शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

7 साल में चले ढाई कोस!

संजीव कुमार

बीते 24 नवंबर को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी सरकार की दूसरे कार्यकाल के दो साल पूरा होने पर 96 पृष्ठों का एक रिपोर्ट कार्ड पेश किया। इस रिपोर्ट कार्ड में उनके शासन की उपलब्धि व चुनौतियां दर्ज हैं। इस मौके पर उन्होंने ‘मुख्यमंत्री ग्राम संपर्क योजना’ का एलान किया तो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की भी मांग की। उनके अनुसार बेशक बिहार आगे बढ़ रहा है लेकिन इस गति से भी राष्ट्रीय औसत के करीब पहुंचने में 25 वर्ष लग जाएगा। इतना लंबा इंतजार कौन करेगा?

 मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य के ढाई सौ की आबादी वाले बसावट को पक्की सड़क से जोड़ने के लिए ‘मुख्यमंत्री ग्राम संपर्क योजना’ एलान किया है। वे अपनी सरकार की दूसरी पारी के दो साल पूरा पर रिपोर्ट कार्ड पेश कर रहे थे। वहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टालरेंस’ की बात दोहराते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ हमारी जंग जारी रहेगी। उनका दावा है कि ‘गुणवत्ता के साथ हर मोर्चे पर काम हो रहा है। और इसकी लगातार मॉनिटरिंग भी हो रही है।’
इस मौके पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए एक बड़ा ही राजनीतिक बयान दिया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि बिहार में अगर बिजली की स्थिति नहीं सुधरी तो वे लोगों के पास वोट मांगने नहीं जाएंगे। नीतीश कुमार का यह बयान सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह बयान हकीकत से कोसों दूर है। क्योंकि कोई राजनेता यह कहे कि वह अपने वादे के अनुसार काम नहीं कर पाया तो वोट मांगने नहीं जाएगा। कम से कम भारतीय राजनीति के अबतक के इतिहास में तो ऐसा देखने को नहीं मिला है। ऐसे में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह बयान कोरी लफ्फाजी ही लगता है।
गौरतलब है कि बिहार पर सात साल शासन करने वाले नीतीश कुमार को अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं है। लेकिन अपनी ही सरकार की वार्षिक रिपोर्ट पेश करते हुए उन्होंने अपने ही शासन की विफलताएं गिनाई। नीतीश कुमार ने आत्मालोचना के स्वर में कहा कि ‘‘जहांतक इंफ्रास्ट्रक्चर की बात है तो सड़कों वगैरह में कुछ सुधार जरूर हुआ है। हालांकि इस क्षेत्र में भी उतना सुधार नहीं हुआ है जितना कि होना चाहिए।’’ बिहार की जनता ने जिस तरह नीतीश कुमार को भारी बहुमत से सत्ता में पहुंचाया और हाल ही में नीतीश सरकार ने अपने शासन का सातवां साल पूरा किया है लेकिन अभी तक उन्होंने जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप काम नहीं किया है। यदि उन्हें लगता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर (सड़क और बिजली) की वजह से बिहार का विकास रुका हुआ है, तो सवाल यह उठता है कि उन्होंने इन सात सालों में क्या किया?
जहां तक इंफ्रास्ट्रक्चर की बात है तो सड़कों वगैरह में काफी सुधार हुआ है। लेकिन आज भी छोटे बसावट (टोले) पगडंडी और बांस के चचरी के युग में जी रहे हैं। यहां तक कि राजधानी पटना में बांस और लकड़ी के पुल बने हैं जो कुछ लोगों के चढ़ने पर ही ध्वस्त हो जाते हैं और बड़ी दुर्घटना हो जाती है। वहीं बिजली की बात करें तो कांटी और कलगाव के पॉवर स्टेशनों का सुधार हुआ है जिससे बिजली उत्पादन कुछ बढ़ा है। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि बिहार की एक बड़ी आबादी आज भी लालटेन और ढिबरी युग में जीने को मजबूर है।
कमोबेस यही हालत बिहार में कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों की भी है। हलांकि मुख्यमंत्री ने रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए कृषि रोड मैप, शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, उद्योग सहित विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे काम का हवाला देते हुए कहा कि अब बिहार के नाम की चर्चा देश-दुनिया में है। बिहार के विकास मॉडल की सब तारीफ कर रहे हैं। बिहार, अब शोध का विषय बन गया है। यह अलग बात है कि आज भी कृषि की हालत नहीं सुधरी है और छोटे किसान व मजदूर रोजगार के लिए पलायन कर रहे हैं। हां, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रवासी मजदूर जो बिहार से बाहर जाते थे, उनकी संख्या में कमी जरूर आई है। लेकिन इसके पीछे सबसे बड़ी वजह महात्मा गांधी ग्रामीण विकास योजना (मनरेगा) में लोगों को अपने ही राज्य में काम मिलना है। और यह केंद्र सरकार की योजना है।
पत्रकारों के एक सवाल बिहार की गरीबी के बाबत उनका कहना था कि गरीबी के आंकड़े जुटाने के फार्मूले में परिवर्तन की जरूरत है। जबतक उनकी संख्या का सही आकलन नहीं होगा, लोग गरीबी रेखा से ऊपर कैसे उठेंगे। लेकिन बिहार की समस्याओं का समाधान तब तक नहीं होगा जब तक बिहार में बड़े पैमाने पर भूमि सुधार को लागू नहीं किया जाएगा। गौरतलब है कि इसके लिए सरकार ने डी. बंद्योपाध्याय कमेटी बनाई थी, उस कमेटी ने सरकार को एक रिपोर्ट भी दी है जिसे सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल रखा है। इस मामले में सरकार को राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने की जरूरत है।
वहीं उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि न्याय के साथ समेकित व समावेशी विकास हमारी प्राथमिकता है। इस लक्ष्य को हासिल करने में जो भी चुनौतियां सामने आएंगी, हम उसे अवसर में बदलेंगे। हम किसी को शिकायत करने का मौका नहीं देंगे। नई पीढ़ी के लिए कोई तगादा नहीं छोड़ना चाहते हैं। उनके अनुसार बिहार, विकास के मामले में भी देश को नई राह दिखा रहा है।
बहरहाल, नीतीश कुमार अपनी सातवीं रिपोर्ट कार्ड में अपने सरकार की उपलब्धियां गिनाकर खुद ही अपनी पीठ थपथपा रहे हों, लेकिन बिहार के हर समुदाय के लोगों को उनसे बड़ी अपेक्षाएं थीं, लेकिन सरकार के अबतक के कामकाज से सभी लोगों को बेहद निराशा हुई है। नीतीश सरकार के कामकाज को देखकर यही कहा जा सकता है- ‘सात साल में चले ढाई कोस!’

‘‘यह रिपोर्ट कार्ड बिहार की जनता के साथ धोखा है। मुख्यमंत्री कागजी घोड़े दौड़ा रहे हैं। जमीन पर कहीं बदलाव दिखाई नहीं दे रहा। जगह-जगह हो रहे विरोध प्रदर्शन से साफ है कि उन्होंने जनता का समर्थन खो दिया है। मुख्यमंत्री ने अपने दूसरे कार्यकाल में ‘सुशासन के कार्यक्रम’ नामक पुस्तिका जारी की थी। इसमें 185 संकल्पों का जिक्र था। इसमें से एक भी संकल्प अबतक पूरा नहीं हो पाया है।’’
                                          -रामविलास पासवान, लोजपा अध्यक्ष

‘‘रिपोर्ट कार्ड में फिजूल की बातें हैं। विकास व अधिकार यात्रा के नाम पर मुख्यमंत्री ने लोगों को बेवकूफ बनाने का भरपूर प्रयास किया है। जनता अब उनकी बातों को अच्छी तरह से समझने लगी है। राज्य में शिक्षा व विधि व्यवस्था चौपट हो गई है। मुख्यमंत्री को इस रिपोर्ट कार्ड में माफी मांगनी चाहिए थी कि राज्य में महिलाओं के साथ दुष्कर्म व कमजोर तबके के साथ अत्याचार हो रहा है।’’
                                             -लालू प्रसाद यादव, राजद अध्यक्ष

‘‘नीतीश सरकार का रिपोर्ट कार्ड झूठ का पुलिंदा है। पिछले सात वर्षों में बिहार में एक भी निवेश नहीं हुआ। एक मेगावाट बिजली का उत्पादन शुरू नहीं हो सका है। राज्य में अपहरण, बलात्कार, हत्या, लूट एवं डकैती की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है। बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की बात करना हास्यास्पद है। राज्य में जो विकास के कार्यक्रम चल रहे हैं, वे केंद्र प्रायोजित योजनाओं से है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार फर्जी आंकड़ा देकर जनता को दिग्भ्रमित कर रहे है।’’
                               -चौधरी महबूब अली कैसर, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष
 
                      क्या है मुख्यमंत्री ग्राम संपर्क योजना
इस योजना से मुख्यमंत्री ने राज्य के ढाई सौ की आबादी वाले बसावट (टोला) को पक्की सड़क से जोड़ने का एलान किया है। ‘मुख्यमंत्री ग्राम संपर्क योजना’ नाम के इस योजना पर 23 हजार 881 करोड़ रुपये खर्च होंगे। एक लाख 41 हजार बसावट पक्की सड़क से जुड़ेंगे। अगले पांच साल में 34 हजार 116 किलोमीटर सड़क बनेगी। इस योजना के अंतर्गत निर्माण कार्य इसी वर्ष से शुरू होगा।

परंपरा ही प्रगति का आधार

संजीव कुमार

बीते 2-3 नवंबर को साहित्य अकादेमी ने वरिष्ठ आलोचक रामविलास शर्मा की जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में एक दो दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया था। इस संगोष्ठी के चार सत्रों में विद्वानों ने रामविलास शर्मा के व्यक्तित्व व कृतित्व पर अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए।

‘‘वर्तमान हिन्दी समीक्षा का जो आज प्रगतिशील स्वरूप है उसका निर्माण रामविलास शर्मा के अथक संघर्षों से ही बना है।’’ ये बातें आलोचक शिवकुमार मिश्र ने कही। वे साहित्य अकादेमी के तत्वावधान में आयोजित रामविलास शर्मा जन्मशतवार्षिकी संगोष्ठी में उद्घाटन भाषण देते हुए ये बातें कही। आगे उन्होंने कहा कि रामविलास शर्मा ने परंपरा को प्रगति से जोड़ा और उसे प्रतिगामी तत्वों से अलग किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि परंपरा के बिना प्रगति संभव नहीं है। रामविलास जी ने अपने जीवन में जितनी चुनौतियां और विरोधों को झेला उससे ज्यादा चुनौतियां हिन्दी समाज के आगे उछाली भी। वे साहित्य, समाज, राजनीति, जाति, भाषाविज्ञान या चाहे कोई भी क्षेत्र हो वे तर्कपूर्ण ढंग से अपनी बात रखते हैं। आलोचना के क्षेत्र में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद यदि किसी का नाम लिया जा सकता है तो वे रामविलास शर्मा ही हैं। साथ ही उन्होंने इस बात पर क्षोभ प्रकट किया कि उनके तर्कों पर उदासीनता बरती गई और उनको जाने-बूझे बिना ही खारिज करने की होड़-सी लग गई। हमें उनका सामना तथ्यों और तर्कों के साथ करना होगा जो हम नहीं कर पा रहे हैं।
प्रो. अजय तिवारी ने संगोष्ठी में बीज भाषण देते हुए कहा कि रामविलास जी का इतिहास बोध तथ्यों और तर्कों से बना था। उन्होंने हमारे सामने एक वैकल्पिक इतिहास बोध प्रस्तुत किया। उनका सारा लेखन जनता के हित को आगे बढ़ाने वाले तत्वों को सामने लाने के लिए है। प्रो. तिवारी ने गांधी और रामविलास जी की तुलना करते हुए कहा कि आधुनिक हिंदी मानस के निर्माण करने वालों में पहले व्यक्ति महात्मा गांधी हैं तो दूसरे व्यक्ति रामविलास शर्मा हैं। दोनों का इतिहास बोध तथ्यों और तर्कों पर आधारित है और दोनों ने धर्म को संस्कृति से अलग करके देखा और समझा है।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए साहित्य अकादेमी के कार्यकारी अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि मैं दो लेखकों का सर्वाधिक सम्मान करता हंू और वह है हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा। इन दोनों लेखकों ने जितनी कालजयी कृतियां हिन्दी समाज को दीं और किसी ने नहीं दीं। रामविलास जी के साथ अपने एक साक्षात्कार का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वे मार्क्सवाद को परंपरा का निषेध नहीं बल्कि उसे परंपरा का विकास मानते थे। उनकी आलोचना का मुख्य तत्व साम्राज्यवाद का विरोध था। उनका जीवन ऋषि तुल्य साधक का था। वहीं उनके पुत्र विजय मोहन शर्मा ने कहा कि लेखकों के जन्मशती को कोई स्थायी रूप देने के लिए हिन्दी साहित्यकारों को आगे आना चाहिए।

‘हिन्दी आलोचना और रामविलास शर्मा’ विशयक पहले सत्र की अध्यक्षता करते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि जातीयता और साम्राज्यवाद के विरोध को हिन्दी साहित्य के भाव बोध का अभिन्न अंग बनाने का काम रामविलास शर्मा ने किया। वह केवल एक आलोचक ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय समाज की चिंताओं पर विचार करने वाले चिंतक थे। आगे उन्होंने कहा कि करुण रस की जैसी व्याख्या रामविलास शर्मा ने किया वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। साथ ही उन्होंने पहली बार इस तथ्य की महत्ता को स्थापित किया कि कोई भी रचना अपने समय और समाज से संदर्भित होती है।
वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने कहा कि रामविलास जी ऐसे आलोचक थे जिनसे असहमत होना असंभव है। उन्होंने हिन्दी समीक्षा को नया चेहरा दिया। राजेन्द्र कुमार ने शर्माजी के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि उन्होंने आलोचना शब्द को नया अर्थ विस्तार दिया है। वहीं रवि श्रीवास्तव ने कहा कि परंपरा का मूल्यांकन और जातीयता की अवधारणा उनके आलोचना के मूल में है।
संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में ‘भारतीयता की अवधारणा और हिन्दी जाति’ विषय पर रमेश कुंतल ‘मेघ’ की अध्यक्षता में रवि भूषण, कृष्णदत्त पालीवाल और अजय बिसारिया ने अपने विचार रखें।
संगोष्ठी के दूसरे दिन और तीसरे सत्र में ‘हिंदी नवजागरण का स्वरूप’ विषय पर बोलते हुए कर्मेन्दु शिशिर ने कहा कि नवजागरण का सबसे उपयुक्त माहौल अभी है। बदलने के लिए सोचना ही नवजागरण का सही समय है। आगे उन्होंने कहा कि हिंदी का नवजागरण और हिंदी क्षेत्र का नवजागरण दोनों अलग बातें हैं। साथ ही उन्होंने इतिहासकार केएम पन्निकर से सवाल पूछते हुए कहा कि अगर हिंदी प्रदेश सोया हुआ था तो यह हिंदी प्रदेश स्वतंत्रता का मुख्य केंद्र कैसे हो गया। वहीं वरिष्ठ साहित्यकार शंभुनाथ ने स्वाधीनता आंदोलन को नवजागरण का हिस्सा बताते हुए कहा कि नवजागरण ने लोक चित्त को बड़ा बनाया। रामविलास शर्मा ने किसानों की समस्याओं को उभारकर उसे नवजागरण से जोड़ा। इसी सत्र में श्रीभगवान सिंह और सत्यदेव त्रिपाठी ने भी अपने-अपने आलेख पढ़े।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए नित्यानंद तिवारी ने कहा कि लोकजागरण और नवजागरण के क्या सूत्र हो सकते हैं रामविलास जी ने हमें यह रास्ता दिखाया। उन्होंने यह बताया कि नवजागरण के केंद्र में 1857 का सिपाही विद्रोह है और इसके लिए राजनीतिक बोध आवश्यक है। साथ ही प्रो. तिवारी ने कहा कि आंदोलनों से जुड़े बिना साहित्य, जीवन और समाज का साहित्य नहीं हो सकता।
संगोष्ठी के चतुर्थ सत्र में ‘भारतीय समाज और भाषा का प्रश्न’ विषय पर बोलते हुए श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि रामविलास जी के जातीय चिंतन को भाषा से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने अपने भाषा संबंधी चिंतन से भाषायी सियासत के औपनिवेशिक मानसिकता को ध्वस्त किया था। वहीं दिलीप सिंह ने कहा कि रामविलास जी की रचना में इतिहास बोध, भूगोल, समाज और व्यक्ति आपस में गुंथे हुए हैं। इस सत्र में राजेंद्र प्रसाद पांडेय और गरिमा श्रीवास्तव ने अपने आलेख पढ़े। सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार भगवान सिंह ने कहा कि समस्या के बाद चिंतन करना रामविलास का काम था। इसलिए वे चिंतक विद्वान की श्रेणी में आते हैं।


लोकसभा चुनाव के मद्देनजर मंत्रिमंडल में फेरबदल

संजीव कुमार 

यूपीए 2 कैबिनेट की यह तीसरी और आखिरी फेरबदल आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर किया गया है। यह फेरबदल इस मायने में अलग है कि इसमें कांग्रेस ने अपने घटक दलों को कोई तवज्जो नहीं दी। वहीं कुछ नए चेहरों को मंत्रिमंडल में पहली बार शामिल किया है।  

 मनमोहन सरकार ने अपने मंत्रिमंडल में भारी फेरबदल किया है। सत्ता के गलियारों में इसकी चर्चा काफी दिनों से थी। इस बदलाव से यह साफ हो गया कि इसमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की नहीं चली।   इस फेरबल में राहुल गांधी की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही थी। यह कहा जा रहा था कि आगामी लोकसभा चुनाव से पहले इन फेरबदल से कांग्रेस पार्टी पूरे देश में राहुल गांधी को अपने नेता के रूप में प्रोजेक्ट करेगी। लेकिन मंत्रिमंडल में हुए फेरबल कुछ और ही कहानी कहता है। ऐसा लगता है कि इस मंत्रिमंडल विस्तार में सिफ दस जनपथ की चली। यानी सोनिया गांधी की चली।
हां इसमें राहुल गांधी का असर सिर्फ इतना हुआ कि उन्होंने अपने युवा साथियों की पदोन्नति करवाई। इसमें सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मनीष तिवारी और पल्लम राजू जैसे युवा नेता शामिल हैं। ऐसा लगता है कि राहुल गांधी की युवा टीम अगली पारी के लिए तैयार हो रही है। लेकिन इस फेरबदल में राहुल अपनी टीम के कुछ और साथियों को शामिल करवा पाते तो उनके लिए बेहतर होता। राहुल काफी दिनों से युवा कांग्रेस के साथ काम कर रहे हैं इसलिए उम्मीद की जा रही थी कि युवा कांग्रेस से कुछ नए चेहरों को शामिल किया जा सकता है। इनमें मीनाक्षी नटराजन, प्रदीप मांझी,  ज्योति मिर्धा आदि का नाम शामिल था लेकिन इन लोगों को इस बार मौका नहीं मिला।
इसके अलावा इस फेरबदल से एक संदेश जो साफ दिखाई देता है वह यह है कि कांग्रेस आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और पंजाब को खासा महत्व दिया है। साथ ही राजस्थान, कर्नाटक और केरल के नेताओं को भागीदारी मिली है। आंध्र प्रदेश में तेलंगाना और वाईएसआर कांग्रेस के गठन के बाद कांग्रेस की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं इसलिए यहां से 6 सांसदों को मंत्रिमंडल में जगह मिली है।
आध्र प्रदेश दक्षिण भारत का अकेला ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस की अपने दम पर सरकार है। हालांकि कांग्रेस ने चिरंजीवी की पार्टी को अपने विलय करा लिया लेकिन उनकी लोकप्रियता का कितना फायदा कांग्रेस को होगा यह तो समय ही बताएगा। एक बात साफ है कि कांग्रेस ने चिरंजीवी से विलय के समय जो वादा किया था, उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल कर उसे अब पूरा किया है।
वहीं पश्चिम बंगाल से तीन नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल कर कांग्रेस ने बंगाल में ममता बनर्जी से अलग चलने का संकेत दिया है।   यही वजह है कि ममता बनर्जी के धुर विरोधी दीपा दासमुंशी और अधीर रंजन चौधरी को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है।
इस फेरबदल में महाराष्ट्र को तरजीह नहीं दिया गया है।  विलासराव देशमुख के निधन और मुकुल वासनिक के इस्तीफे के बाद यहां से किसी भी नेता को शामिल नहीं किया जाना महाराष्ट्र की उपेक्षा है। ऐसा लगता है कि सुशील कुमार शिंदे को लोकसभा का नेता बनाकर कांग्रेस ने महाराष्ट्र का ध्यान पहले ही रख लिया है। यहां से एनसीपी के राज्यसभा सांसद तारिक अनवर को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। वहीं झारखंड से सुबोधकांत सहाय के इस्तीफे के बाद वहां से भी किसी भी नेता को शामिल नहीं किया समझ से परे है।
बहरहाल, इस मंत्रिमंडल विस्तार में कुछ लोगों का कद काफी बढ़ा है। इनमें सबसे ज्यादा महत्व सलमान खुर्शीद को मिला है। हलांकि सलमान खुर्शीद पर जिस तरह से भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, उससे उनकी छवि खराब हुई है। इसके बावजूद कांग्रेस ने उन्हें विदेश मंत्रालय का अहम विभाग सौंपा है। इससे सरकार ने सलमान खुर्शीद पर अरविंद केजरीवाल के आरोपों को सिरे से खारिज करने का संकेत दिया है। वहीं पल्लम राजू को कैबिनेट में मानव संसाधन विकास मंत्रालय का अहम पद भी आंध्रप्रदेश को अहमियत देने की वजह से मिला है। दूसरी तरफ जयपाल रेड्डी के विभाग बदला जाना कुछ पच नहीं रहा है। वहीं कुछ मंत्रियों को उनकी जिम्मेदारी से मुक्त किए जाने पर भी सवाल जरूर उठ रहे हैं।
गौरतलब है कि जिस तरह मंत्रियों से इस्तीफे लिए गए उसका कारण पार्टी में काम करना नहीं बल्कि अलग कारणों से इस्तीफा लिया गया था। इसलिए मंत्रिमंडल में इस फेरबदल को कामराज योजना से तुलना नहीं की जा सकती। लेकिन मंत्रिमंडल मंे हुए इस फेरबदल से यह स्पष्ट है कि कांग्रेस लोकसभा चुनावों की तैयारी में जुट गई है।  क्योंकि इन बदलावों से सरकार के कामकाज पर कोई खास असर नहीं पड़ने वाला है। ये मंत्री अपने कामकाज से अपनी सरकार की छवि को सुधार पाएंगे, यह इतने कम समय में संभव नहीं दिखता। क्योंकि जबतक वे अपने काम को समझेंगे तबतक चुनाव का समय आ जाएगा। ऐसे में ये मंत्री इतने कम दिनों में क्या कर पाते हैं यह देखने वाली बात होगी।
बहरहाल मनमोहन कैबिनेट में शामिल मंत्री अपने इलाके और प्रदेशों में पार्टी को कितना फायदा पहुंचाएंगे यह देखने वाली बात होगी। यूपीए 2 का आखिरी फेरबदल कांग्रेस को आगामी लोकसभा चुनाव में कितना फायदेमंद होगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

आंध्र, प. बंगाल और पंजाब को खास तरजीह
मनमोहन सरकार ने अपने में फेरबदल आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर किया है। 2009 में जिन-जिन राज्यों में कांग्रेस को सफलता मिली उन-उन राज्यों पर कांग्रेस विशेष ध्यान दे रही है। इसलिए इस फेरबदल में तीन राज्यों का खास ख्याल किया गया है। वे हैं- आंध्र प्रदेश, पंजाब और पश्चिम बंगाल। इस फेरबदल में आध्र प्रदेश से सबसे अधिक 6 और पंजाब व पश्चिम बंगाल सेे 3-3 लोगों को जगह दी है।
आंध्र प्रदेश से चिरंजीवी, केजय सूर्य प्रकाश रेड्डी, एस सत्यनाराण, बलराम नायक, डॉ कृपारानी किल्ली को पहली बार मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। वहीं एमएम पल्लम राजू को प्रमोट कर मानव संसाधन मंत्री बनाया गया है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि 2009 में आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की सफलता के पीछे वाईएस राजशेखर रेड्डी का हाथ था। लेकिन उनके गुजरने के बाद उनके बेटे जगनमोहन रेड्डी से कांग्रेस ने किनारा कर लिया। हाल के उपचुनावों में जिस तरह जगनमोहन रेड्डी को सफलता मिली है उससे कांग्रेस नेतृत्व सकते में हैं। यही वजह है कि इस मंत्रिमंडल में आंध्र प्रदेश से सबसे अधिक लोगों को शामिल किया गया है। वैसे इनमें से एक भी नाम ऐसा नहीं है तो कांग्रेस को जगनमोहन के मुकाबले में खड़ा कर पाएगी। जिन लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है उसके विरोध वहां कई सांसदों ने इस्तीफा भी दे दिया है। चिरंजीवी सिने कलाकार हैं वे कांग्रेस का कितना भला करेंगे यह तो समय ही बताएगा।
वहीं पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के धुर विरोधी माने जाने वाले तीन कांग्रेसियों को केंद्र में मंत्री बनाए जाने से कांग्रेस को सांगठनिक फायदा होता जान पड़ता है। पश्चिम बंगाल से एएच खान चौधरी, अधीर रंजन चौधरी और दीपा दास मुंशी को मंत्रिमंडल में पहली बार शामिल किया गया है। हालांकि तीनों को राज्य मंत्री बनाया गया है लेकिन प. बंगाल में चल रही योजनाओं के मामले उन्हें निर्णय लेने की पूरी छूट होगी। रेल परियोजनाओं को लेकर प. बंगाल में ममता बनर्जी से अधीर रंजन चौधरी का कई बार टकराव हो चुका है। अब रेल राज्य मंत्री बनते ही अधीर रंजन ने अनुत्पादक परियोजनाओं को रद्द करने का ऐलान किया है। बंगाल में मालदा, मुर्शिदाबाद और दिनाजपुर जिले को कांग्रेस का गढ़ माना जाता है। इन जिलों से सटे  जिलों में कांग्रेस को फायदा मिल सकता है। और बंगाल में कांग्रेस का पुनरुद्धार हो सकता है।
दूसरी तरफ पंजाब में हिंदू मतदाता को ध्यान में रखकर ही पवन बंसल, अश्विनी कुमार और मनीष तिवारी को मंत्रिमंडल में प्रमुखता दिया गया है। पंजाब में हिंदू या तो कांगेस के साथ होता है या भाजपा के साथ होता है। कांग्रेस ने यह दांव इसलिए खेला है क्योंकि सुखबीर सिंह बादल ने सिख और हिंदू मतदाता को अपने पाले में कर लिया है। पंजाब में बिना हिंदुओं के समर्थन के सरकार बनाना मुश्किल है। यह बात अब कांग्रेस के भी समझ में आ गई है। इसलिए वह पंजाब में 2014 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए पवन बंसल, अश्विनी कुमार और मनीष तिवारी जैसे हिंदू नेताओं को प्रमोट किया है। पवन बंसल और अश्विनी कुमार को पदोन्नत किया गया है तो मनीष तिवारी को राज्य मंत्री का स्वतंत्र प्रभार देते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनाया गया है।

प्रत्येक महीने 70 किसान करते हैं आत्महत्या

संजीव कुमार

देशभर में प्रत्येक महीने 70 से अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं, जबकि आज भी 1.25 लाख किसान परिवार सूदखोरों के चंगुल में फंसे हुए हैं। सूचना के अधिकार कानून के जरिए यह बात सामने आई है।

 

भारत में 2008 से 2011 के बीच 3,340 किसानों ने आत्महत्या की है। इसका मतलब यह है कि देशभर में प्रत्येक महीने 70 से अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं। सूचना के अधिकार कानून के तहत कृषि मंत्रालय के कृषि एवं सहकारिता विभाग ने यह जानकारी दी है। मंत्रालय से मिली जानकारी के अनुसार, इस दौरान सबसे अधिक महाराष्ट्र में 1,862 किसानों ने आत्महत्या की है, जबकि आंध्र प्रदेश में 1,065 किसानों ने आत्महत्या की। तो कर्नाटक में इस अवधि में 371 किसानों ने आत्महत्या की। वहीं पंजाब में इस दौरान 31 किसानों ने आत्महत्या की है। केरल में यह आंकड़ा 11 का है। गौरतलब है कि इन किसानों ने सूदखोरों के कर्ज से तंग आकर मौत को गले लगाया है।
देशभर में 2008 से 2011 के बीच 3,340 किसानों ने आत्महत्या की है। इसका मतलब यह है कि देशभर में प्रत्येक महीने 70 से अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं। इस दौरान सबसे अधिक महाराष्ट्र में 1,862 किसानों ने आत्महत्या की है, जबकि आंध्र प्रदेश में 1,065 किसानों ने आत्महत्या की है।
सूचना के अधिकार से यह जानकारी भी मिली है कि देशभर में सबसे अधिक कर्ज किसानों ने सूदखोरों से ही लिया है। यह जानकारी नेशनल सेम्पल सर्वे संगठन(एनएसएसओ) ने दी है। एनएसएसओ से मिली जानकारी के अनुसार, देश में किसानों के 1,25,000 परिवारों ने सूदखोरों एवं महाजनों से कर्ज लिया है, जबकि 53,902 किसान परिवारों ने व्यापारियों से कर्ज लिया। बैंकों से कर्ज लेने वाले किसान परिवारों की संख्या 1,17,100 है, जबकि को-ऑपरेटिव सोसाइटी से 1,14,785 किसान परिवारों ने कर्ज लिया है। सरकार से 14,769 किसान परिवारों ने और रिश्तेदारों एवं मित्रों से 77,602 किसान परिवारों ने कर्ज लिया है। आरटीआई कार्यकर्ता गोपाल प्रसाद ने सूचना के अधिकार के तहत 2007-12 के दौरान भारत में किसानों की मौतों का क्षेत्रवार ब्यौरा मांगा था। साथ ही उन किसानों की संख्या के बारे में भी जानकारी मांगी थी जिन्होंने सूदखोरों से कर्ज लिया था।
राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक, 2011 में देश भर में 14 हजार 27 किसानों ने आत्महत्या की है। वहीं 1995 से अबतक देश में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या दो लाख 70 हजार 940 पर पहुंच गई है। पिछले एक दशक से देश भर में किसानों की आत्महत्या के मामले में पांच राज्य शीर्ष पर बने हुए हैं। इनमें महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश शामिल हैं। 2011 में भी पूरे देश में किसानों द्वारा की गई आत्महत्याओं का 64 फीसदी इन्ही पांच राज्यों में ही रहा।
यह विडंबना ही है कि केंद्र व राज्य सरकार के अनेकानेक दावों के बावजूद आज भी कर्ज के बोझ तले दबे किसान आत्महत्या को मजबूर हैं। और यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। दूसरी तरफ सरकार के दावे हवा में ही झूल रहे हैं।
इन आत्महत्याओं को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि सरकार किसानों के प्रति पूरी तरह उदासीन है। हमारी सरकार को तो सिर्फ कॉरपोरेट घरानों की ही चिंता है। यदि सरकार थोड़ी-बहुत चिंता हमारे किसान भाइयों की भी करते तो यह दिन हमें देखना न पड़ता।
विशेषज्ञों की मानें तो किसानों के लिए सिर्फ योजनाएं बनाने से नहीं होगा बल्कि उन योजनाओं का लाभ उन किसानों को मिल रहा है या नहीं इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है। इस बाबत कृषि मामलों के जानकार देवेन्द्र शर्मा का कहना है कि ‘‘यदि किसानों को सही समय और उचित मूल्य पर खेती के लिए खाद, बीज और अन्य उर्वरक मिल जाए तो किसानों को आत्महत्या करने की नौबत नहीं आएगी। साथ ही सरकार ऐसी व्यवस्था करे जिससे हमारे किसानों को स्थानीय सूदखोरों की चंगुल में फंसना न पड़े।’’
वर्ष 2011 में आत्महत्या करने वाले किसान
राज्य         आत्महत्याएं
महाराष्ट्र    3,337       
आंध्र प्रदेश    2,206       
कर्नाटक     2,100       
मध्य प्रदेश    1,326       
पश्चिम बंगाल    807       
उत्तर प्रदेश    645       
गुजरात    578       
हरियाणा    384       
पंजाब        98
झारखंड    94
बिहार        83       
हिमाचल प्रदेश    46       
उत्तराखंड    25
(सभी आंकड़े राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार)


 

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

ऐतिहासिक नगरी आगरा


आगरा एक ऐतिहासिक नगर है। यहां आप किसी भी मौसम में जाएं यहां की खूबसूरती आपको आकर्षित करेगी। आगरा का इतिहास मुख्यतः मुगल काल से मिलता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसका संबंध महर्षि अंगिरा से है। वैसे आगरा का जिक्र पहली बार महाभारत में मिलता है, जहां इसे ‘अग्रवाण’ या ‘अग्रवन’ कहा जाता था। ऐसा कहा जाता है कि पहले यह ‘आयग्रह’ नगर के नाम से भी जाना जाता था। आगरा की ऐतिहासिकता इसके कण-कण में समाई हुई। अगर आप मुगल काल के इतिहास से बातें करना चाहते हैं, वहां ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण कर उसकी वास्तुकला से रु-ब-रु होना चाहते हैं, दुनिया के सात अजूबों में से एक ताजमहल की खूबसूरती निहारना चाहते हैं और ऊंट की सवारी करना चाहते हैं तो आगरा जरूर घूमिए। सीतामढ़ी के निवासी संजीव कुमार जो ‘प्रथम प्रवक्ता’ पत्रिका के विशेष संवाददाता हैं। वे हाल ही में ऐतिहासिक नगरी आगरा की सैर कर लौटे हैं। पेश है उनके यात्रा की कहानी उन्हीं की जुबानी... 

यात्रा करना और घूमना मुझे बहुत पसंद है। अब तक तो मैं कई जगहों की यात्राएं कर चुका हूं लेकिन अपनी शादी के बाद आगरा घूमना अविस्मरणीय अनुभव था। मुगल सम्राट सिकंदर लोदी ने 1506 ई. में यमुना नदी के तट पर आगरा शहर बसाया। आज यह कई खूबसूरत ऐतिहासिक धरोहरों के लिए जाना जाता है। लेकिन प्रसिद्ध तो यह विश्व के सात अजूबों में से एक ताज महल के लिए ही है। यही वजह है कि ताज महल के बारे में प्रसिद्ध शायर साहिर लुधियानवी ने लिखा है-
‘‘ये चमनज़ार, ये जमुना का किनारा ये महल
ये मुनक़्क़श, दर-ओ-दीवार, ये महराब ये ताक़।
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर,
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है म़ज़ाक।’’  
साहिर ने भले ही अपने इस नज्म में ताजमहल को गरीबों के मुहब्बत का मजाक बताया हो लेकिन इसमें किसी को संदेह नहीं है कि यह शाहजहां के प्रेम की निशानी है। जिसे शाहजहां ने अपने प्रिय बेगम मुमताज महल की याद में बनवाया था। इसके अलावा आगरे का किला और फतेहपुर सीकरी की इमारतें विश्व की सांस्कृतिक धरोहर स्थल की सूची में शामिल हैं।
ऐसे ऐतिहासिक धरोहरों को पास से देखने, उसे महसूस करने और उससे बातें करने में जो आनंद आता है वह दुर्लभ है। वैसे यहां जून-जुलाई (गर्मी के महीने) को छोड़कर किसी भी महीने में जाया जा सकता है। अगर फरवरी महीने में घूमने का प्रोग्राम बना रहे हैं तो 18-27 फरवरी के दौरान जाने का कार्यक्रम बनाएं। क्योंकि इन दिनों वहां ताज महोत्सव होता है। वैसे हमारा जाना मई के तीसरे हफ्ते में हुआ था। अगर आप रेल मार्ग से आगरा जाना चाहते हैं तो वहां का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन आगरा कैंट है। मुझे रेल से सफर करना अच्छा लगता है इसलिए हमने पटना से दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़ी। अगले दिन सुबह हम दिल्ली पहुंचे। वहां एक रिश्तेदार के यहां हमलोग ठहरे। वहां से हमलोगों ने भाड़े पर टैक्सी लिया। अगला दिन शुक्रवार था। और हमें यह पता था कि शुक्रवार को ताजमहल बंद रहता है इसलिए हमलोगों ने उस दिन मथुरा और वृंदावन घूमने का निश्चय किया। हमारी यात्रा टैक्सी से सुबह 6 बजे शुरू हुई। सुबह-सुबह यात्रा करना अच्छा लग रहा था। सुबह-सुबह लोगों को जगकर अपने काम के लिए तैयार होते और जाते हुए देखना अच्छा लग रहा था। यात्रा के बीच में हमलोगों एक ढ़ाबे पर चाय पी। वहां चाय मिट्टी के कुल्हड़ में मिल रही थी। मुझे बहुत दिनों बाद कुल्हड़ में चाय पीने को मिला। लेकिन उस चाय को पीने में जो आनंद आया वह दुर्लभ था। चाय पीने के बाद हमलोग फिर अपनी टैक्सी से मथुरा के लिए चल पड़े।
सुबह 10 बजे हमलोग पौराणिक नगरी मथुरा पहुंचे। वहां हमलोगों ने इंटरनेशनल गेस्ट हाउस में एक रूम पहले से ही बुक करवा रखा था। रूम में सामान रखने के बाद सबसे पहले हमलोगों कृष्ण जन्मभूमि देखा। जिस कृष्ण को सिर्फ पौराणिक ग्रंथ के माध्यम से जानता था उसे हमलोगों ने उनकी जन्मभूमि देखकर महसूस किया। उसके बाद हमने कालिया दह देखा भगवान कृष्ण ने सर्पराज कालिया नाग को वंश में किया था। उसके बाद हमने उस यमुना किनारे के कदंब के पेड़ को देखा जिस पर बैठकर कृष्ण बांसुरी बजाते थे। फिर चिर घाट होते हुए कृष्णा की लीला भूमि सेवाकुंज पहुंचे। ऐसी मान्यता है कि वृंदावन में यही वह निधि वन है जहां कृष्ण राधा रानी और गोपियों के रास रचाते थे। यहां यह भी सुनने को मिला कि कृष्ण आज भी यहां रात्रि में रास लीला करते हैं। लेकिन जो कोई इस लीला को देखने की चेष्टा करते वह कुछ भी बताने लायक नहीं रहता। इस बात पर आश्चर्य करते हुए ईश्वर की महिमा का गुनगान और राधा-कृष्ण के अलौकिक प्रेम को स्मरण करते हुए अंत में बांके बिहारी का दर्शन किया। रात्रि विश्राम अपने होटल में किया।
अगले दिन सुबह 6 बजे आगरा के लिए निकला। 8 बजे ऐतिहासिक नगरी आगरा पहुंचा। नास्ता करने के बाद सुबह-सुबह ही हमलोग ताजमहल देखने पहुंचे। ताजमहल में प्रवेश करने से पहले ही इसके भव्यता का अंदाजा हमलोगों को होने लगा। ताज को एक लालबलुआ पत्थर के चबूतरे पर बने श्वेत संगमर्मर के चबूतरे पर बनाया गया है। इसे फारसी वास्तुकार उस्ताद ईसा खां के निर्देशन में यमुना किनारे बनाया गया। इसे बनाने में लगभग 20 हजार मजदूरों का अथक परिश्रम और लगभग 22 वर्षों(1630-52) का समय लगा। यहां मुगल शैली के चार बाग भी हैं जो ताजमहल को और अधिक संुदर बनाते हैं। इसके मुख्य द्वार पर कुरआन की आयतें खुदी हुई हैं। उसके ऊपर बाइस छोटे गुंबद हैं, जो कि इसके निर्माण के वर्षों की संख्या बताते हैं। लेकिन ताज की सुंदरता, इसके इमारत के बराबर ऊंचे महान गुंबद में बसी है। यह 60 फीट व्यास का, 80 फीट ऊंचा है। इसी के नीचे मुमताज की कब्र है। इसके बराबर में ही शाहजहां का भी कब्र है। ताजमहल के अंदरूनी भाग में रत्नों व बहुमूल्य पत्थरों का काम मुगल स्थापत्य कला से हमें रूबरू कराता  है। ताजमहल के पिछवाड़े बहती यमुना नदी हालांकि अब स्वच्छ नहीं है फिर भी मनोरम और सुंदर दिखती है।
उसके बाद हमलोग आगरे का किला देखने गए। इसे कभी आगरे का लाल किला भी कहा जाता था। आगरा के किले से भी ताजमहल को देखा जा सकता है। यहां से शाहजहां अपने जीवन के अंतिम आठ वर्षों में (अपने पुत्र औरंगजेब द्वारा कैद किए जाने के बाद) ताजमहल को देखा करता था, जहां से यह हवा में तैरता हुआ प्रतीत होता है।  
 आगरे का किला शहर के बीचोंबीच है। इसकी बनावट अर्ध-चद्राकार है जिसे अकबर ने 1565 में बनवाया था। बाद में शाहजहां ने इस किले का पुनरूद्धार लाल बलुआ पत्थर से करवाया। और इसे किले से महल के रूप में बदला। यहां संगमर्मर पर महीन नक्काशी का कार्य किया गया है जो किले की सुंदरता में चार चांद लगाता है। इस किले की मुख्य इमारतों में मोती मस्जिद, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, जहांगीर महल, खास महल, शीश महल एवं मुसम्मन बुर्ज आते हैं। हर महल अपने आप में इतिहास की स्मृतियों को समेटे हुए है। इस किले की पूरी परिधि है 2.4 किलोमीटर है, जो दोहरे परकोटे वाली चारदीवारी से घिरी है। इस दीवार में छोटे अंतरालों पर बुर्जियां हैं। इस दीवार को एक 9 मीटर चौड़ी व 10 मीटर गहरी खाई घेरे हुए है।
रात्रि को होटल में विश्राम किया और अगले दिन सुबह फतेपुर सीकरी देखने निकला। यह आगरा से 35 किलोमीटर दूर है। इसे मुगल सम्राट अकबर ने बसाया था। यहां कई भव्य इमारतें जो हमारे स्वर्णिम इतिहास से हमें रूबरू कराता है। यहां का बुलंद दरवाजा, एक वैश्विक धरोहर है। यह बुलंद दरवाजा मुगल सम्राट अबकर ने बनवाया था। यह लाल और बलुआ पत्थर से बना है। और इसे काले और सफेद संगमर्मर की नक्कासी से सजाया गया है। इसके अलावा कई अन्य दर्शनीय स्थल भी है जहां इतिहास के पन्नों को पलटा जा सकता है। इसी दिन हमें दिल्ली के लिए लौटना पड़ा। लौटते वक्त हमें अलौकिक प्रेम की नगरी से लौकिक प्रेम की नगरी तक की यात्रा करना इस यात्रा को अविस्मणीय बना दिया।

क्विक व्यू
पटना से आगरा (उत्तर प्रदेश) की दूरी लगभग 884 किलोमीटर है।
कैसे पहुंचें
पटना से आगरा आप ट्रेन से भी जा सकते हैं। पटना जंक्शन से पटना-मथुरा एक्सप्रेस 11.50 बजे है। यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन आगरा कैंट है। यहां देश के किसी भी शहर से आसानी से पहुंचा जा सकता है। यहां हवाई मार्ग से भी जाया जा सकता है। आगरा से 7 किलोमीटर की दूरी पर हवाई अड्डा स्थित है। यह देश के कई प्रमुख शहरों से जुड़ा है।
कब जाएं
वैसे तो यहां कभी भी जा सकते हैं लेकिन फरवरी में जाना बढ़िया रहेगा। क्योंकि 18-27 फरवरी के दौरान ताज महोत्सव का आयोजन किया जाता है।
होटल
यहां पर्यटकों के ठहरने के लिए कई होटलें हैं। जो आपके बजट के अनुसार हो वहां ठहर सकते हैं। यहां के अच्छे होटलों में कठपुतली नृत्य एवं परंपरा के अनुसार भोजन भी परोसा जाता है। यहां अनेक पर्यटकों को स्थानीय निवासियों द्वारा बनाए गए पारंपरिक व्यंजन लुभाते हैं।
अन्य दर्शनीय स्थल
आगरे का किला, फतेहपुर सीकरी, जामा मस्जिद, बुलंद दरवाजा,  एतमादुद्दौला का मकबरा, सिकंदरा, मरियम मकबरा, चीनी का रोजा, रामबाग, दयाल बाग और मेहताब बाग आदि देखकर इतिहास के यादों को संजोया जा सकता है। यहां से मथुरा और वृंदावन भी जाया जा सकता है।

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

वात्सल्य ग्राम अनाथालय नहीं एक परिवार है



वात्सल्य ग्राम की परिकल्पना को लेकर वात्सल्य ग्राम की संस्थापिका साध्वी ऋतंभरा से संजीव कुमार की बातचीत के प्रमुख अंश-
1.  अपने देश में अनाथालयों की कमी नहीं है। ऐसे में वात्सल्य ग्राम उन अनाथालयों से किस तरह भिन्न है?
वात्सल्य ग्राम अनाथ बच्चों को सनाथ बनाता है। यहां बच्चों को एक मां की गोद मिलती है और अपना घर मिलता है। साथ में  भाई-बहन, मां-मौसी और नानी के रूप में रिश्ता मिलता है। इस तरह वात्सल्य ग्राम अपने बच्चों को संबंधों का एक सुख देता है। रोटी, कपड़ा और मकान के साथ जो रिश्ता और परिवार का प्यार मिलता है, वह वात्सल्य ग्राम को अन्य अनाथालयों से भिन्न करता है।
2. क्या यह जरूरी है कि वात्सल्य ग्राम की माताएं बच्चों को उतना ही प्यार दे पाती हैं जितना एक सगी मां अपने बच्चे से करती हैं?
प्यार सगे और पराए को नहीं पहचानता। जननी तो सिर्फ जन्म देती है। अगर कोई बच्चा दूसरे जगह चला जाए तो उसे वहां स्वाभाविक रूप से प्यार मिलना शुरू हो जाता है। दूसरी बात कोई भी स्त्री तभी अपना जीवन वात्सल्य ग्राम को देती है जब वह वात्सल्यमयी होती है। ममतामयी होती है। जो प्यार देने के लिए ही नहीं, प्यार पाने के लिए भी आतुर होती हैं। यहां की माताओं और बच्चों का रिश्ता जीविका का नहीं, जीवन और प्यार का रिश्ता है। वात्सल्य ग्राम अनाथालय नहीं एक परिवार है। इसके माध्यम से मैं एक भावात्मक परिवार अर्थात् ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की भारतीय ऋषि कल्पना को साकार करने की साधना कर रही हूं।
3. जब वात्सल्य ग्राम के बच्चों को यह पता चलता है कि उन्हें ममता की शीतल छाया देने वाली मां उनकी असली मां नहीं है तब उनकी क्या प्रतिक्रिया होती है?
वात्सल्य ग्राम के बच्चे जब बड़े होते हैं और जन्म की प्रक्रिया के बारे में पता चलता है तो वे यह समझ जाते हैं कि यही वह मां है जिसने हमें अपना जीवन दिया है। ऐसे में अपनी इस मां के प्रति उनकी श्रद्धा और बढ़ जाती है। क्योंकि वे ये समझने लगते हैं कि जो मेरे खून के रिश्ते थे वे मुझे छोड़ गए और एक यह मां है जिसने अपनी जिंदगी मेरे लिए न्योछावर कर दी है। इस अहसास के बाद तो इन बच्चांे का अपनी इस मां के प्रति श्रद्धा व प्यार और बढ़ जाता है।
4. इन बच्चों का अपने भाई-बहनों के प्रति कैसा व्यवहार होता है?
आश्रम के बच्चे अपने बाद आने वाले बच्चों के प्रति स्वाभाविक रूप से संवेदनशील होते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि ये बच्चे अपने भाई-बहनों के रूचियों का ख्याल रखते हैं। उन्हें इस बात का स्वाभाविक रूप से भान होता है कि यह बच्चा पालने में आया है। इसे भी कोई छोड़ गया होगा। ऐसे में इन बच्चों के प्रति उनके मन में प्रेम स्वाभाविक रूप से पनपता है। इसके लिए हमें कोई लेक्चर या प्रवचन देने की जरूरत नहीं होती। 
5. वात्सल्य ग्राम से निकले अबतक कितने बच्चे सामान्य जीवन जी रहे हैं?
वात्सल्य ग्राम को 12 साल हुए हैं लेकिन मैं इस कार्य से 22 साल से जुड़ी हंू। हमारी कई बच्चियां अपने-अपने क्षेत्रों में अपने पैरों पर खड़ी हो रही है। हमारी एक बच्ची आईआईटी से इंजिनियरिंग तो दूसरी डेंटल (डॉक्टरी) की पढ़ाई कर रही है। वहीं एक बच्ची इंटीरियर डिजाइनिंग का काम कर रही है। इस तरह सभी अपना सामान्य जीवन जी रहे हैं। वे अपने जीवन में अच्छी पढ़ाई-लिखाई तो कर ही रहे हैं। और अब वे समाज के लिए क्या करेंगे यह तो आने वाला समय ही बताएगा। वैसे वात्सल्य परिवार की पहली बच्ची का दिल्ली के एक गोयल परिवार मे ब्याह हुआ है। वह दो बच्चों की मां है। और घर-परिवार ठीक से चला रही है। एक अनाथ बच्ची का समाज के मुख्य धरा में शामिल होना ही वात्सल्य ग्राम की एक उपलब्धि है। सबसे अच्छी बात यह है कि इस बच्चों को अपनाने के लिए समाज ही आगे आ रहा है।
6. वात्सल्य ग्राम के बच्चों को लेकर आपकी क्या सोच है?
मैं समझती हंू कि कोई भी बच्चा ईश्वरीय कृति है। ये बच्चे किसी परिवार, समाज या देश की ही नहीं मानवता की भी धरोहर हैं। मैं इन बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा देने का प्रयत्न कर रही हूं। जिससे वे अपने व्यक्तित्व में पूर्णता, नैतिकता और आध्यत्मिकता के साथ-साथ अपनी राष्ट्रीय भूमिका भी निभाए। एक अच्छा और प्रमाणिक इंसान बनाने की प्रक्रिया ही हमारे वात्सल्य ग्राम की सोच है। मेरी यह कामना है कि वे देश और समाज के लिए जिएं। वे काम करें, धन कमाएं, किंतु स्वयं अकेले न खाकर आसपास के लोगों को खिलाकर खाएं।

वात्सल्य की बगिया वात्सल्य ग्राम

संजीव कुमार

वात्सल्य ग्राम, न केवल ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की कल्पना को साकार करता है बल्कि आज के इस भौतिकवादी दौर में जहां कोई किसी का सगा नहीं है वहां यह आत्मिक रिश्तों का संसार भी रचता है।  
 वात्सल्य ग्राम। मथुरा-वृंदावन रोड पर 50 एकड़ भूमि में फैला एक गांव। एक ऐसा गांव जहां 16 आवासीय भवनों में 127 बच्चे, 16 मां, 10 नानियां और छह मौसियां। हर मां का एक स्वतंत्र परिवार। एक वात्सल्य परिवार में 5 बालिकाएं, 2 बालक, एक मां, मौसी और नानी होते हैं, जो एक परिवार की भांति रहते हैं। एक ऐसा गांव जहां नवजात, युवा और बुजुर्ग एक साथ रहते हैं, लेकिन यहां कोई अनाथ, अवैध, नाजायज, बांझ, विधवा और पारित्यक्ता नहीं है। एक ऐसा गांव जहां हर बच्चे के माता-पिता की जगह सिर्फ ‘मां’ का नाम जुड़ता है। एक ऐसा गांव जहां जात-पात का भेदभाव नहीं है। यहां सब एक ही जाति और गोत्र के नाम से जाने जाते हैं। वह है- ‘परमानंद’। स्वामी परमानंद वात्सल्य ग्राम की संस्थापिका साध्वी ऋतंभरा के गुरु हैं। एक ऐसा गांव जहां रक्त संबंध न होते हुए भी देश के अलग-अलग हिस्सों के लोग एक परिवार की तरह रहते हैं।
इस वात्सल्य ग्राम को साध्वी ऋतंभरा का आश्रम भी कहा जाता है। इस परिसर में उन्हें ‘दीदी मां’ कहा जाता है। साध्वी ऋतंभरा अपने इस आश्रम में रहने वाले 127 बाल-गोपालों पर अपना सर्वस्व न्योछावर करती हैं। श्रीराम मंदिर आंदोलन के समय हिंदुत्व की फायर ब्रांड नेता मानी जाने वाली साध्वी ऋतंभरा ने वात्सल्य ग्राम से जो वात्सल्य की गंगा बहायी है वह अन्यत्र दुर्लभ है। वाल्सल्य ग्राम, वात्सल्य भाव की केवल प्रयोग भूमि ही नहीं है, यह एक अतिप्रेरक संदेश और संकेत भी है कि भारत के पुनर्जन्म की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है।
वात्सल्य ग्राम सिर्फ वात्सल्य की भूमि पर ही केंद्रित नहीं है, यहां राष्ट्रभाव की भी प्राण-प्रतिष्ठा की गई है। इसके प्रांगण में भारतमाता की भव्य प्रतिमा इसी का संदेश देता है। कृष्ण और यशोदा का वात्सल्य भाव अगर कहीं सुरक्षित रह सकता है तो वह भारतमाता का आंचल ही हो सकता है। इसी भाव को दर्शाती एक आकृति प्रवेश द्वार के कुछ आगे स्थापित की गई है। मां यशोदा की गोद में बालकृष्ण विराजमान हैं। मां यशोदा बालकृष्ण को निहार रही हैं और बालकृष्ण मां यशोदा को। इन दोनों के बीच वात्सल्य की जो अविरल धारा प्रवाहित हो रही है वह अद्भुत है। उसी तरह वात्सल्य ग्राम से प्रवाहित हो रही वात्सल्य की यह गंगा समस्त जीव-जगत के कल्याण के लिए है। यह लौकिक माता-पिता की स्नेहिल छाया से वंचित शिशुओं के लिए मातृ प्रेम का सजीव अंागन है। यह मातृत्व और पितृत्व से वंचित वयस्कों के लिए भी है तो कर्तव्य-बोध से अज्ञात सामान्यजन के लिए भी है।
इस प्रयोगभूमि के आरंभ की कहानी भी कम दिलचस्व नहीं। परमशक्ति पीठ से जुड़े भानुप्रताप शुक्ल न्यास के सचिव योगेन्द्र पाल त्यागी बताते हैं कि एक बार दीदी मां साध्वी ऋतंभरा को एक अनाथ शिशु मिला। उन्होंने सोचा कि कोई अकेली रहनेवाली माता इसे स्वीकार कर ले तो दोनों का एकाकीपन दूर हो जाएगा और कोई बेसहारा भी नहीं रहेगा। ‘रघुनाथ’ और ‘विश्वनाथ’ के इस देश में कोई ‘अनाथ’ और ‘बेसहारा’ कैसे हो सकता है?’ इसी सिद्धांत को आधार बनाकर दिल्ली के पटपड़गज में वात्सल्य भाव से ही परमशक्ति पीठ की स्थापना (1992) और फिर वात्सल्य मंदिर का जन्म हुआ। इस योजना को इतना समर्थन मिला कि आज यह ‘वात्सल्य मंदिर’ से ‘वात्सल्य ग्राम’ में तब्दील हो चुका है।
वात्सल्य ग्राम में अधिकांशतः वैसे ही बच्चे पलते हैं जिनके अभागे मां-बाप अपनी मजबूरियों की वजह से उन्हें कूड़ेदान या झाड़ियों में डाल देते हैं। वात्सल्य की बगिया इन्हीं कूड़ेदान और झाड़ियों से उठाए गए ‘फूलों’ से सजी है। वात्सल्य ग्राम के शिशु मंगल में एक वर्ष से कम आयु के बच्चे रहते हैं। आज इस शिशु मंगल में 50 के करीब बच्चे हैं। इन बच्चों का लालन-पालन मां सुमन परमानंद करती हैं। सुमन परमानंद इस परिसर की प्रमुख हैं। एक वर्ष के बाद बच्चे को गोकुलम के एक परिवार को सौंप दिया जाता है, जहां उनका प्रेम पूर्वक लालन-पालन किया जाता है। यहां वे नौ वर्ष की आयु तक रहते हैं। उसके बाद उन्हें अध्यापक के अनुशासन में छात्रावास में भेज दिया जाता है। यहां उनका शिक्षा के साथ-साथ समग्र शारीरिक और मानसिक विकास पर ध्यान दिया जाता है। छठी कक्षा के बाद बच्चों को परमशक्ति पीठ के खर्चे पर ही बाहर पढ़ने के लिए भेज दिया जाता है।
परमशक्ति पीठ को बने आज 20 वर्ष से अधिक हो गए हैं। इसलिए वात्सल्य मंदिर में पली-बढ़ी पहली बच्ची अंकिता की शादी दिल्ली के ही एक अच्छे परिवार में हो चुकी है। पिछले दिनों उसके पैर में चोट लगी तो उसकी मां शोभा परमानंद को तबतक चैन नहीं आया, जबतक उन्होंने दिल्ली जाकर अपनी बेटी से मिल नहीं लिया। इससे यह भी पता चलता है कि वात्सल्य ग्राम के मां-बच्चों का रिश्ता कुछ वर्षों का नहीं है, बल्कि जीवन भर का है। इतना ही नहीं अंकिता जब वात्सल्य ग्राम आती है तो उसका वात्सल्य ग्राम में उसी तरह स्वागत होता है जैसे एक बेटी का उसके मायके में होता है। यह है वात्सल्य ग्राम की बगिया का वात्सल्य।

और कहां-कहां है वात्सल्य ग्राम
1- अग्रसेन आवास, इंद्रप्रस्थ विस्तार, दिल्ली
2- नालागढ़, सोलन, हिमाचल प्रदेश
3- ओंकारेश्वर, खांडवा, मध्य प्रदेश
4- छतरपुर, खजुराहो, मध्य प्रदेश

वात्सल्य ग्राम के प्रकल्प
गोकुलम् वात्सल्य आवास: आधुनिक सुविधा संपन्न आवासीय परिसर। यहां बालक नौ वर्ष की आयु तक रहते हैं।
स्वस्ति चिकित्सालयः प्राकृतिक चिकित्सा, योग एवं व्यायाम के माध्यम से असाध्य रोगों का निदान इस आरोग्य केंद्र का लक्ष्य है।
समविद् गुरुकुलमः बालक-बालिकाओं के लिए आवासीय विद्यालय जहां मूल्य आधारित समग्र शिक्षा प्रदान की जाती है।
खेलकूद अकादमीः वात्सल्य ग्राम वासियों को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ एवं सबल बनाने के लिए।
संस्कार केंद्रः समाज में पवित्र वातावरण का निर्माण और ग्राम वासियों के जीवन में धर्म-संस्कार व नैतिकता की प्रस्थापना के लिए यज्ञ, कथा, प्रवचन और कर्मकांड की शिक्षा दी जाती है।
गृह उद्योग प्रशिक्षण केंद्रः गृह उद्योग, कुटीर उद्योग और वन्य उत्पाद आधारित उद्योगों द्वारा अर्थोपार्जन की शिक्षा देकर मातृ शक्ति को जीवन में स्वावलंबी बनाना इस केंद्र का लक्ष्य है।
कामधेनु गौगृहः गोधाम के माध्यम से संपूर्ण गौवंश का संरक्षण, संवर्धन करना। साथ ही वात्सल्य ग्राम के सभी शिशुओं को गोदुग्ध उपलब्ध हो सके।
मातृ प्रशिक्षण केंद्रः ऐसी मार्गदर्शिका, राष्ट्रसेविका और धर्मप्रचारिका नारी का निर्माण केंद्र जहां माताओं को सम्मानजनक स्थान प्रदान करने के साथ शिशु पालन व परिवार की देखरेख का प्रशिक्षण दिया जाता है।
संत निवासः सद्गुरु सन्निधि के निर्माण के उद्येश्य से विभिन्न स्थानों से आए साधकों व संतों को एक पवित्र व धार्मिक वातावरण में प्रवास उपलब्ध कराना।
मीरा माधव निलयम अतिथि गृहः भारत व विदेशों से आए वात्सल्य ग्राम योजना के सहयोगियों व भ्रमणार्थियों को प्रवास स्थान उपलब्ध कराना इस प्रकल्प का उद्येश्य है।