शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

क्या दिल्ली में दूसरा भोपाल गैस कांड होगा?

संजीव कुमार
भोपाल गैस त्रासदी अभी हम भूले नहीं हैं। बिना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की मंजूरी के ओखला बिजली संयंत्र चालू हो गया है। वहीं नरेला-बवाना और गाजीपुर में बिजली संयंत्र निर्माणाधीन है। अगर यह तीनों बिजली परियोजनाएं दिल्ली में बनी तो भोपाल जैसा दूसरा हादसा दिल्ली में भी हो सकता है
 

बिना किसी तकनीकी जांच और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मंजूरी के बिना चीन की कचरा से बिजली बनाने वाली तकनीक से दिल्ली के ओखला स्थित संयंत्र में बिजली बनाई जा रही है। इस तरह कचरा जलाकर बिजली बनाने में डाईऑक्सीन नामक खतरनाक गैस निकलती है। दुर्भाग्य यह है कि इस दुष्प्रभाव को जानते हुए भी दिल्ली सरकार दिल्ली वासियों और संयंत्र के मजदूरों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। इसका खुलासा 22 मार्च,२2012 को आए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण आयोग के एक रिपोर्ट से हुआ है। वहीं हाल ही में पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन का कहना है कि ओखला का कचरा से बिजली बनाने वाली संयंत्र पूरी तरह सुरक्षित है। ऐसे में जनता किसकी बातों पर भरोसा करे- पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन की बातों पर या केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण आयोग की रिपोर्ट पर?
कंेद्रीय प्रदूषण नियंत्रण आयोग की इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है की कचरा आधारित बिजली संयंत्र से होने वाली त्रासदी के लिए अबतक दिल्ली सरकार ने कोई तैयारी नहीं की है। भोपाल गैस कांड इसका उदाहरण है। इस बाबत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण आयोग ने ओखला बिजली संयंत्र के जिंदल एकोपोलिस कंपनी के अधिकारियों की कड़ी आलोचना की है। आश्चर्य तो यह है कि कंेद्रीय प्रदूषण नियंत्रण आयोग की रिपोर्ट आने से पहले (जनवरी माह से) ही इस बिजली संयंत्र का चालू होना, कई सवाल खड़े करता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण आयोग की रिपोर्ट के बिना यह संयंत्र चालू कैसे हो गया? दूसरा आयोग की रिपोर्ट इतनी देर से क्यों आई? ऐसे कई गंभीर सवाल सरकार पर भी खड़े होते हैं।
बताते चलें कि कूड़े जलाने से जो गैस निकलती है वह जीवन व पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक है। यही कारण है कि सभी विकसित देशों ने अपने यहां ऐसी परियोजनाओं को बंद कर चुकी है। गौरतलब है कि भारत में पहली बार दिल्ली के तिमारपुर में कचरा से बिजली बनाने की परियोजना 1990 में लगाया गया जो असफल रहा। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या हमारे पास वैसी तकनीक है जो कचरे से सुरक्षित बिजली पैदा कर सके? अगर नहीं तो दिल्ली वासियों के जान जोखिम में डालकर इस चीनी तकनीक से बिजली पैदा करने की क्या आवश्यकता है? बताते चलें कि ओखला के अलावा ऐसा ही बिजली संयंत्र दिल्ली के नरेला-बवाना और गाजीपुर में निर्माणाधीन है।
यही वजह है कि पर्यावरण मंत्रालय ने 1997 में जारी अपने श्वेत पत्र में यह बात स्वीकार की है कि जिस तरीके से शहरी कूड़े को जलाया जा रहा है वह तकनीक सही नहीं है। यहीं सवाल यह उठता है कि अब वह तकनीक सही कैसे हो गया? दूसरी तरफ सन् 2005 में संसदीय समिति ऊर्जा के अध्यक्ष रहे गुरूदास कामत ने कूड़े से बिजली बनाने का यह कहते हुए विरोध किया था कि इस प्रकार की तकनीक नुकसान दायक है। इसलिए इसे बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। वहीं भारतीय जनता पार्टी के दिल्ली विधान सभा में विपक्ष के नेता विजय कुमार मलहोत्रा ने सांसद रहते हुए 27 जून, 2008 को दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर तेजेंदर खन्ना को एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने ओखला प्लांट कोे वहां के वासियों के लिए प्रदूषणकारी बताया था। अब भाजपा के विजन डाक्यूमेंट 2025 में दो और कूड़े से बिजली बनाने वाली संयंत्र बनाने का वादा है। क्या अब यह नुकसानदायक नहीं रही? या विजय कुमार मलहोत्रा सत्ता मोह में इस बात को भूल गए हैं।
इताना ही नहीं तत्कालीन पर्यावरण राज्य मंत्री जयराम रमेश ने भी इस बाबत दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को 1 अप्रैल 2011 को एक पत्र लिखा था। उस पत्र में जयराम रमेश ने ओखला बिजली संयंत्र को खतरनाक बताते हुए लिखा था कि इस तरह के संयंत्रों के पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया में ही गड़बड़ी है। प्रक्रिया में गड़बड़ी भी सरकार के मंशा को बताता है कि कैसे पर्यावरण और स्वस्थ्य के लिए नुकसान दायक होते हुए इस परियोजना की मंजूरी दी गई?  कहने का अर्थ यह है कि दिल्ली सरकार भी इस परियोजना के नुकसान दायक पहलुओं को अनदेखा कर रही है। स्पष्ट है, दोनों पार्टियां सत्तालोलुप है। इसलिए उन्हें दिल्ली की जनता की स्वास्थ्य से ज्यादा उन्हें अपनी कुर्सी चिंता सता रही है।
बताते चलें कि ऐसे बिजलीघर न तो कूड़ा निपटाने के लिए बनते हैं और न ही बिजली पैदा करने के लिए। इसके पीछे का कारण कुछ और ही है। इसके अनेक कारणों में से एक कारण यह है कि प्रति मेगावाट की दर से केंद्र सरकार बिजली बनाने वाली कंपनी को डेढ़ करोड़ का अनुदान देती है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी योजनाआंे को अनुदान देने पर रोक लगा रखी है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन कर केंद्र सरकार इस कंपनी को अनुदान दे रही है। इस तरह कंेद्र सरकार भी सवालों के कटघरे में है। टॉक्सिक वॉच के संस्थापक गोपल कृष्ण के अनुसार, ‘‘सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन जिंदल जैसी कंपनियों को अनुदान दे रही है। ऐसे संयंत्रों को तुरंत बंद किया जाना चाहिए। अन्यथा हमें दूसरे भोपाल गैस कांड के लिए तैयार रहना चाहिए।’’   
दूसरी तरफ यह परियोजना कचरा आधारित रोजगार को भी समाप्त करता है। दिल्ली को रौशन करने के नाम पर इस परियोजना को हरी झंडी दिया गया है। गौरतलब है कि दिल्ली में लगभग 80 प्रतिशत क्षेत्र के काम को प्राइवेट कंपनी के हाथों में सौंप दिया गया है लेकिन उसके बावजूद भी समस्या का हल नहीं हो पा रहा है।
बताते चलें कि दिल्ली में कचरे की छंटाई के काम में असंगठित क्षेत्र के लगभग 3.5 लाख मजदूर शामिल हैं। इनके द्वारा 20 से 25 प्रतिशत कचरे की छंटाई के बाद 30 प्रतिशत ऐसे कचरे की छंटाई हो जाएगी जो कच्चे माल के रूप में दुबारा इस्तेमाल होगा। साथ ही 50 प्रतिशत वैसा कचरा होगा जिसे जैविक कूड़ा कहते हैं। उससे खाद बनाया जा सकता है। इस तरह कचरे के 80 प्रतिशत भाग का निपटारा तो समुदाय के स्तर पर ही हो सकता है। ऐसे में कूड़े से बिजली बनानेवाली संयंत्र लगाने की आवश्यकता लगभग नहीं है।

कौन-कौन से हैं संयत्र
संयंत्र         कूड़ा         बिजली उत्पादन    स्थिति
ओखला    2050 मेट्रिक टन    20 मेगावाट     चालू है
नरेला-बवाना 4000 मेट्रिक टन   36 मेगावाट     निर्माणाधीन
गाजीपुर     1300 मेट्रिक टन   10 मेगावाट      निर्माणाधीन

इस परियोजना से हानि
कचरे जलाने से डाईऑक्सीन नाम गैस निकलती है। यह कैंसर के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक रसायन है। कचरे में मौजूद खतरनाक रसायनों को यह तकनीक कई-कई रूपों में वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और पर्यावरण प्रदूषण से हमारे भोजन चक्र का हिस्सा बना देता है। यह जहर केवल धरती या पानी में ही नहीं बल्कि हवा में भी तैरने लगता है। क्योंकि शहरी कूड़े में प्लास्टिक के अलावा पारा भी बहुतायत में मिलता हैं। वैज्ञानिक और व्यावसायिक बुद्धि को किनारे रख दें तो भी क्या हमें यह समझने में दिक्कत है कि प्लास्टिक और पारा के जलने से जो धुंआ निकलता है क्या वह हमारे लिए लाभदायक है?

नजीर पेश करता मणिपुर

संजीव कुमार
विधानसभा चुनाव 2012 के परिणाम कई मामलों में भिन्न है। जनजागरण के बावजूद नव निर्वाचित 690 विधायकों में से 242 माननीय अपराधी छवि वाले और 457 करोड़पति विधायक विधानसभा पहुंच गए हैं। वहीं मणिपुर देश का इकलौता राज्य है जिसके सभी 60 विधायक बेदाग हैं। इस तरह मणिपुर पूरे देश के सामने एक नजीर पेश करता है
विधानसभा चुनाव 2012 के परिणाम आ चुके हैं। सभी पांचों राज्यों में सरकार बन चुकी है। और सदन में सभी नव निर्वाचित विधायक सूबे और जनता की सेवा का शपथ ले चुके हैं। सूबे और जनता की कितनी सेवा करेंगे यह तो आगामी पांच सालों में पता चलेगा। क्योंकि अब यही नव निर्वाचित माननीय अगले पांच सालों तक अपने सूबे में जनता के भाग्य का फैसला करेंगे। गत वर्ष भ्रष्टाचार के खिलाफ जनजागरण का जो बिगुल बजा था। उस बिगुल का कितना असर हुआ? अन्ना टीम और बाबा रामदेव सहित कई प्रमुख संगठनों व लोगों ने इस जनजागरण यज्ञ में अपने हिसाब से जो आहुति दी। इस जनजागरण से लोगों ने कितना सीखा और कितना अपने जीवन में उतारा। अब इसके आकलन का समय है। क्योंकि बीते एक महीने में जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं उन राज्यों की जनता के लिए यह सोचने-विचारने और कुछ करने का समय था। अब उनने क्या किया इस पर बात करने का मौका है। जिन पांचों राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं, वे हैं- उत्तराखंड (70), उत्तर प्रदेश (403), पंजाब (117), गोवा (40) और मणिपुर (60)। इन पांचों राज्यों में कुल 690 माननीय चुने गए हैं। एडीआर और नेशनल इलेक्शन वॉच ने इन सभी नव निर्वाचित विधायकों के हलफनामों का विश्लेषण किया है, जो इन लोगों ने अपना पर्चा दाखिल करते समय चुनाव आयोग को दिए थे। विश्लेषण के अनुसार, नव निर्वाचित 690 विधायकों में से 242 विधायकों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले होने की बात स्वीकार की है। कहने का तात्पर्य यह है कि नव निर्वाचित विधायकों में 35 प्रतिशत विधायक ऐसे हैं जिनके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। वहीं 690 माननीय विधायकों में से 114 विधायक ऐसे हैं जिनके खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास और बलात्कार जैसे गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं।
आपराधिक मामलों वाले विधायकों के मामले में उत्तर प्रदेश शीर्ष पर है। उत्तर प्रदेश के 403 नव निर्वाचित विधायकों में से 189 विधायकों (47 प्रतिशत) के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। वहीं 98 विधायक (24 प्रतिशत) ऐसे हैं जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले चले रहे हैं। इस मामले में गोवा का स्थान दूसरा है। गोवा के 40 नव निर्वाचित विधायकों में से 12 विधायकों (30 प्रतिशत) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले लंबित होने की बात स्वीकार की है। वहीं 3 विधायक (8 प्रतिशत) ऐसे हैं जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं। इस मामले में उत्तराखंड तीसरे नंबर पर है। जहां 70 नव निर्वाचित विधायकों में से 19 विधायकों (27 प्रतिशत) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले होने की बात चुनाव आयोग को बताई है। वहीं 5 विधायक ऐसे हैं जिन्होंने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले लंबित होने की बात की है। इस मामले में चौथे नंबर पर पंजाब है। जहां 117 नव निर्वाचित विधायकों में से 22 विधायकों (19 प्रतिशत) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले होने की बात चुनाव आयोग को बताई है। वहीं 8 विधायक (7 प्रतिशत) ऐसे हैं जिनके खिलाफ हत्या, बलात्कार, फिरौती जैसे गंभीर आपराधिक मामले लंबित है।
वहीं दूसरी तरफ मणिपुर एक ऐसा राज्य है जिसने सभी राज्यों के राजनीतिक दलों और जनता के लिए एक नजीर पेश किया है। इन पांच राज्यों में मणिपुर इकलौता ऐसा राज्य है जिसके सभी 60 विधायक बेदाग हैं। कहने का अर्थ यह है कि मणिपुर के नव निर्वाचित विधायकों में से एक भी विधायक ऐसा नहीं है जिस पर कोई आपराधिक मामला दर्ज हो। कहने की आवश्यकता नहीं है कि मणिपुर का चुनाव परिणाम यह बताता है कि हौसला और जज्बा हो तो कुछ भी संभव है। जनता अगर चाह ले तो अपराधी और भ्रष्टाचारी को सदन के बाहर बिठा सकती है। मणिपुर की जनता ने यह करके दिखाया है। यह निश्चय ही संतोष जनक है। मणिपुर के अलावा अन्य राज्यों में अभी और जनजागरण की आवश्यकता है। क्योंकि अन्य राज्यों से कुछ ऐसे अपराधी छवि के विधायक चुनकर आ गए हैं जिन्हें चुनकर नहीं आना चाहिए था। ऐसे में हमें मणिपुर से सीख लेते हुए और बेहतर करने की कोशिश करनी चाहिए।
आधे से अधिक हैं करोड़पति विधायक
जहां तक करोड़पति विधायकों की बात है तो पांचों राज्यों के 690 नव निर्वाचित विधायकों में से 457 विधायक करोड़पति हैं। कहने का अर्थ यह है कि नव निर्वाचित विधायकों में से 66 प्रतिशत विधायक ऐसे हैं जिन्होंने चुनाव आयोग को दिए अपने हलफनामे अपने को करोड़पति बताया है। इस मामले में गोवा शीर्ष पर है। गोवा के 40 में से 37 नव निर्वाचित (93 प्रतिशत) विधायक करोड़पति हैं। पंजाब इस मामले में दूसरे नंबर पर है। पंजाब के 117 में से 101 नव निर्वाचित (86 प्रतिशत) विधायकों ने अपने आप को करोड़पति बताया है। इस मामले में उत्तर प्रदेश तीसरे नंबर पर है। उत्तर प्रदेश के 403 में से 271 नव निर्वाचित (67 प्रतिशत) विधायक करोड़ति हैं। चौथे नंबर पर उत्तराखंड है। उत्तराखंड के 70 में से 32 नव निर्वाचित (67 प्रतिशत) विधायकों ने अपने को करोड़पति बताया है। करोड़पति विधायकों के मामले में मणिपुर पांचवें नंबर है। मणिपुर के 60 में से 16 विधायक करोड़पति हैं। कहने अर्थ यह है कि मणिपुर के 27 प्रतिशत विधायक ऐसे हैं जिन्होंने अपने आप को करोड़पति घोषित किया है।
हाशिए पर महिलाएं
हम एक तरफ महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं लेकिन जब महिला को सशक्त बनाने की बात आती है तो इस पर ध्यान नहीं देते हैं। बीते पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम से भी यह बात सिद्ध होती है। क्योंकि इन राज्यों में कोई भी ऐसा राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दल नहीं है जिसने आधी आबादी कही जाने वाली महिला को विधानसभा चुनाव 2012 में वाजिब उम्मीदवारी दी हो। अब चुनाव परिणाम को देखें तो पांच राज्यों के कुल 690 विधायकों में नव निर्वाचित महिला विधायकों की संख्या मात्र 55 है जबकि पुरुष विधायकों की संख्या 635 है। कहने का अर्थ यह है कि इस बार मात्र 8 प्रतिशत महिलाएं निर्वाचित होकर विधानसभा में पहुंची हैं। 2007 में महिलाओं का यह प्रतिनिधित्व 5 प्रतिशत ही था जब 37 महिलाएं विधानसभा पहुंची थीं। हालांकि इस चुनाव में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में 3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। आधी आबादी के हिसाब से यह वृद्धि अपेक्षाकृत बहुत ही कम है। वह भी ऐसे समय में जब दो प्रमुख दलों की मुखिया महिला ही हैं।

पांच राज्यों में महिला प्रतिनिधित्व
राज्य    विधायक    पुरुष विधायक    महिला विधायक
उत्तराखंड   70           65           5
उत्तर प्रदेश 403          371         32
गोवा      40            39          1
पंजाब     117          103          14
मणिपुर    60           57           3  
      

लंबित अपराधिक मामलों वाले विधायक
राज्य कुल विधायक आ.मा. वाले विधायक गंभीर आपराधिक मामले वाले विधायक 
उत्तराखंड    70             19                 5
उत्तर प्रदेश  403            189               98
गोवा       40              12                3
पंजाब     117              22                 8
मणिपुर    60               0                 0

 लंबित गंभीर आपराधिक मामलों वाले विधायक
                       (राज्यवार)
उत्तराखंड
क्र.    विधायक    क्षेत्र    पार्टी    गंभीर मामले    कुल आपराधिक मामले
1. अरविंद पांडे    गदरपुर    भाजपा    1                 3   
2. दिनेश अग्रवाल  धरमपुर   कांग्रेस    2                 2   
3. प्रीतम सिंह    चक्रटा    कांग्रेस      1                 2

उत्तर प्रदेश
1. मित्रसेन    बिकापुर    सपा        26                 36
2. सुशील सिंह सकलधीरा  निर्दल       16                 20
3. रामवीर सिंह जसराना    सपा       11                  18

गोवा
1. जीवियर पेेस्को न्यूवेम  जीवीपी      2                  10
2. अतानासियो मॉनसेरेट सेंट क्रूज कांग्रेस  3                  2
3. जेनिफर मॉनसेरेट  टेलीगाव  कांग्रेस    3                  1

पंजाब
1. बीबी जागीर कौर भोलाथ शि.अ.द.      3                  1
2. बलबीर सिद्धू एसएएस नगर कांग्रेस     2                  1
3. सिमरजीत सिंह बैंस अतम नगर निर्दल  3                 6

 करोड़पति विधायक
राज्य    कुल विधायक    करोड़पति विधायक    प्रतिशत
उत्तराखंड    70              32               46
उत्तर प्रदेश  403             271              67
गोवा       40               37              93
पंजाब     117              101               86
मणिपुर    60               16               27
कुल      690              457              66

शीर्ष तीन करोड़पति विधायक (राज्यवार)
उत्तराखंड
विधायक    क्षेत्र    पार्टी    कुल संपत्ति
राजेश शुक्ला    किछा    भाजपा      26.63 करोड़
अमृता रावत    रामनगर    कांग्रेस    13.57 करोड़
सुरेंद्र सिंह जीना    साल्ट    भाजपा    7.04 करोड़

उत्तर प्रदेश
काजिम अली खान    स्वार    कांग्रेस    56.89 करोड़
शाह आलम    मुबारकपुर    बसपा      54.44 करोड़
महेश कुमार शर्मा    नोएडा    भाजपा    37.45 करोड़

गोवा
प्रतापसिंह राणे    पोरियम    कांग्रेस      25.87 करोड़
विजय सरदेसाई    फटोरडा    निर्दल      25.21 करोड़
जेनिफर मॉनसेरेटो    टेलीगाव    कांग्रेस   23.07 करोड़

पंजाब
करण कौर    मुक्तसर    कांग्रेस        128.43 करोड़
सुखबीर सिंह कौर जलालाबाद  शि.अ.द.   90.86 करोड़
केवल सिंह ढिल्लन बरनाला    कांग्रेस    78.51 करोड़

रविवार, 25 मार्च 2012

शहरी बच्चे अनिवार्य सुविधाओं से वंचित : यूनिसेफ

संजीव कुमार
बीते 29 फरवरी 2012 को यूनिसेफ ने शहरी दुनिया के बच्चों को आधार बनाकर ‘द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रेन 2012: चिल्ड्रेन इन एन अरबन वर्ल्ड’ नाम से एक रिपोर्ट जारी किया। इस वर्ष यह रिपोर्ट भारत के सबसे बड़े महानगरों में से एक नई दिल्ली में जारी किया गया जहां करोड़ों बच्चे रहते हैं
यूनिसेफ ने दुनिया भर के शहरी बच्चों को आधार बनाकर एक रिपोट जारी किया है। रिपोर्ट के अनुसार, पूरी दुनिया के शहरों व नगरों में सैकड़ांे मिलियन ऐसे बच्चे हैं जो अनिवार्य सुविधाओं से वंचित हैं। यूनिसेफ के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्रों की ओर बढ़ते पलायन से शहरी जनसंख्या में 60 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। ऐसा अनुमान है कि प्रत्येक वर्ष दुनिया की शहरी आबादी में लगभग 6 करोड़ की वृद्धि हो रही है। अगर यही हाल रहा तो 2050 तक हर दस में से सात व्यक्ति शहरों में रह रहे होंगे।
रिपोर्ट जारी करते हुए भारत में यूनिसेफ की प्रतिनिधि कैरिन हॉलशॉफ ने कहा कि आज विश्व की आधी से ज्यादा आबादी शहरों में रह रही है। इसमें एक अरब से ज्यादा बच्चे हैं। 2011 की जनसंख्या के अनुसार भारत में 37.7 करोड़ लोग शहरों में रहते हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसा अनुमान है कि 2026 तक भारत में 53.5 करोड़ लोग शहरों में रहने लगेंगे। ऐसे में यह हमलोगों पर निर्भर है कि हम यह सुनिश्चित करें कि शहर अपने वादे के मुताबिक बना रहेगा। सभी बच्चों के लिए एक समान अवसर और सम्मान का जीवन मिलेगा। वहीं यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक एंथोनी लेक ने कहा कि शहरीकरण जीवन की वास्तविकता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए हमें बच्चों को बेहतर सुविधा मुहैया कराने जाने की जरुरत है। इस अवसर पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. शांता सिन्हा, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव सुधीर कुमार एवं टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के निदेशक डॉ. परसुरामन भी उपस्थित थे।
कहने की आवश्यकता नहीं है कि दुनिया भर के शहरों में बच्चे भी उसी अनुपात से बढ़ रहे हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार शहरी बचपना बताता है कि उन्हें कई तरह की असमानताओं मसलन अमीरी बनाम गरीबी या फिर सामाजिक गतिशीलता के लिए जरूरी अवसर बनाम अस्तित्व के संकट से गुजरना पड़ रहा है। इस रिपोर्ट से हमारे सामने आज जो सच्चाई उजागर हुई है वह दुनिया भर के शहरों में बढ़ रहे बच्चों की चुनौतियों के बारे में बताती है। इन चुनौतियों में आधारभूत सूविधाओं का असमान वितरण, कुषोषण की बढ़ती दर, पांच वर्ष के अंदर मृत्यु के बढ़ते मामले, स्वच्छ पानी और शौचालय का अभाव, प्राकृतिक खतरों और आर्थिक कारणों से पड़ने वाले प्रभाव शामिल है। कमोबेश भारत की भी यही स्थिति है।
शहरी बच्चों को कई तरह की सुविधाएं सहज उपलब्ध होती हैं, जैसे- स्कूल में पढ़ने, चिकित्सा व खेल के मैदान की सुविधा। लेकिन उसी शहर में कुछ ऐसे इलाके भी होते हैं जहां के बच्चों के लिए ये सुविधाएं उपलब्ध नहीं होती। रिपोर्ट के अनुसार, ऐसा पूरे विश्व में देखा गया है कि बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा व अवसरों की उपलब्धता में बहुत ही असमानता है। भारत की वित्तीय नगरी मुंबई संसार के बड़े व धनी शहरों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि यहां सबसे घनी आबादी और सबसे ज्यादा संख्या में मलिन बस्तियां हैं। भारत में लगभग 50,000 मलिन बस्तियां है, और इनमें से 70 प्रतिशत बस्तियां पांच राज्यों में हैं- महाराष्ट्र (35 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (11 प्रतिशत), पश्चिम बंगाल (10 प्रतिशत), तमिलनाडु और गुजरात (7 प्रतिशत)। आवास एवं गरीबी उन्मूलन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, आज भारत में 9.7 करोड़ लोग 50 हजार से ज्यादा मलिन बस्तियों में रहते हैं।
दूसरी तरफ शहरों के कई क्षेत्रों में संस्थागत ढांचा और उपलब्ध सेवाएं शहरी विकास दर के अनुकूल नहीं है। इतना ही नहीं शहरी बच्चों की बुनियादी जरुरतें भी पूरी नहीं हो पाती। गरीबी में रह रहे परिवारों को अक्सर निम्नस्तरीय सेवाएं दी जाती हैं। शहरी समुदाय के गरीब बच्चों को बुनियादी चीजों से भी वंचित होना पड़ता है और जब शहरी लोगों के सांख्यिकी पर आधारित आंकडे़ तैयार किए जाते हैं तो गरीब और अमीर बच्चों को एक ही पैमाने पर रखा जाता है। इन आंकड़ों के आधार पर जब कोई शहरी नीतियां बनती हैं और स्रोतों का आवंटन होता है तो सबसे ज्यादा उन्हीं गरीब लोगों और उनके बच्चे की जरूरतों को ही नजरअंदाज किया जाता है।
इसलिए ऐसी नीतियां बनाई जाएं जिसमें ज्यादा असुविधाग्रस्त, जरुरतमंद बच्चों को चाहे वे कहीं भी रहते हों, प्राथमिकता मिले, तभी बच्चों में समानता लाया जा सकता है। यूनिसेफ की प्रतिनिधि कैरिन हॉलशॉफ ने यूनिसेफ की तरफ से भारत सरकार से आग्रह किया कि शहरी बच्चों को शहरी योजनाओं के केंद्र में रखा जाए और बेहतर सुविधाओं के विस्तार के दायरे में सभी बच्चों को लाया जाए। तभी हम शहरी एजेंडे में बाल अधिकार को सुनिश्चित कर सकेंगे। इस कार्य को बेहतर तरीके से करने के लिए हमें शहरी क्षेत्रों में रह रहे बच्चों के बीच गरीबी के स्तर और असमानताओं की पहचान करनी होगी तभी इसे दूर किया जा सकता है। वहीं हमलोगों के सामने यह चुनौती है कि हम शहरों को बच्चों के अनुकूल बनाएं जिसमें सभी बच्चों को समान अवसर व सम्मान मिल सके।
(यह रिपोर्ट प्रथम प्रवक्ता के 1 अप्रैल के अंक में छपी हुई है।)

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

बिहार विधानसभा














जातियों के आधार पर बिहार विधानसभा

जातियां 1990 1995 2000 2005 2010
यादव 63 86 64
54 39
कोईरी 12 13 12 16 21
कुर्मी 18 27 22 22 19
बनिया 18 18 12 16 13
अ.पि.जा. 06 16 11 19 17
जोड़ 117 160 121
127 109

ब्राह्मण 27 09 08 10 16
भूमिहार 34 18 19 23 26
राजपूत 41 22 26 23 31
कायस्थ 03 07 03 03 03
जोड़ 105 56 56 59 76
अनुसूचित जाति/ जनजाति (आरक्षित) 39
मुस्लिम 19

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

क्या गांधी भी लोकतंत्र के लिए खतरा?



संजीव कुमार
हमारे माननीय प्रधानमंत्री अन्ना के आंदोलन को लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहे हैं। मैं प्रधानमंत्री से पूछना चाहता हूं कि क्या शांतिपूर्वक धरना या अनशन लोकतंत्र के लिए खतरा है? अगर अन्ना और अन्ना का आंदोलन लोकतंत्र के लिए खतरा है तो उससे पहले लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा महात्मा गांधी हैं। वैसे सत्याग्रह (धरना-प्रदर्शन और अनशन) तो भारत के खून में रचा-बसा है। लेकिन जहां तक मैं जानता और समझता हूं भारत में धरना-प्रदर्शन और अनशन को लोकप्रिय बनाने का काम महात्मा गांधी का ही था। भारत के इतिहास में सत्याग्रह के अंतर्गत धरना-प्रदर्शन और अनशन का जिक्र सन् 1812 से ही है। इतिहासकार धर्मपाल जी ने इसका उल्लेख अपने पुस्तकों में किया है। घबराइए मत, मैं यहां आपके सामने अपना इतिहास ज्ञान नहीं बघारना नहीं चाहता। और ना ही मैं विषय से विषयांतर होना नहीं चाहता। मैं यहां प्रधानमंत्री को दो-चार बातें बताना चाहता हूं।
प्रधानमंत्री जी, अगर अन्ना का रास्ता सही नहीं है तो कहीं न कहीं आप महात्मा गांधी के रास्तों को भी गलत बता रहे हैं। कहने का अर्थ यह है कि डॉ. मनमोहन सिंह महात्मा गांधी की आत्मा पर भी प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं! आज अगर हम आजाद हैं तो उसमें गांधी जी के सत्याग्रह का बहुत बड़ा योगदान है। हमने यदि अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की जंग जीती है उसमें गांधी के धरना-प्रदर्शन और अनशन का बहुत अहम रोल है। इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। लेकिन हमारे प्रधानमंत्री को यह तरीका लोकतंत्र के खिलाफ लगता है। और हमारे प्रधानमंत्री नागरिकों को संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार छीनकर अपने को लोकतंत्र का पोषक बता रहे हैं। क्या वे लोगों का मौलिक अधिकार छीनकर लोकतंत्र और संविधान का गला नहीं घोंट रहे? धरना-प्रदर्शन और अनशन जैसे हथियार गांधी के सत्याग्रह के लिए साधन था, वैसे ही अन्ना के लिए भी यह साधन है। गांधी जी साध्य के लिए साधन की पवित्रता पर बल देते थे। अन्ना भी साधन की पवित्रता पर बल देते हैं। यही वजह है कि वे हमेशा शांतिपूर्वक धरना-प्रदर्शन और अनशन की वकालत करते हैं। अन्ना हजारे के आह्वान पर अबतक हुए धरने-प्रदर्शन में कहीं भी किसी तरह की हिंसा नहीं हुई है। यह इस बात का प्रमाण है कि वे साध्य की पूर्ति के लिए साधन में हिंसा का प्रयोग ठीक नहीं समझते।
दूसरी तरफ हमारे ईमानदार प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह लाल किले के प्राचीर से कहते हैं कि अनशन से भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा। तो कृपा करके प्रधानमंत्री हीं बताएं कि भ्रष्टाचार कैसे मिटेगा? वे तो यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार के पास कोई जादू की झड़ी नहीं है।
आखिर हमारे बेबस प्रधानमंत्री कर भी क्या सकते हैं? अब तक के अपने कार्यकाल में वे भ्रष्ट मंत्रियांे के ‘सरदार’ ही साबित हुए हैं। उनके मंत्रिमंडल के अधिकतर मंत्री भ्रष्टाचार के दलदल में धंसे हुए हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें इस बात (भ्रष्टाचार) की खबर नहीं। उन्हें खबर है लेकिन वे इसे जानबूझकर अनदेखा कर रहे हैं। सीएजी और पीएसी की रिपोर्ट भी इस बात की तस्दीक करती है कि इसके बारे में प्रधानमंत्री को पता था। लेकिन वे इसे राजनीति की मजबूरी बता रहे हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इतने पर भी भ्रष्ट मंत्रियों के ईमानदार प्रधानमंत्री अपने पद पर बने हुए हैं। यह भ्रष्टाचार उन्हें लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं दिखता लेकिन यदि कोई (अन्ना हजारे) भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए बनने वाले कानून (जनलोकपाल) के लिए शांतिपूर्वक अनशन करना चाहता है तो उन्हें इससे लोकतंत्र पर खतरा दिखता है।
प्रधानमंत्री कहते हैं कि अन्ना हजारे ने जो रास्ता अपनाया है उससे संसदीय लोकतंत्र को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। लेकिन मैं प्रधानमंत्री को यह कहना चाहता हूं कि हमारा संसदीय लोकतंत्र दुनिया का सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र है। इस तंत्र की जड़ें लोक में काफी गहरी हैं। धरना-प्रदर्शन और अनशन से लोकतंत्र को शक्ति मिलती है। भारत जैसे देश में शांतिपूर्वक धरने-प्रदर्शन और अनशन से लोकतंत्र को नई मजबूती मिलती है। अगर धरना-प्रदर्शन पुलिस के बताए नियम-कायदे से होगा तब वह लोकतंत्र नहीं तानाशाही होगी। मैं प्रधानमंत्री जी से पूछना चाहता हूं कि जब सरकार लोक की आवाज दबाने के लिए तंत्र (पुलिस-प्रशासन) का उपयोग करती है तो क्या यह लोकतंत्र की हत्या नहीं? क्या यह रास्ता लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं?

शुक्रवार, 5 जून 2009

जहां बसता है गांधी का भारत



हिवरे बाजार, न केवल गांधी के सपने को साकार करता है बल्कि घने अंधेरे में रोशनी की किरण भी दिखाता है। क्या वह दिन आएगा जब देश के सात लाख गांवों में हिवरे बाजार की तरह अपना ग्राम स्वराज होगा?
एक ऐसा गांव जिसपर व्यापक मंदी के इस दौर में का कोई असर नहीं है। एक ऐसा गांव जहां से अब कोई रोजगार के लिए पलायन नहीं करता। एक ऐसा गांव जहां पर शिक्षक स्कूल से गायब नहीं होते। एक ऐसा गांव जहां पर आंगनवाड़ी रोज खुलती है। एक ऐसा गांव जहां राशन की दुकान ग्राम सभा के निर्देशानुसार संचालित होती है। एक ऐसा गांव जहां की सड़कों पर गंदगी नहीं होती है। एक ऐसा गांव जिसे जल संरक्षण के लिए 2007 का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। इस गांव की सत्ता दिल्ली या बंबई में बैठी कोई सरकार नहीं बल्कि उसी गांव के लोगों द्वारा संचालित होती है। यह किसी यूटोपिया की बात नहीं है न ही कोई सपना है। यह सब साकार रूप ले चुका है, महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के गांव हिवरे बाजार में। दूसरे शब्दों में कहें तो हिवरे बाजार ग्राम स्वराज का प्रतिनिधि गांव तथा गांधी के सपनों का भारत है।
ऐसा नहीं है कि यह गांव हमेशा से ऐसा ही था। आज से 20 वर्ष पहले तक यह एक उजाड़ गांव था। न रोजगार का कोई साधन था न ही खेती के लिए उपजाऊ जमीन थी। इसलिए गांव में र्कोई रहना नहीं चाहता था। लेकिन 1989 में हिवरे बाजार के ही 30-40 पढ़े-लिखे नौजवानों ने यह बीड़ा उठाया कि क्यों न अपने गांव को संवारा जाए। पहले इस बारे में उन लोगों ने गांववालों से बातचीत की, तो कल के छोकरे कहकर बात को सिरे से नकार दिया गया। लेकिन युवकों ने हिम्मत न हारी और अपनी बात टिके रहे। फिर गांव वालों ने भी उनकी बातों को गंभीरता से लिया और 9 अगस्त,1989 को नवयुवकों को एक वर्ष के लिए गांव की सत्ता सौंपी गई। सत्ता मिली तो नवयुवकों ने अपनी कमान सौंपी पोपट राव पवार को। गौरतलब है कि पोपट राव पवार उस समय महाराष्ट्र की ओर से प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेलते थे।
नवयुवकों ने इस एक वर्ष को अवसर के रूप में देखा। गांव में पहली ग्रामसभा की गई और प्राथमिकताएं तय की गर्इं। बिजली, पानी के बाद बात शिक्षा की आई क्योंकि गांव में शिक्षा की स्थिति बहुत ही खराब थी। इतना ही नहीं विद्यालय के शिक्षक छात्रों से शराब मंगवाकर पीते थे। न तो खेल का मैदान था और न ही छात्रों के बैठने की व्यवस्था। ग्रामसभा में सबसे पहले युवकों ने गांववालों से अपील की कि वे अपनी बंजर पड़ी जमीन को विद्यालय के लिए दान में दें। पहले सिर्फ दो ही परिवार जमीन देने के लिए तैयार हुए लेकिन बाद कई लोग आगे आ गए। विद्यालय में एक अतिरिक्त कमरे के निर्माण के लिए सरकार से स्वीकृत 60,000 रुपए की राशि आई। गांववालों के श्रमदान और राशि के उचित नियोजन की बदौलत विद्यालय में दो कमरों का निर्माण किया गया। युवकों का यह कार्य गांववालों में विश्वास भरने के लिए काफी था।
एक वर्ष की तय समय सीमा खत्म हुई। नवयुवकों के कार्यों की समीक्षा हुई। गांववालों ने अब इन नवयुवकों को पांच वर्षों के लिए गांव की सत्ता सौंपने का निश्चय किया। अब पोपट राव पवार के कुशल नेतृत्व में युवकों ने गांव की आधारभूमि तैयार करना शुरू किया । गांव में खेतीबारी की व्यवस्था ठीक नहीं थी और न ही रोजगार की। जिसके चलते प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय 800 रुपए थी। गांव में जिन लोगों के पास जमीन थी, वे भी केवल एक ही फसल उगा पाते थे क्योंकि सिंचाई के लिए पानी का नितांत अभाव था। गांव में कुल मिलाकर 400 मि.मी. ही वर्षा होती थी। पोपट राव का कहना है कि हमलोगों ने सामूहिक रूप से इस विषय पर सोचना शुरू किया। पहले गांववाले वन विभाग द्वारा लगाए पौधों को काट कर अपने घर ले जाते थे। लेकिन जब ग्रामसभा ने तय किया कि जल, जंगल और जमीन के काम किए जाएंगे तो गांववालों ने 10 लाख पेड़ लगाए, जिसमें हमें 99 फीसदी सफलता प्राप्त हुई। अब इस जंगल में जाने के लिए वन विभाग को ग्रामसभा की अनुमति लेनी पड़ती है। पोपट राव के अनुसार 'शुरू में ग्रामसभा के कई निर्णयों का बहुत विरोध हुआ। लेकिन हमने जोर देकर कहा कि गांव के हित में यह निर्णय ठीक होगा और इसके दूरगामी परिणाम सामने आएंगे। जैसे कि टयूबवेलकृका कृषि में उपयोग नहीं किया जाएगा और ज्यादा पानी वाली फसलें नहीं लगाई जाएंगी। गन्ना केवल आधे एकड़ में ही लगाया जाएगा, जिसका हरे चारे के रूप में उपयोग किया जा सकता है। हम सबने मिलकर जलग्रहण के क्षेत्र में काम करनाष्शुरू किया। कुछ सरकारी राशि और कुछ श्रमदान। इसके परिणामस्वरूप तीन चार वर्षों में वॉटरष्शेड ने अपना असर दिखानाष्शुरू किया। गांव का भू-जल स्तर बढ़ा और मिट्टी में नमी बढ़ने लगी। लोग अब दूसरी और तीसरी फसल भी उगा रहे हैं। अब यहां सब्जी भी उगाई जाती है। इतना ही नहीं भूमिहीनों को गांव में ही काम मिलने लगा है और लोगों का पलायन भी बंद हो गया है।' गांव की ही मजदूर ताराबाई मारुति कहती है कि 'पहले हमलोग मजदूरी करने दूसरे गांव जाते थे। आज हमारे पास 16-17 गायें हैं और हम 250-300 लीटर दूध प्रतिदिन बेचते हैं। कुल मिलाकर पूरे गांव से लगभग 5000 लीटर दूध प्रतिदिन बेचा जाता है। आज गांव की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 800 रुपए से बढ़कर 28000 रुपए हो गई है। यानी पांच व्यक्तियों के परिवार की वार्षिक औसत आय 1.25 लाख रुपए है।
पूरे देश में आंगनवाड़ियों का जो हाल है, वह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन हिवरे बाजार की आंगनवाड़ी लगभग आधे एकड़ में फैली है। आंगनवाड़ी की दीवारें बोलती प्रतीत होती हैं। इसके आंगन में फिसल पट्टी लगी है। पर्याप्त खेल-खिलौने हैं। प्रत्येक बच्चे के लिए पोषाहार हेतु अलग-अलग बर्तन व स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था है। बच्चों का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण होता है। बच्चे कुपोषित नहीं हैं। गांववाले जानते हैं कि बच्चोें का मानसिक औरष्शारीरिक विकास 6 वर्ष की उम्र में ही होता है, इसलिए उनका मानना है कि आंगनवाड़ी बेहतर होनी चाहिए। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ईराबाई मारुति का कहना है कि जब इन बच्चों की जिम्मेवारी मेरे उपर है तो फिर मैं अपनी जिम्मेदारी से क्यों कतराऊं। अगर मैं कुछ भी गड़बड़ करती हूं तो मुझे ग्रामसभा में जवाब देना होता है। साथ ही वह बड़े गर्व से कहती है कि मेरी आंगनवाड़ी को केंद्र सरकार से सर्वश्रेष्ठ आंगनवाड़ी का पुरस्कार मिला है।
पोपट राव बताते हैं कि हमारे गांव में पहले से ही दो आंगनवाड़ी थी और ऊपर से तीसरी आंगनवाड़ी बनाने का आर्डर आया। हम लोगों ने ग्रामसभा में विचार किया कि हमारे यहां बच्चों कीे संख्या उतनी नहीं है कि तीसरी आंगनवाड़ी होनी चाहिए। फिर नए आंगनवाड़ी के लिए और अधिक संसाधन भी चाहिए। इसलिए हमने शासन को पत्र लिख कर तीसरी आंगनवाड़ीके प्रस्ताव को वापस लौटा दिया। इतना ही नहीं पहले बच्चों को पांचवीं के बाद से ही बाहर जाना पड़ता था, जिससे अधिकांश लड़कियां नहीं पढ़ पाती थीं। अब स्कूल हायर सेकेंड्री तक हो गया है। विद्यालय का समयष्शासन नहीं बल्कि ग्रामसभा तय करती है । विद्यालय में दोपहर का भोजन नियमित रूप से दिया जाता है। शिक्षिका शोभा थांगे का कहना है कि हम लोग ग्रीष्मकालीन अवकाश मेंभभी पढ़ाने आते हैं । यहां पढ़ाई किसी अच्छे प्राइवेट स्कूल से बेहतर होती है। यही कारण है कि आज हिवरे बाजार के ंविद्यालय में आसपास के गांव और शहरों से लगभग 40 प्रतिशत छात्र-छात्राएं पढ़ने आते हैं। गांव के सरपंच पोपट राव के अनुसार हमारे यहां शिक्षकों का ग्रामसभा में आना जरूरी है लेकिन चुनाव डयूटी में जाने की आवश्यकता नहीं है। हिवरे बाजार गांव में एएनएम आती नहीं है बल्कि यहीं रहती हैं। गांव के हर बच्चे का समय पर टीकाकरण होता है। प्रत्येक गर्भवती महिला को आयरन की गोलियां मुफ्त मिलती हैं।
गांव में राशन ग्रामसभा के निर्देशानुसार सबसे पहले प्रत्येक कार्डधारी को दिया जाता है। यदि उसके बाद भी राशन बच जाता है तो ग्रामसभा तय करती है कि इसका क्या होगा। राशन दुकान संचालक आबादास थांगे बहुत ही बेबाक तरीके से कहते हैं कि मुझे फूड इंस्पेक्टर को रिश्वत नहीं देनी होती है। पोपट राव कहते हैं कि अब बाहरी लोगों की नजर हमारी जमीन पर है। इसलिए हमने नियम बनाया कि हमारी जमीन गांव से बाहर के किसी व्यक्ति को नहीं बेची जाएगी। क्योंकि इससे गरीब हमेशा गरीब रहेगा और अमीर और अमीर हो जाएगा। इस गांव की खास बात यह है कि यहां एकमात्र मुसलिम परिवार के लिए भी मसजिद है, जिसे ग्रामसभा ने ही बनवाया है। सारे फैसले ग्राम संसद द्वारा लिए जाते हैं। इस ग्राम संसद की बनावट भी दिल्ली के संसद भवन की तरह है। सूचना के अधिकार जैसे कानूनों की यहां जरूरत ही महसूस नहीं होती। यहां पंचायत भवन में प्रतिमाह पैसों का पूरा लेखा-जोखा लिखकर टांग दिया जाता है। इतना ही नहीं साल के अंत में ग्रामसभा का पूरा ब्योरा गांववालों के सामने और बाहरी लोगों को बुलाकर बताया जाता है।
एक समय था जब इस गांव के नवयुवक यह बताने से डरते थे कि हम हिवरे बाजार के निवासी हैं। आज इस गांव के लोग गर्व से कहते हैं कि हम हिवरे बाजार के निवासी हैं। बाला साहेब रमेश ने तो अपने नाम के आगे 'हिवरे बाजार' लगा लिया है। आज इस गांव में न कोई शराब पीता है और ना ही यहां शराब बिकती है। हिवरे बाजार, न केवल गांधी के सपने को साकार करता है बल्कि घने अंधेरे में रोशनी की किरण भी दिखाता है। क्या वह दिन आयेगा जब देश के सात लाख गांवों में हिवरे बाजार की तरह अपना ग्राम स्वराज होगा?

बुधवार, 3 जून 2009

नहीं चला सिख फैक्टर

नहीं चला सिख फैक्टर
संजीव कुमार
इस बात में कोई दम नहीं है कि पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में कांग्रेस की जीत में सिख मतदाताओं का हाथ है। और न ही यह कहना सही होगा कि मनमोहन सिंह सिख मतदाताओं को रिझाने में कामयाब हुए हैं
लोकसभा चुनाव में जिस तरह कांग्रेस पार्टी को अकेले 206 सीटों पर विजय मिली है, उसे कुछ लोग राहुल का जादू तो कुछ लोग प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का चमत्कार मान रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक शायद पिछले विधानसभा चुनावोेंं में राहुल के रोड शो के बावजूद कांग्रेस पार्टी की हार के सिलसिले को भूल गए हैं। अब जहां तक बात प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के चमत्कार की है, तो इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि मनमोहन सिंह एक स्वच्छ छवि के नेता हैं। इसलिए पूरे देश की जनता उनका आदर और सम्मान करती है। कांग्रेस पार्टी ने चुनाव से पहले जिस तरह मनमोहन सिंह को दुबारा प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा की, इसे निश्चय ही पार्टी और सोनिया गांधी की दूरदर्शी सोच का परिणाम कहा जा सकता है। इस घोषणा से कांग्रेस के कुछ वोट अवश्य ही बढ़े हाेंगे, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन कुछ राजनीतिक पंडितों का मानना है कि कांग्रेस पार्टी को पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सिख होने के कारण जीत मिली है। हालांकि इन राज्यों में सिख फैक्टर उतना कामयाब नहीं रहा जितना कि राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं।
पंजाब, मनमोहन सिंह का गृह राज्य है। साथ ही देश का एकमात्र सिख बहुल प्रदेश है। लेकिन प्रदेश में कांग्रेस इस तथ्य को भुनाने में विफल रही कि मनमोहन सिंह देश के पहले सिख प्रधानमंत्री हैं। प्रदेश कांग्रेस ने भी इसके बजाय चुनाव में राज्य के स्थानीय मुद्दों को ही प्राथमिकता दी। एक वरिष्ठ कांग्रेसी विधायक ने नाम न लेने की शर्त पर कहा ''इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे सिख हैं और उनकी जड़ें पंजाब में हैं लेकिन उन्होंने पंजाब में कोई राजनीति नहीं की है। यद्यपि सिख समुदाय यह मान रहा था कि कांग्रेस ने एक सिख को पहली बार देश का प्रधानमंत्री बनाया और दूसरी बार भी बनाने को इच्छुक है। इसके बावजूद सिख समुदाय के एक छोटे वर्ग ने ही इस वजह से वोट दिया।
उनके मुताबिक, 'राज्य में शिरोमणी अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी सरकार के कुशासन से जुड़े कई मुद्दे थे।' पंजाब में कांग्रेस की जीत की वजह यही है। प्रदेश के एक किसान जसवंत सिंह ने कहा कि मनमोहन सिंह एक प्रसिध्द व्यक्ति हैं। प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने अच्छा काम भी किया है, लेकिन पंजाब के लोग स्थानीय मुद्दों के बारे में सोचते हैं। अगर इनकी बात पर यकीन करें तो पंजाब में कांग्रेस की जीत और अकाली दल की हार में मनमोहन सिंह के सिख फैक्टर की जगह एंटी-इनकमबेंसी प्रमुख कारण रहा है। पंजाब में अकाली दल और भाजपा गठबंधन ने कांग्रेस के आठ सीटों की तुलना में पांच सीटें पाई हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में राज्य की 13 में से 11 सीटों पर अकाली दल-भाजपा गठबंधन का कब्जा था। गौरतलब है कि तब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। वैसे भी इस बार यह कोई नहीं मान रहा था कि अकाली दल-भाजपा गठबंधन को 11 सीटें मिलेंगी। हुआ भी वही। गठबंधन को यहां 6 सीटों का नुकसान हुआ है। गठबंधन के हार का एक अन्य कारण यह भी रहा कि अकाली दल और भाजपा गठबंधन ने इस लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारों का चयन ठीक तरीके से नहीं किया। इसके अलावा अकाली दल और भाजपा की आपसी कलह भी इस पराजय का कारण बनी। अगर अकाली दल और भाजपा आपसी मनमुटाव को भूलकर एकजुटता से चुनाव लड़ते और सही उम्मीदवारों का चयन करते तो चुनाव परिणाम उनके पक्ष में भी जा सकते थे। इसके अलावा 84 के सिख दंगे के आरोपी कांग्रेस नेता जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को टिकट दिए जाने और सीबीआई की ओर से उन्हें क्लीन चिट देने पर सिख समुदाय के बीच उभरे आक्रोश का भी अकाली दल और भाजपा फायदा नहीं उठा सके। हालांकि कांग्रेस पार्टी ने सिख समुदाय के विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए इन दोनों नेताओं का टिकट वापस ले लिया था।
हरियाणा में कांग्रेस की विजय का प्रमुख कारण भूपेंद्र सिंह हुड्डा द्वारा किया गया विकास कार्य रहा। इसके अलावा उनकी विनम्रता और स्वच्छ छवि ओमप्रकाश चौटाला की इनेलो और भाजपा पर भारी पड़ी। वैसे हरियाण्ाा प्रदेश कांग्रेस के विधायकों और मंत्रियों में भी आपसी फूट थी, लेकिन इनेलो और भाजपा इसका कोई फायदा नहीं उठा सके। साथ ही यहां भाजपा-इनेलो गठबंधन एंटी-इनकमबेंसी फैक्टर को भी अपने पक्ष में नहीं भुना सका। कांग्रेस को वैसे तो नौ सीटें मिलीं लेकिन हुड्डा अंबाला, भिवानी, महेंद्रगढ़, गुड़गांव और फरीदाबाद की पांच संसदीय सीटों से अपने विधायकों-मंत्रियों के भितरघात के बावजूद पार्टी उम्मीदवारों को जिताने में कामयाब रहे।
हरियाणा जाट बहुल राज्य है। यहां सिख मतदाता दो प्रतिशत के आस-पास हैं। यह संख्या चुनाव में कुछ ज्यादा उलट-फेर नहीं कर सकती। फिर भी सिख समुदाय का एक वर्ग मनमोहन सिंह के नाम पर कांग्रेस के पक्ष में गया इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता। लोकसभा चुनाव के बाबत हरियाणा प्रदेश कांग्रेस के एक विधायक का कहना था कि हरियाणा में कांग्रेस की जीत विकास की जीत है। दस में से नौ सीटों पर कांग्रेस को जीत दिलाकर जनता ने मुख्यमंत्री हुड्डा और प्रदेश कांग्रेस के हाथ मजबूत किए हैं। एक सरकारी कर्मचारी सुरेश सिंह का भी कहना है कि हरियाणा में कांग्रेस की जीत हुड्डा द्वारा किए गए विकास कार्यों की जीत है।
जहां तक दिल्ली में कांग्रेस की जीत का सवाल है तो यहां पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में मिली विजय से कार्यकर्ताओं के मनोबल ऊंचे थे। दूसरे दिल्ली के अधिकतर मतदाता के लिए असली मुद्दा विकास का था। इस मापदंड पर कांग्रेस पार्टी लोगों को खरी उतरती दी। इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने विकास और निर्माण के मुद्दे पर ही वोट मांगा था। दूसरे चुनाव से पहले मनमोहन सिंह को दुबारा प्रधानमंत्री बनाने का भी वायदा किया गया था। इन दोनों ही बातों से दिल्ली की मतदाता को अपना निर्णय लेने में सुविधा हुई।
दूसरी तरफ भाजपा ने विधानसभा चुनाव के बाद यह जानते हुए कि पांच महीने बाद लोकसभा चुनाव होने हैं, डॉ. हर्षवर्धन को हटाकर ओ.पी. कोहली को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। हर्षवर्धन को हटाने से प्रदेश कार्यकर्ताओं में गलत संदेश गया। वहीं ओ.पी. कोहली को प्रदेश में भाजपा का हाथ मजबूत करने के लिए अभी वक्त चाहिए था। जो इस चुनाव में उनके पास नहीं था। विजय कुमार मल्होत्रा को केंद्र से हटाकर राज्य में लाने का भी भाजपा को कोई विशेष फायदा नहीं हुआ। अगर इस लोकसभा चुनाव में विजय कुमार मल्होत्रा नई दिल्ली से चुनाव लड़ते तो कम से कम एक सीट तो भाजपा को मिल ही सकती थी। वहीं साहिब सिंह वर्मा के पुत्र प्रवेश वर्मा को न विधानसभा चुनाव न ही लोकसभा चुनाव में टिकट दिए जाने से जाट मतदाता भी भाजपा के विरोध में चला गया। इसके अलावा भाजपा द्वारा सही उम्मीदवारों का चयन न कर पाना भी उसकी हार का कारण बना। दिल्ली में पूर्वांचली मतदाताओं की संख्या बढ़ी है। कांग्रेस पार्टी ने इस बात का ध्यान रखते हुए पूर्वांचल के महाबल मिश्रा को टिकट दिया था। लेकिन भाजपा ने पूर्वांचलियों को टिकट नहीं दिया। कांग्रेस पार्टी का विधानसभा चुनाव में जहां जीत का अंतर काफी कम था, भाजपा की इन कारगुजारियों के चलते उसका इस लोकसभा चुनाव में जीत का अंतर अधिक हो गया।
जहां तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सिख वोटरों के संबंध का सवाल है तो अधिकतर सिख मतदाता चुनाव से ठीक पहले सीबीआई द्वारा 84 के सिख विरोधी दंगे के आरोपी जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को क्लीन चिट दिए जाने से नाराज थे। लेकिन दिल्ली प्रदेश भाजपा इसको ठीक से भुना नहीं सकी। परिसीमन ने दिल्ली की सातों सीटों का भूगोल भी बदला है जिस कारण सातों सीटों चांदनी चौक, उत्तरी-पूर्वी दिल्ली, पूर्वी दिल्ली, नई दिल्ली, उत्तरी-पश्चिमी दिल्ली, पश्चिमी दिल्ली और दक्षिणी दिल्ली में सिख मतदाताओं का प्रतिशत क्रमश: 3.94 प्रतिशत, 1.20 प्रतिशत, 3 प्रतिशत, 4 प्रतिशत, 2 प्रतिशत, 9 प्रतिशत और 2 प्रतिशत हो गया है। सिर्फ पश्चिमी दिल्ली ही एक ऐसा संसदीय क्षेत्र है, जहां सिख मतदाताओं का महत्व है। लेकिन इसमें से कितने मत मनमोहन सिंह के कारण कांग्रेस के पाले में गए हाेंगे कहना मुश्किल है।
लेकिन जो लोग यह मानते हैं कि कांग्रेस की इस विजय में मनमोहन सिंह सूत्रधार बने हैं उनके लिए पंजाब के तथ्य काफी अहम हैं क्योंकि यहां वे सभी कांग्रेसी उम्मीदवार हार गए जिन्होंने अपने क्षेत्र में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सभा रखी थी। यह महज एक संयोग भी हो सकता है लेकिन एक तथ्य तो है ही। इस बात में कोई दम नहीं है कि पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में कांग्रेस की जीत में सिख मतदाताओं का हाथ है। और न ही यह कहना सही होगा कि मनमोहन सिंह सिख मतदाताओं को रिझाने में कामयाब हुए हैं।