए कर्मेन्दु शिशिर ने कहा कि नवजागरण का सबसे उपयुक्त माहौल अभी है। बदलने के लिए सोचना ही नवजागरण का सही समय है। आगे उन्होंने कहा कि हिंदी का नवजागरण और हिंदी क्षेत्र का नवजागरण दोनों अलग बातें हैं। साथ ही उन्होंने इतिहासकार केएम पन्निकर से सवाल पूछते हुए कहा कि अगर हिंदी प्रदेश सोया हुआ था तो यह हिंदी प्रदेश स्वतंत्रता का मुख्य केंद्र कैसे हो गया। वहीं वरिष्ठ साहित्यकार शंभुनाथ ने स्वाधीनता आंदोलन को नवजागरण का हिस्सा बताते हुए कहा कि नवजागरण ने लोक चित्त को बड़ा बनाया। रामविलास शर्मा ने किसानों की समस्याओं को उभारकर उसे नवजागरण से जोड़ा। इसी सत्र में श्रीभगवान सिंह और सत्यदेव त्रिपाठी ने भी अपने-अपने आलेख पढ़े।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए नित्यानंद तिवारी ने कहा कि लोकजागरण और नवजागरण के क्या सूत्र हो सकते हैं रामविलास जी ने हमें यह रास्ता दिखाया। उन्होंने यह बताया कि नवजागरण के केंद्र में 1857 का सिपाही विद्रोह है और इसके लिए राजनीतिक बोध आवश्यक है। साथ ही प्रो. तिवारी ने कहा कि आंदोलनों से जुड़े बिना साहित्य, जीवन और समाज का साहित्य नहीं हो सकता।
संगोष्ठी के चतुर्थ सत्र में ‘भारतीय समाज और भाषा का प्रश्न’ विषय पर बोलते हुए श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि रामविलास जी के जातीय चिंतन को भाषा से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने अपने भाषा संबंधी चिंतन से भाषायी सियासत के औपनिवेशिक मानसिकता को ध्वस्त किया था। वहीं दिलीप सिंह ने कहा कि रामविलास जी की रचना में इतिहास बोध, भूगोल, समाज और व्यक्ति आपस में गुंथे हुए हैं। इस सत्र में राजेंद्र प्रसाद पांडेय और गरिमा श्रीवास्तव ने अपने आलेख पढ़े। सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार भगवान सिंह ने कहा कि समस्या के बाद चिंतन करना रामविलास का काम था। इसलिए वे चिंतक विद्वान की श्रेणी में आते हैं।
बीते 2-3 नवंबर को साहित्य अकादेमी ने वरिष्ठ आलोचक रामविलास शर्मा की जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में एक दो दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया था। इस संगोष्ठी के चार सत्रों में विद्वानों ने रामविलास शर्मा के व्यक्तित्व व कृतित्व पर अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए।
‘‘वर्तमान हिन्दी समीक्षा का जो आज प्रगतिशील स्वरूप है उसका निर्माण रामविलास शर्मा के अथक संघर्षों से ही बना है।’’ ये बातें आलोचक शिवकुमार मिश्र ने कही। वे साहित्य अकादेमी के तत्वावधान में आयोजित रामविलास शर्मा जन्मशतवार्षिकी संगोष्ठी में उद्घाटन भाषण देते हुए ये बातें कही। आगे उन्होंने कहा कि रामविलास शर्मा ने परंपरा को प्रगति से जोड़ा और उसे प्रतिगामी तत्वों से अलग किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि परंपरा के बिना प्रगति संभव नहीं है। रामविलास जी ने अपने जीवन में जितनी चुनौतियां और विरोधों को झेला उससे ज्यादा चुनौतियां हिन्दी समाज के आगे उछाली भी। वे साहित्य, समाज, राजनीति, जाति, भाषाविज्ञान या चाहे कोई भी क्षेत्र हो वे तर्कपूर्ण ढंग से अपनी बात रखते हैं। आलोचना के क्षेत्र में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद यदि किसी का नाम लिया जा सकता है तो वे रामविलास शर्मा ही हैं। साथ ही उन्होंने इस बात पर क्षोभ प्रकट किया कि उनके तर्कों पर उदासीनता बरती गई और उनको जाने-बूझे बिना ही खारिज करने की होड़-सी लग गई। हमें उनका सामना तथ्यों और तर्कों के साथ करना होगा जो हम नहीं कर पा रहे हैं।प्रो. अजय तिवारी ने संगोष्ठी में बीज भाषण देते हुए कहा कि रामविलास जी का इतिहास बोध तथ्यों और तर्कों से बना था। उन्होंने हमारे सामने एक वैकल्पिक इतिहास बोध प्रस्तुत किया। उनका सारा लेखन जनता के हित को आगे बढ़ाने वाले तत्वों को सामने लाने के लिए है। प्रो. तिवारी ने गांधी और रामविलास जी की तुलना करते हुए कहा कि आधुनिक हिंदी मानस के निर्माण करने वालों में पहले व्यक्ति महात्मा गांधी हैं तो दूसरे व्यक्ति रामविलास शर्मा हैं। दोनों का इतिहास बोध तथ्यों और तर्कों पर आधारित है और दोनों ने धर्म को संस्कृति से अलग करके देखा और समझा है।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए साहित्य अकादेमी के कार्यकारी अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि मैं दो लेखकों का सर्वाधिक सम्मान करता हंू और वह है हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा। इन दोनों लेखकों ने जितनी कालजयी कृतियां हिन्दी समाज को दीं और किसी ने नहीं दीं। रामविलास जी के साथ अपने एक साक्षात्कार का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वे मार्क्सवाद को परंपरा का निषेध नहीं बल्कि उसे परंपरा का विकास मानते थे। उनकी आलोचना का मुख्य तत्व साम्राज्यवाद का विरोध था। उनका जीवन ऋषि तुल्य साधक का था। वहीं उनके पुत्र विजय मोहन शर्मा ने कहा कि लेखकों के जन्मशती को कोई स्थायी रूप देने के लिए हिन्दी साहित्यकारों को आगे आना चाहिए।
‘हिन्दी आलोचना और रामविलास शर्मा’ विशयक पहले सत्र की अध्यक्षता करते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि जातीयता और साम्राज्यवाद के विरोध को हिन्दी साहित्य के भाव बोध का अभिन्न अंग बनाने का काम रामविलास शर्मा ने किया। वह केवल एक आलोचक ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय समाज की चिंताओं पर विचार करने वाले चिंतक थे। आगे उन्होंने कहा कि करुण रस की जैसी व्याख्या रामविलास शर्मा ने किया वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। साथ ही उन्होंने पहली बार इस तथ्य की महत्ता को स्थापित किया कि कोई भी रचना अपने समय और समाज से संदर्भित होती है।
वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने कहा कि रामविलास जी ऐसे आलोचक थे जिनसे असहमत होना असंभव है। उन्होंने हिन्दी समीक्षा को नया चेहरा दिया। राजेन्द्र कुमार ने शर्माजी के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि उन्होंने आलोचना शब्द को नया अर्थ विस्तार दिया है। वहीं रवि श्रीवास्तव ने कहा कि परंपरा का मूल्यांकन और जातीयता की अवधारणा उनके आलोचना के मूल में है।
संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में ‘भारतीयता की अवधारणा और हिन्दी जाति’ विषय पर रमेश कुंतल ‘मेघ’ की अध्यक्षता में रवि भूषण, कृष्णदत्त पालीवाल और अजय बिसारिया ने अपने विचार रखें।
संगोष्ठी के दूसरे दिन और तीसरे सत्र में ‘हिंदी नवजागरण का स्वरूप’ विषय पर बोलते हुए कर्मेन्दु शिशिर ने कहा कि नवजागरण का सबसे उपयुक्त माहौल अभी है। बदलने के लिए सोचना ही नवजागरण का सही समय है। आगे उन्होंने कहा कि हिंदी का नवजागरण और हिंदी क्षेत्र का नवजागरण दोनों अलग बातें हैं। साथ ही उन्होंने इतिहासकार केएम पन्निकर से सवाल पूछते हुए कहा कि अगर हिंदी प्रदेश सोया हुआ था तो यह हिंदी प्रदेश स्वतंत्रता का मुख्य केंद्र कैसे हो गया। वहीं वरिष्ठ साहित्यकार शंभुनाथ ने स्वाधीनता आंदोलन को नवजागरण का हिस्सा बताते हुए कहा कि नवजागरण ने लोक चित्त को बड़ा बनाया। रामविलास शर्मा ने किसानों की समस्याओं को उभारकर उसे नवजागरण से जोड़ा। इसी सत्र में श्रीभगवान सिंह और सत्यदेव त्रिपाठी ने भी अपने-अपने आलेख पढ़े।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए नित्यानंद तिवारी ने कहा कि लोकजागरण और नवजागरण के क्या सूत्र हो सकते हैं रामविलास जी ने हमें यह रास्ता दिखाया। उन्होंने यह बताया कि नवजागरण के केंद्र में 1857 का सिपाही विद्रोह है और इसके लिए राजनीतिक बोध आवश्यक है। साथ ही प्रो. तिवारी ने कहा कि आंदोलनों से जुड़े बिना साहित्य, जीवन और समाज का साहित्य नहीं हो सकता।
संगोष्ठी के चतुर्थ सत्र में ‘भारतीय समाज और भाषा का प्रश्न’ विषय पर बोलते हुए श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि रामविलास जी के जातीय चिंतन को भाषा से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने अपने भाषा संबंधी चिंतन से भाषायी सियासत के औपनिवेशिक मानसिकता को ध्वस्त किया था। वहीं दिलीप सिंह ने कहा कि रामविलास जी की रचना में इतिहास बोध, भूगोल, समाज और व्यक्ति आपस में गुंथे हुए हैं। इस सत्र में राजेंद्र प्रसाद पांडेय और गरिमा श्रीवास्तव ने अपने आलेख पढ़े। सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार भगवान सिंह ने कहा कि समस्या के बाद चिंतन करना रामविलास का काम था। इसलिए वे चिंतक विद्वान की श्रेणी में आते हैं।
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