रविवार, 25 मार्च 2012

शहरी बच्चे अनिवार्य सुविधाओं से वंचित : यूनिसेफ

संजीव कुमार
बीते 29 फरवरी 2012 को यूनिसेफ ने शहरी दुनिया के बच्चों को आधार बनाकर ‘द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रेन 2012: चिल्ड्रेन इन एन अरबन वर्ल्ड’ नाम से एक रिपोर्ट जारी किया। इस वर्ष यह रिपोर्ट भारत के सबसे बड़े महानगरों में से एक नई दिल्ली में जारी किया गया जहां करोड़ों बच्चे रहते हैं
यूनिसेफ ने दुनिया भर के शहरी बच्चों को आधार बनाकर एक रिपोट जारी किया है। रिपोर्ट के अनुसार, पूरी दुनिया के शहरों व नगरों में सैकड़ांे मिलियन ऐसे बच्चे हैं जो अनिवार्य सुविधाओं से वंचित हैं। यूनिसेफ के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्रों की ओर बढ़ते पलायन से शहरी जनसंख्या में 60 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। ऐसा अनुमान है कि प्रत्येक वर्ष दुनिया की शहरी आबादी में लगभग 6 करोड़ की वृद्धि हो रही है। अगर यही हाल रहा तो 2050 तक हर दस में से सात व्यक्ति शहरों में रह रहे होंगे।
रिपोर्ट जारी करते हुए भारत में यूनिसेफ की प्रतिनिधि कैरिन हॉलशॉफ ने कहा कि आज विश्व की आधी से ज्यादा आबादी शहरों में रह रही है। इसमें एक अरब से ज्यादा बच्चे हैं। 2011 की जनसंख्या के अनुसार भारत में 37.7 करोड़ लोग शहरों में रहते हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसा अनुमान है कि 2026 तक भारत में 53.5 करोड़ लोग शहरों में रहने लगेंगे। ऐसे में यह हमलोगों पर निर्भर है कि हम यह सुनिश्चित करें कि शहर अपने वादे के मुताबिक बना रहेगा। सभी बच्चों के लिए एक समान अवसर और सम्मान का जीवन मिलेगा। वहीं यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक एंथोनी लेक ने कहा कि शहरीकरण जीवन की वास्तविकता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए हमें बच्चों को बेहतर सुविधा मुहैया कराने जाने की जरुरत है। इस अवसर पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. शांता सिन्हा, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव सुधीर कुमार एवं टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के निदेशक डॉ. परसुरामन भी उपस्थित थे।
कहने की आवश्यकता नहीं है कि दुनिया भर के शहरों में बच्चे भी उसी अनुपात से बढ़ रहे हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार शहरी बचपना बताता है कि उन्हें कई तरह की असमानताओं मसलन अमीरी बनाम गरीबी या फिर सामाजिक गतिशीलता के लिए जरूरी अवसर बनाम अस्तित्व के संकट से गुजरना पड़ रहा है। इस रिपोर्ट से हमारे सामने आज जो सच्चाई उजागर हुई है वह दुनिया भर के शहरों में बढ़ रहे बच्चों की चुनौतियों के बारे में बताती है। इन चुनौतियों में आधारभूत सूविधाओं का असमान वितरण, कुषोषण की बढ़ती दर, पांच वर्ष के अंदर मृत्यु के बढ़ते मामले, स्वच्छ पानी और शौचालय का अभाव, प्राकृतिक खतरों और आर्थिक कारणों से पड़ने वाले प्रभाव शामिल है। कमोबेश भारत की भी यही स्थिति है।
शहरी बच्चों को कई तरह की सुविधाएं सहज उपलब्ध होती हैं, जैसे- स्कूल में पढ़ने, चिकित्सा व खेल के मैदान की सुविधा। लेकिन उसी शहर में कुछ ऐसे इलाके भी होते हैं जहां के बच्चों के लिए ये सुविधाएं उपलब्ध नहीं होती। रिपोर्ट के अनुसार, ऐसा पूरे विश्व में देखा गया है कि बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा व अवसरों की उपलब्धता में बहुत ही असमानता है। भारत की वित्तीय नगरी मुंबई संसार के बड़े व धनी शहरों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि यहां सबसे घनी आबादी और सबसे ज्यादा संख्या में मलिन बस्तियां हैं। भारत में लगभग 50,000 मलिन बस्तियां है, और इनमें से 70 प्रतिशत बस्तियां पांच राज्यों में हैं- महाराष्ट्र (35 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (11 प्रतिशत), पश्चिम बंगाल (10 प्रतिशत), तमिलनाडु और गुजरात (7 प्रतिशत)। आवास एवं गरीबी उन्मूलन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, आज भारत में 9.7 करोड़ लोग 50 हजार से ज्यादा मलिन बस्तियों में रहते हैं।
दूसरी तरफ शहरों के कई क्षेत्रों में संस्थागत ढांचा और उपलब्ध सेवाएं शहरी विकास दर के अनुकूल नहीं है। इतना ही नहीं शहरी बच्चों की बुनियादी जरुरतें भी पूरी नहीं हो पाती। गरीबी में रह रहे परिवारों को अक्सर निम्नस्तरीय सेवाएं दी जाती हैं। शहरी समुदाय के गरीब बच्चों को बुनियादी चीजों से भी वंचित होना पड़ता है और जब शहरी लोगों के सांख्यिकी पर आधारित आंकडे़ तैयार किए जाते हैं तो गरीब और अमीर बच्चों को एक ही पैमाने पर रखा जाता है। इन आंकड़ों के आधार पर जब कोई शहरी नीतियां बनती हैं और स्रोतों का आवंटन होता है तो सबसे ज्यादा उन्हीं गरीब लोगों और उनके बच्चे की जरूरतों को ही नजरअंदाज किया जाता है।
इसलिए ऐसी नीतियां बनाई जाएं जिसमें ज्यादा असुविधाग्रस्त, जरुरतमंद बच्चों को चाहे वे कहीं भी रहते हों, प्राथमिकता मिले, तभी बच्चों में समानता लाया जा सकता है। यूनिसेफ की प्रतिनिधि कैरिन हॉलशॉफ ने यूनिसेफ की तरफ से भारत सरकार से आग्रह किया कि शहरी बच्चों को शहरी योजनाओं के केंद्र में रखा जाए और बेहतर सुविधाओं के विस्तार के दायरे में सभी बच्चों को लाया जाए। तभी हम शहरी एजेंडे में बाल अधिकार को सुनिश्चित कर सकेंगे। इस कार्य को बेहतर तरीके से करने के लिए हमें शहरी क्षेत्रों में रह रहे बच्चों के बीच गरीबी के स्तर और असमानताओं की पहचान करनी होगी तभी इसे दूर किया जा सकता है। वहीं हमलोगों के सामने यह चुनौती है कि हम शहरों को बच्चों के अनुकूल बनाएं जिसमें सभी बच्चों को समान अवसर व सम्मान मिल सके।
(यह रिपोर्ट प्रथम प्रवक्ता के 1 अप्रैल के अंक में छपी हुई है।)

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

बिहार विधानसभा














जातियों के आधार पर बिहार विधानसभा

जातियां 1990 1995 2000 2005 2010
यादव 63 86 64
54 39
कोईरी 12 13 12 16 21
कुर्मी 18 27 22 22 19
बनिया 18 18 12 16 13
अ.पि.जा. 06 16 11 19 17
जोड़ 117 160 121
127 109

ब्राह्मण 27 09 08 10 16
भूमिहार 34 18 19 23 26
राजपूत 41 22 26 23 31
कायस्थ 03 07 03 03 03
जोड़ 105 56 56 59 76
अनुसूचित जाति/ जनजाति (आरक्षित) 39
मुस्लिम 19

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

क्या गांधी भी लोकतंत्र के लिए खतरा?



संजीव कुमार
हमारे माननीय प्रधानमंत्री अन्ना के आंदोलन को लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहे हैं। मैं प्रधानमंत्री से पूछना चाहता हूं कि क्या शांतिपूर्वक धरना या अनशन लोकतंत्र के लिए खतरा है? अगर अन्ना और अन्ना का आंदोलन लोकतंत्र के लिए खतरा है तो उससे पहले लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा महात्मा गांधी हैं। वैसे सत्याग्रह (धरना-प्रदर्शन और अनशन) तो भारत के खून में रचा-बसा है। लेकिन जहां तक मैं जानता और समझता हूं भारत में धरना-प्रदर्शन और अनशन को लोकप्रिय बनाने का काम महात्मा गांधी का ही था। भारत के इतिहास में सत्याग्रह के अंतर्गत धरना-प्रदर्शन और अनशन का जिक्र सन् 1812 से ही है। इतिहासकार धर्मपाल जी ने इसका उल्लेख अपने पुस्तकों में किया है। घबराइए मत, मैं यहां आपके सामने अपना इतिहास ज्ञान नहीं बघारना नहीं चाहता। और ना ही मैं विषय से विषयांतर होना नहीं चाहता। मैं यहां प्रधानमंत्री को दो-चार बातें बताना चाहता हूं।
प्रधानमंत्री जी, अगर अन्ना का रास्ता सही नहीं है तो कहीं न कहीं आप महात्मा गांधी के रास्तों को भी गलत बता रहे हैं। कहने का अर्थ यह है कि डॉ. मनमोहन सिंह महात्मा गांधी की आत्मा पर भी प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं! आज अगर हम आजाद हैं तो उसमें गांधी जी के सत्याग्रह का बहुत बड़ा योगदान है। हमने यदि अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की जंग जीती है उसमें गांधी के धरना-प्रदर्शन और अनशन का बहुत अहम रोल है। इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। लेकिन हमारे प्रधानमंत्री को यह तरीका लोकतंत्र के खिलाफ लगता है। और हमारे प्रधानमंत्री नागरिकों को संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार छीनकर अपने को लोकतंत्र का पोषक बता रहे हैं। क्या वे लोगों का मौलिक अधिकार छीनकर लोकतंत्र और संविधान का गला नहीं घोंट रहे? धरना-प्रदर्शन और अनशन जैसे हथियार गांधी के सत्याग्रह के लिए साधन था, वैसे ही अन्ना के लिए भी यह साधन है। गांधी जी साध्य के लिए साधन की पवित्रता पर बल देते थे। अन्ना भी साधन की पवित्रता पर बल देते हैं। यही वजह है कि वे हमेशा शांतिपूर्वक धरना-प्रदर्शन और अनशन की वकालत करते हैं। अन्ना हजारे के आह्वान पर अबतक हुए धरने-प्रदर्शन में कहीं भी किसी तरह की हिंसा नहीं हुई है। यह इस बात का प्रमाण है कि वे साध्य की पूर्ति के लिए साधन में हिंसा का प्रयोग ठीक नहीं समझते।
दूसरी तरफ हमारे ईमानदार प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह लाल किले के प्राचीर से कहते हैं कि अनशन से भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा। तो कृपा करके प्रधानमंत्री हीं बताएं कि भ्रष्टाचार कैसे मिटेगा? वे तो यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार के पास कोई जादू की झड़ी नहीं है।
आखिर हमारे बेबस प्रधानमंत्री कर भी क्या सकते हैं? अब तक के अपने कार्यकाल में वे भ्रष्ट मंत्रियांे के ‘सरदार’ ही साबित हुए हैं। उनके मंत्रिमंडल के अधिकतर मंत्री भ्रष्टाचार के दलदल में धंसे हुए हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें इस बात (भ्रष्टाचार) की खबर नहीं। उन्हें खबर है लेकिन वे इसे जानबूझकर अनदेखा कर रहे हैं। सीएजी और पीएसी की रिपोर्ट भी इस बात की तस्दीक करती है कि इसके बारे में प्रधानमंत्री को पता था। लेकिन वे इसे राजनीति की मजबूरी बता रहे हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इतने पर भी भ्रष्ट मंत्रियों के ईमानदार प्रधानमंत्री अपने पद पर बने हुए हैं। यह भ्रष्टाचार उन्हें लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं दिखता लेकिन यदि कोई (अन्ना हजारे) भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए बनने वाले कानून (जनलोकपाल) के लिए शांतिपूर्वक अनशन करना चाहता है तो उन्हें इससे लोकतंत्र पर खतरा दिखता है।
प्रधानमंत्री कहते हैं कि अन्ना हजारे ने जो रास्ता अपनाया है उससे संसदीय लोकतंत्र को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। लेकिन मैं प्रधानमंत्री को यह कहना चाहता हूं कि हमारा संसदीय लोकतंत्र दुनिया का सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र है। इस तंत्र की जड़ें लोक में काफी गहरी हैं। धरना-प्रदर्शन और अनशन से लोकतंत्र को शक्ति मिलती है। भारत जैसे देश में शांतिपूर्वक धरने-प्रदर्शन और अनशन से लोकतंत्र को नई मजबूती मिलती है। अगर धरना-प्रदर्शन पुलिस के बताए नियम-कायदे से होगा तब वह लोकतंत्र नहीं तानाशाही होगी। मैं प्रधानमंत्री जी से पूछना चाहता हूं कि जब सरकार लोक की आवाज दबाने के लिए तंत्र (पुलिस-प्रशासन) का उपयोग करती है तो क्या यह लोकतंत्र की हत्या नहीं? क्या यह रास्ता लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं?

शुक्रवार, 5 जून 2009

जहां बसता है गांधी का भारत



हिवरे बाजार, न केवल गांधी के सपने को साकार करता है बल्कि घने अंधेरे में रोशनी की किरण भी दिखाता है। क्या वह दिन आएगा जब देश के सात लाख गांवों में हिवरे बाजार की तरह अपना ग्राम स्वराज होगा?
एक ऐसा गांव जिसपर व्यापक मंदी के इस दौर में का कोई असर नहीं है। एक ऐसा गांव जहां से अब कोई रोजगार के लिए पलायन नहीं करता। एक ऐसा गांव जहां पर शिक्षक स्कूल से गायब नहीं होते। एक ऐसा गांव जहां पर आंगनवाड़ी रोज खुलती है। एक ऐसा गांव जहां राशन की दुकान ग्राम सभा के निर्देशानुसार संचालित होती है। एक ऐसा गांव जहां की सड़कों पर गंदगी नहीं होती है। एक ऐसा गांव जिसे जल संरक्षण के लिए 2007 का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। इस गांव की सत्ता दिल्ली या बंबई में बैठी कोई सरकार नहीं बल्कि उसी गांव के लोगों द्वारा संचालित होती है। यह किसी यूटोपिया की बात नहीं है न ही कोई सपना है। यह सब साकार रूप ले चुका है, महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के गांव हिवरे बाजार में। दूसरे शब्दों में कहें तो हिवरे बाजार ग्राम स्वराज का प्रतिनिधि गांव तथा गांधी के सपनों का भारत है।
ऐसा नहीं है कि यह गांव हमेशा से ऐसा ही था। आज से 20 वर्ष पहले तक यह एक उजाड़ गांव था। न रोजगार का कोई साधन था न ही खेती के लिए उपजाऊ जमीन थी। इसलिए गांव में र्कोई रहना नहीं चाहता था। लेकिन 1989 में हिवरे बाजार के ही 30-40 पढ़े-लिखे नौजवानों ने यह बीड़ा उठाया कि क्यों न अपने गांव को संवारा जाए। पहले इस बारे में उन लोगों ने गांववालों से बातचीत की, तो कल के छोकरे कहकर बात को सिरे से नकार दिया गया। लेकिन युवकों ने हिम्मत न हारी और अपनी बात टिके रहे। फिर गांव वालों ने भी उनकी बातों को गंभीरता से लिया और 9 अगस्त,1989 को नवयुवकों को एक वर्ष के लिए गांव की सत्ता सौंपी गई। सत्ता मिली तो नवयुवकों ने अपनी कमान सौंपी पोपट राव पवार को। गौरतलब है कि पोपट राव पवार उस समय महाराष्ट्र की ओर से प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेलते थे।
नवयुवकों ने इस एक वर्ष को अवसर के रूप में देखा। गांव में पहली ग्रामसभा की गई और प्राथमिकताएं तय की गर्इं। बिजली, पानी के बाद बात शिक्षा की आई क्योंकि गांव में शिक्षा की स्थिति बहुत ही खराब थी। इतना ही नहीं विद्यालय के शिक्षक छात्रों से शराब मंगवाकर पीते थे। न तो खेल का मैदान था और न ही छात्रों के बैठने की व्यवस्था। ग्रामसभा में सबसे पहले युवकों ने गांववालों से अपील की कि वे अपनी बंजर पड़ी जमीन को विद्यालय के लिए दान में दें। पहले सिर्फ दो ही परिवार जमीन देने के लिए तैयार हुए लेकिन बाद कई लोग आगे आ गए। विद्यालय में एक अतिरिक्त कमरे के निर्माण के लिए सरकार से स्वीकृत 60,000 रुपए की राशि आई। गांववालों के श्रमदान और राशि के उचित नियोजन की बदौलत विद्यालय में दो कमरों का निर्माण किया गया। युवकों का यह कार्य गांववालों में विश्वास भरने के लिए काफी था।
एक वर्ष की तय समय सीमा खत्म हुई। नवयुवकों के कार्यों की समीक्षा हुई। गांववालों ने अब इन नवयुवकों को पांच वर्षों के लिए गांव की सत्ता सौंपने का निश्चय किया। अब पोपट राव पवार के कुशल नेतृत्व में युवकों ने गांव की आधारभूमि तैयार करना शुरू किया । गांव में खेतीबारी की व्यवस्था ठीक नहीं थी और न ही रोजगार की। जिसके चलते प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय 800 रुपए थी। गांव में जिन लोगों के पास जमीन थी, वे भी केवल एक ही फसल उगा पाते थे क्योंकि सिंचाई के लिए पानी का नितांत अभाव था। गांव में कुल मिलाकर 400 मि.मी. ही वर्षा होती थी। पोपट राव का कहना है कि हमलोगों ने सामूहिक रूप से इस विषय पर सोचना शुरू किया। पहले गांववाले वन विभाग द्वारा लगाए पौधों को काट कर अपने घर ले जाते थे। लेकिन जब ग्रामसभा ने तय किया कि जल, जंगल और जमीन के काम किए जाएंगे तो गांववालों ने 10 लाख पेड़ लगाए, जिसमें हमें 99 फीसदी सफलता प्राप्त हुई। अब इस जंगल में जाने के लिए वन विभाग को ग्रामसभा की अनुमति लेनी पड़ती है। पोपट राव के अनुसार 'शुरू में ग्रामसभा के कई निर्णयों का बहुत विरोध हुआ। लेकिन हमने जोर देकर कहा कि गांव के हित में यह निर्णय ठीक होगा और इसके दूरगामी परिणाम सामने आएंगे। जैसे कि टयूबवेलकृका कृषि में उपयोग नहीं किया जाएगा और ज्यादा पानी वाली फसलें नहीं लगाई जाएंगी। गन्ना केवल आधे एकड़ में ही लगाया जाएगा, जिसका हरे चारे के रूप में उपयोग किया जा सकता है। हम सबने मिलकर जलग्रहण के क्षेत्र में काम करनाष्शुरू किया। कुछ सरकारी राशि और कुछ श्रमदान। इसके परिणामस्वरूप तीन चार वर्षों में वॉटरष्शेड ने अपना असर दिखानाष्शुरू किया। गांव का भू-जल स्तर बढ़ा और मिट्टी में नमी बढ़ने लगी। लोग अब दूसरी और तीसरी फसल भी उगा रहे हैं। अब यहां सब्जी भी उगाई जाती है। इतना ही नहीं भूमिहीनों को गांव में ही काम मिलने लगा है और लोगों का पलायन भी बंद हो गया है।' गांव की ही मजदूर ताराबाई मारुति कहती है कि 'पहले हमलोग मजदूरी करने दूसरे गांव जाते थे। आज हमारे पास 16-17 गायें हैं और हम 250-300 लीटर दूध प्रतिदिन बेचते हैं। कुल मिलाकर पूरे गांव से लगभग 5000 लीटर दूध प्रतिदिन बेचा जाता है। आज गांव की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 800 रुपए से बढ़कर 28000 रुपए हो गई है। यानी पांच व्यक्तियों के परिवार की वार्षिक औसत आय 1.25 लाख रुपए है।
पूरे देश में आंगनवाड़ियों का जो हाल है, वह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन हिवरे बाजार की आंगनवाड़ी लगभग आधे एकड़ में फैली है। आंगनवाड़ी की दीवारें बोलती प्रतीत होती हैं। इसके आंगन में फिसल पट्टी लगी है। पर्याप्त खेल-खिलौने हैं। प्रत्येक बच्चे के लिए पोषाहार हेतु अलग-अलग बर्तन व स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था है। बच्चों का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण होता है। बच्चे कुपोषित नहीं हैं। गांववाले जानते हैं कि बच्चोें का मानसिक औरष्शारीरिक विकास 6 वर्ष की उम्र में ही होता है, इसलिए उनका मानना है कि आंगनवाड़ी बेहतर होनी चाहिए। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ईराबाई मारुति का कहना है कि जब इन बच्चों की जिम्मेवारी मेरे उपर है तो फिर मैं अपनी जिम्मेदारी से क्यों कतराऊं। अगर मैं कुछ भी गड़बड़ करती हूं तो मुझे ग्रामसभा में जवाब देना होता है। साथ ही वह बड़े गर्व से कहती है कि मेरी आंगनवाड़ी को केंद्र सरकार से सर्वश्रेष्ठ आंगनवाड़ी का पुरस्कार मिला है।
पोपट राव बताते हैं कि हमारे गांव में पहले से ही दो आंगनवाड़ी थी और ऊपर से तीसरी आंगनवाड़ी बनाने का आर्डर आया। हम लोगों ने ग्रामसभा में विचार किया कि हमारे यहां बच्चों कीे संख्या उतनी नहीं है कि तीसरी आंगनवाड़ी होनी चाहिए। फिर नए आंगनवाड़ी के लिए और अधिक संसाधन भी चाहिए। इसलिए हमने शासन को पत्र लिख कर तीसरी आंगनवाड़ीके प्रस्ताव को वापस लौटा दिया। इतना ही नहीं पहले बच्चों को पांचवीं के बाद से ही बाहर जाना पड़ता था, जिससे अधिकांश लड़कियां नहीं पढ़ पाती थीं। अब स्कूल हायर सेकेंड्री तक हो गया है। विद्यालय का समयष्शासन नहीं बल्कि ग्रामसभा तय करती है । विद्यालय में दोपहर का भोजन नियमित रूप से दिया जाता है। शिक्षिका शोभा थांगे का कहना है कि हम लोग ग्रीष्मकालीन अवकाश मेंभभी पढ़ाने आते हैं । यहां पढ़ाई किसी अच्छे प्राइवेट स्कूल से बेहतर होती है। यही कारण है कि आज हिवरे बाजार के ंविद्यालय में आसपास के गांव और शहरों से लगभग 40 प्रतिशत छात्र-छात्राएं पढ़ने आते हैं। गांव के सरपंच पोपट राव के अनुसार हमारे यहां शिक्षकों का ग्रामसभा में आना जरूरी है लेकिन चुनाव डयूटी में जाने की आवश्यकता नहीं है। हिवरे बाजार गांव में एएनएम आती नहीं है बल्कि यहीं रहती हैं। गांव के हर बच्चे का समय पर टीकाकरण होता है। प्रत्येक गर्भवती महिला को आयरन की गोलियां मुफ्त मिलती हैं।
गांव में राशन ग्रामसभा के निर्देशानुसार सबसे पहले प्रत्येक कार्डधारी को दिया जाता है। यदि उसके बाद भी राशन बच जाता है तो ग्रामसभा तय करती है कि इसका क्या होगा। राशन दुकान संचालक आबादास थांगे बहुत ही बेबाक तरीके से कहते हैं कि मुझे फूड इंस्पेक्टर को रिश्वत नहीं देनी होती है। पोपट राव कहते हैं कि अब बाहरी लोगों की नजर हमारी जमीन पर है। इसलिए हमने नियम बनाया कि हमारी जमीन गांव से बाहर के किसी व्यक्ति को नहीं बेची जाएगी। क्योंकि इससे गरीब हमेशा गरीब रहेगा और अमीर और अमीर हो जाएगा। इस गांव की खास बात यह है कि यहां एकमात्र मुसलिम परिवार के लिए भी मसजिद है, जिसे ग्रामसभा ने ही बनवाया है। सारे फैसले ग्राम संसद द्वारा लिए जाते हैं। इस ग्राम संसद की बनावट भी दिल्ली के संसद भवन की तरह है। सूचना के अधिकार जैसे कानूनों की यहां जरूरत ही महसूस नहीं होती। यहां पंचायत भवन में प्रतिमाह पैसों का पूरा लेखा-जोखा लिखकर टांग दिया जाता है। इतना ही नहीं साल के अंत में ग्रामसभा का पूरा ब्योरा गांववालों के सामने और बाहरी लोगों को बुलाकर बताया जाता है।
एक समय था जब इस गांव के नवयुवक यह बताने से डरते थे कि हम हिवरे बाजार के निवासी हैं। आज इस गांव के लोग गर्व से कहते हैं कि हम हिवरे बाजार के निवासी हैं। बाला साहेब रमेश ने तो अपने नाम के आगे 'हिवरे बाजार' लगा लिया है। आज इस गांव में न कोई शराब पीता है और ना ही यहां शराब बिकती है। हिवरे बाजार, न केवल गांधी के सपने को साकार करता है बल्कि घने अंधेरे में रोशनी की किरण भी दिखाता है। क्या वह दिन आयेगा जब देश के सात लाख गांवों में हिवरे बाजार की तरह अपना ग्राम स्वराज होगा?

बुधवार, 3 जून 2009

नहीं चला सिख फैक्टर

नहीं चला सिख फैक्टर
संजीव कुमार
इस बात में कोई दम नहीं है कि पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में कांग्रेस की जीत में सिख मतदाताओं का हाथ है। और न ही यह कहना सही होगा कि मनमोहन सिंह सिख मतदाताओं को रिझाने में कामयाब हुए हैं
लोकसभा चुनाव में जिस तरह कांग्रेस पार्टी को अकेले 206 सीटों पर विजय मिली है, उसे कुछ लोग राहुल का जादू तो कुछ लोग प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का चमत्कार मान रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक शायद पिछले विधानसभा चुनावोेंं में राहुल के रोड शो के बावजूद कांग्रेस पार्टी की हार के सिलसिले को भूल गए हैं। अब जहां तक बात प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के चमत्कार की है, तो इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि मनमोहन सिंह एक स्वच्छ छवि के नेता हैं। इसलिए पूरे देश की जनता उनका आदर और सम्मान करती है। कांग्रेस पार्टी ने चुनाव से पहले जिस तरह मनमोहन सिंह को दुबारा प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा की, इसे निश्चय ही पार्टी और सोनिया गांधी की दूरदर्शी सोच का परिणाम कहा जा सकता है। इस घोषणा से कांग्रेस के कुछ वोट अवश्य ही बढ़े हाेंगे, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन कुछ राजनीतिक पंडितों का मानना है कि कांग्रेस पार्टी को पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सिख होने के कारण जीत मिली है। हालांकि इन राज्यों में सिख फैक्टर उतना कामयाब नहीं रहा जितना कि राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं।
पंजाब, मनमोहन सिंह का गृह राज्य है। साथ ही देश का एकमात्र सिख बहुल प्रदेश है। लेकिन प्रदेश में कांग्रेस इस तथ्य को भुनाने में विफल रही कि मनमोहन सिंह देश के पहले सिख प्रधानमंत्री हैं। प्रदेश कांग्रेस ने भी इसके बजाय चुनाव में राज्य के स्थानीय मुद्दों को ही प्राथमिकता दी। एक वरिष्ठ कांग्रेसी विधायक ने नाम न लेने की शर्त पर कहा ''इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे सिख हैं और उनकी जड़ें पंजाब में हैं लेकिन उन्होंने पंजाब में कोई राजनीति नहीं की है। यद्यपि सिख समुदाय यह मान रहा था कि कांग्रेस ने एक सिख को पहली बार देश का प्रधानमंत्री बनाया और दूसरी बार भी बनाने को इच्छुक है। इसके बावजूद सिख समुदाय के एक छोटे वर्ग ने ही इस वजह से वोट दिया।
उनके मुताबिक, 'राज्य में शिरोमणी अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी सरकार के कुशासन से जुड़े कई मुद्दे थे।' पंजाब में कांग्रेस की जीत की वजह यही है। प्रदेश के एक किसान जसवंत सिंह ने कहा कि मनमोहन सिंह एक प्रसिध्द व्यक्ति हैं। प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने अच्छा काम भी किया है, लेकिन पंजाब के लोग स्थानीय मुद्दों के बारे में सोचते हैं। अगर इनकी बात पर यकीन करें तो पंजाब में कांग्रेस की जीत और अकाली दल की हार में मनमोहन सिंह के सिख फैक्टर की जगह एंटी-इनकमबेंसी प्रमुख कारण रहा है। पंजाब में अकाली दल और भाजपा गठबंधन ने कांग्रेस के आठ सीटों की तुलना में पांच सीटें पाई हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में राज्य की 13 में से 11 सीटों पर अकाली दल-भाजपा गठबंधन का कब्जा था। गौरतलब है कि तब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। वैसे भी इस बार यह कोई नहीं मान रहा था कि अकाली दल-भाजपा गठबंधन को 11 सीटें मिलेंगी। हुआ भी वही। गठबंधन को यहां 6 सीटों का नुकसान हुआ है। गठबंधन के हार का एक अन्य कारण यह भी रहा कि अकाली दल और भाजपा गठबंधन ने इस लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारों का चयन ठीक तरीके से नहीं किया। इसके अलावा अकाली दल और भाजपा की आपसी कलह भी इस पराजय का कारण बनी। अगर अकाली दल और भाजपा आपसी मनमुटाव को भूलकर एकजुटता से चुनाव लड़ते और सही उम्मीदवारों का चयन करते तो चुनाव परिणाम उनके पक्ष में भी जा सकते थे। इसके अलावा 84 के सिख दंगे के आरोपी कांग्रेस नेता जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को टिकट दिए जाने और सीबीआई की ओर से उन्हें क्लीन चिट देने पर सिख समुदाय के बीच उभरे आक्रोश का भी अकाली दल और भाजपा फायदा नहीं उठा सके। हालांकि कांग्रेस पार्टी ने सिख समुदाय के विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए इन दोनों नेताओं का टिकट वापस ले लिया था।
हरियाणा में कांग्रेस की विजय का प्रमुख कारण भूपेंद्र सिंह हुड्डा द्वारा किया गया विकास कार्य रहा। इसके अलावा उनकी विनम्रता और स्वच्छ छवि ओमप्रकाश चौटाला की इनेलो और भाजपा पर भारी पड़ी। वैसे हरियाण्ाा प्रदेश कांग्रेस के विधायकों और मंत्रियों में भी आपसी फूट थी, लेकिन इनेलो और भाजपा इसका कोई फायदा नहीं उठा सके। साथ ही यहां भाजपा-इनेलो गठबंधन एंटी-इनकमबेंसी फैक्टर को भी अपने पक्ष में नहीं भुना सका। कांग्रेस को वैसे तो नौ सीटें मिलीं लेकिन हुड्डा अंबाला, भिवानी, महेंद्रगढ़, गुड़गांव और फरीदाबाद की पांच संसदीय सीटों से अपने विधायकों-मंत्रियों के भितरघात के बावजूद पार्टी उम्मीदवारों को जिताने में कामयाब रहे।
हरियाणा जाट बहुल राज्य है। यहां सिख मतदाता दो प्रतिशत के आस-पास हैं। यह संख्या चुनाव में कुछ ज्यादा उलट-फेर नहीं कर सकती। फिर भी सिख समुदाय का एक वर्ग मनमोहन सिंह के नाम पर कांग्रेस के पक्ष में गया इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता। लोकसभा चुनाव के बाबत हरियाणा प्रदेश कांग्रेस के एक विधायक का कहना था कि हरियाणा में कांग्रेस की जीत विकास की जीत है। दस में से नौ सीटों पर कांग्रेस को जीत दिलाकर जनता ने मुख्यमंत्री हुड्डा और प्रदेश कांग्रेस के हाथ मजबूत किए हैं। एक सरकारी कर्मचारी सुरेश सिंह का भी कहना है कि हरियाणा में कांग्रेस की जीत हुड्डा द्वारा किए गए विकास कार्यों की जीत है।
जहां तक दिल्ली में कांग्रेस की जीत का सवाल है तो यहां पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में मिली विजय से कार्यकर्ताओं के मनोबल ऊंचे थे। दूसरे दिल्ली के अधिकतर मतदाता के लिए असली मुद्दा विकास का था। इस मापदंड पर कांग्रेस पार्टी लोगों को खरी उतरती दी। इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने विकास और निर्माण के मुद्दे पर ही वोट मांगा था। दूसरे चुनाव से पहले मनमोहन सिंह को दुबारा प्रधानमंत्री बनाने का भी वायदा किया गया था। इन दोनों ही बातों से दिल्ली की मतदाता को अपना निर्णय लेने में सुविधा हुई।
दूसरी तरफ भाजपा ने विधानसभा चुनाव के बाद यह जानते हुए कि पांच महीने बाद लोकसभा चुनाव होने हैं, डॉ. हर्षवर्धन को हटाकर ओ.पी. कोहली को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। हर्षवर्धन को हटाने से प्रदेश कार्यकर्ताओं में गलत संदेश गया। वहीं ओ.पी. कोहली को प्रदेश में भाजपा का हाथ मजबूत करने के लिए अभी वक्त चाहिए था। जो इस चुनाव में उनके पास नहीं था। विजय कुमार मल्होत्रा को केंद्र से हटाकर राज्य में लाने का भी भाजपा को कोई विशेष फायदा नहीं हुआ। अगर इस लोकसभा चुनाव में विजय कुमार मल्होत्रा नई दिल्ली से चुनाव लड़ते तो कम से कम एक सीट तो भाजपा को मिल ही सकती थी। वहीं साहिब सिंह वर्मा के पुत्र प्रवेश वर्मा को न विधानसभा चुनाव न ही लोकसभा चुनाव में टिकट दिए जाने से जाट मतदाता भी भाजपा के विरोध में चला गया। इसके अलावा भाजपा द्वारा सही उम्मीदवारों का चयन न कर पाना भी उसकी हार का कारण बना। दिल्ली में पूर्वांचली मतदाताओं की संख्या बढ़ी है। कांग्रेस पार्टी ने इस बात का ध्यान रखते हुए पूर्वांचल के महाबल मिश्रा को टिकट दिया था। लेकिन भाजपा ने पूर्वांचलियों को टिकट नहीं दिया। कांग्रेस पार्टी का विधानसभा चुनाव में जहां जीत का अंतर काफी कम था, भाजपा की इन कारगुजारियों के चलते उसका इस लोकसभा चुनाव में जीत का अंतर अधिक हो गया।
जहां तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सिख वोटरों के संबंध का सवाल है तो अधिकतर सिख मतदाता चुनाव से ठीक पहले सीबीआई द्वारा 84 के सिख विरोधी दंगे के आरोपी जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को क्लीन चिट दिए जाने से नाराज थे। लेकिन दिल्ली प्रदेश भाजपा इसको ठीक से भुना नहीं सकी। परिसीमन ने दिल्ली की सातों सीटों का भूगोल भी बदला है जिस कारण सातों सीटों चांदनी चौक, उत्तरी-पूर्वी दिल्ली, पूर्वी दिल्ली, नई दिल्ली, उत्तरी-पश्चिमी दिल्ली, पश्चिमी दिल्ली और दक्षिणी दिल्ली में सिख मतदाताओं का प्रतिशत क्रमश: 3.94 प्रतिशत, 1.20 प्रतिशत, 3 प्रतिशत, 4 प्रतिशत, 2 प्रतिशत, 9 प्रतिशत और 2 प्रतिशत हो गया है। सिर्फ पश्चिमी दिल्ली ही एक ऐसा संसदीय क्षेत्र है, जहां सिख मतदाताओं का महत्व है। लेकिन इसमें से कितने मत मनमोहन सिंह के कारण कांग्रेस के पाले में गए हाेंगे कहना मुश्किल है।
लेकिन जो लोग यह मानते हैं कि कांग्रेस की इस विजय में मनमोहन सिंह सूत्रधार बने हैं उनके लिए पंजाब के तथ्य काफी अहम हैं क्योंकि यहां वे सभी कांग्रेसी उम्मीदवार हार गए जिन्होंने अपने क्षेत्र में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सभा रखी थी। यह महज एक संयोग भी हो सकता है लेकिन एक तथ्य तो है ही। इस बात में कोई दम नहीं है कि पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में कांग्रेस की जीत में सिख मतदाताओं का हाथ है। और न ही यह कहना सही होगा कि मनमोहन सिंह सिख मतदाताओं को रिझाने में कामयाब हुए हैं।

मंगलवार, 20 जनवरी 2009

जनरल एस. के. सिन्हा से संजीव कुमार की बातचीत


कमजोर हुए हैं अलगााववादी तत्व
हाल ही में हुए जम्मू-कश्मीर चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस की जीत, पीडीपी की हार और अमरनाथ श्राइन बोर्ड की जमीन आदि को लेकर जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल रहे जनरल एस. के. सिन्हा से हमारे संवाददाता संजीव कुमार ने लंबी बातचीत की। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश-
जम्मू-कश्मीर में हुए पिछले चुनावों और इस चुनाव में मूलभूत अंतर क्या है?
सबसे बड़ी बात यह है कि इस चुनाव ने निश्चित कर दिया है कि जो अलगाववादी तत्व हैं, उनके लिए यह चुनाव उतना अनुकरणगामी नहीं रहा है। अभी तक लोग समझते थे कि वे कश्मीर की जनता के प्रवक्ता हैं। लेकिन इस बार के चुनाव ने यह साबित कर दिया कि उनके बॉयकॉट कॉल देने के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में लोगों ने वोट डाले। उनका कहना है कि कश्मीर का यह चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़ा गया है, मसलन सड़क, बिजली, पानी वगैरह। कश्मीर के केंद्रीय मुद्दे से इस चुनाव का कोई मतलब नहीं था, मैं इसको नहीं मानता। फिर भी यदि इस बात को मान भी लें तो यह चुनाव एक बात सिध्द करता है कि अलगाववादियों का अनुकरण इस चुनाव में नहीं किया गया, क्योंकि उन्होंने जब बॉयकॉट कॉल दिया तो लोगों ने उनके बॉयकॉट कॉल को बॉयकॉट कर दिया। उनके लिए यह चुनाव एक तरह से बहुत बड़ी हार है। उदाहरण के लिए, 1983 में असम में छात्र आंदोलन के समय बॉयकॉट कॉल दिया गया था, उस समय वोटर टर्नआउट केवल तीन प्रतिशत देखने को मिला था, तो उससे पता चलता है कि लोगों ने बॉयकॉट कॉल को कितना महत्व दिया था।
कश्मीर में अलगाववादियाें के बॉयकॉट कॉल के बावजूद 62 प्रतिशत मतदान हो जाता है, जो राष्ट्रीय औसत मतदान से भी ज्यादा है, तो इससे अलगावी तत्वों का कश्मीर में भंडाफोड़ होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो अलगाववादी तत्व जम्मू-कश्मीर में कमजोर हुए हैं। दूसरी बात जो इस चुनाव से स्पष्ट होती है, वह यह है कि जो वहां के शांत और आम नागरिक हैं, जिनकी आवाज को दबाया गया था, आतंकवादियों के डर से और फिर अमरनाथ विवाद को उठा करके उन्हें गुमराह किया गया था। वही आम नागरिक आज न उस बहकावे में हैं और न ही उस दबाव में। उन्होंने खुलकर बिना डर के, बॉयकॉट कॉल और खराब मौसम के बावजूद अधिक से अधिाक संख्या में वोट डाले।
कश्मीर में अपने कार्यकाल के अनुभवों के बारे में बताएं?
जब मैंने वहां 2003 में राज्यपाल का कार्यभार संभाला था, पहले दिन से मेरा प्रयास था कि लोगों में आपसी भाईचारे और कश्मीरियत को बढ़ावा दिया जाए। जनता की सेवा की जाए और उनकी मांगों को पूरा किया जाए, ताकि उनमें हमारे लोकतंत्र के प्रति आस्था और विश्वास पैदा हो। मेरा लक्ष्य था कि 2008 का चुनाव 2002 से भी बेहतर हो। 2002 में अंतरराष्ट्रीय मीडिया कश्मीर के चुनाव में गया था। इस बार मैं चाहता था कि अंतरराष्ट्रीय डिप्लोमैटिक कम्युनिटी भी आकर चुनाव को देखे और दुनिया को मालूम हो कि यहां की आम जनता का झुकाव किस तरफ है। क्योंकि, मुझे कश्मीरियत फैलाने में काफी सफलता मिली थी। इसलिए अलगाववादी और राष्ट्रविरोधी लोगों ने एक बेमतलब की बात उठाई। मेरे विचार से अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन का मामला बेमतलब की ही बात है, क्योंकि ऐसा वर्षों से होता रहा है कि भिन्न-भिन्न एजेंसियों को फॉरेस्ट लैंड राज्य सरकार देती रहती है। जिस दिन अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन दी गई है, उसी दिन पांच अन्य एजेंसियों को भी जमीन दी गई। और इसे सर्वमत और जनमत के आधार पर राज्य मंत्रिमंडल द्वारा दिया था। पीडब्ल्यूडी को रोड बनाने के लिए, पॉवर कॉरपोरेशन को हाइडल प्रोजेक्ट बनाने के लिए जमीन दी गई। इससे पहले रिलायंस और एयरटेल, जो प्राइवेट कंपनियां हैं, उनको भी जमीन दी गई कम्युनिकेशन टॉवर बिठाने के लिए। यदि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को 100 एकड़ जमीन दी गई है, तो इसमें क्या खराबी है। आप कह सकते हैं कि यह एक धार्मिक संस्था है। लेकिन सरकार ने धार्मिक संस्थओं को भी इससे पहले जमीन दी है। राजौरी में औकॉफ बोर्ड को, अनंतनाग में इस्लामिक युनिवर्सिटी बनाने के लिए, जम्मू में माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड को जमीन दी गई।
यह सब देखते हुए अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन का विरोध करने का प्रश्न ही नहीं उठता। और तारीफ यह है कि जो लोग विरोध कर रहे थे, उन्होंने यहां तक कहना शुरू कर दिया था कि यहां हिंदुओं को लाकर बसाया जाएगा और जो घाटी की आबादी है, उसे बदल दिया जाएगा। इससे बढ़कर विडंबनात्मक बात और क्या हो सकती है कि जब चार लाख कश्मीरी पंडित वापस नहीं जा रहे हैं और नहीं जाने दिया जा रहा है, तो सौ एकड़ में जो लोग आएंगे वे वहां कैसे रहेंगे और वहां की आबादी को बदल देंगे? और वह भी ऐसी जमीन पर, जहां आठ महीने तक कोई जा ही नहीं सकता। वैसे भी इस जमीन को कोई इस्तेमाल नहीं कर रहा था। वर्षों से अमरनाथ श्राइन बोर्ड इस जमीन पर यात्रियों के लिए कैंप लगाता था।
गौरतलब है कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जो जमीन ट्रांसफर की गई है, उसके दस्तावेज में यह स्पष्ट लिखा है कि जमीन राज्य सरकार की रहेगी, जमीन श्राइन बोर्ड की नहीं होगी। श्राइन बोर्ड सिर्फ इस जमीन का इस्तेमाल करेगी और वह भी सिर्फ अमरनाथ यात्रियों के अस्थायी ठहरने के लिए। लेकिन इसके बावजूद इसी पर इतना हंगामा हुआ। आज हम समझते हैं कि जिस तरह से वहां वोटर टर्नआउट बढ़ा है। उससे लगता है कि लोगों को यह जानकारी हुई कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड के नाम पर जो हंगामा हुआ, वह बेमतलब का था। केवल यही नहीं, काफी वक्तव्य भी आ रहे हैं। राज्य सभा सदस्य मौलाना सईद असद मदनी, जो देवबंद से छह सौ मौलानाओं को लेकर हैदराबाद गए थे। उन्होंने कहा कि इस जमीन को अमरनाथ श्राइन बोर्ड को देने में किसी भी मुसलमान को कोई आपत्तिा नहीं थीं। कुछ राजनेताओं ने इसे राजनैतिक मामला बना करके लोगों के द्वारा इसका विरोध करवाया। अब लोगों ने यह महसूस करना शुरू कर दिया है। यह वोटर टर्नआउट उसी का प्रतिफल है।
विधानसभा के ताजा नतीजे से पाकिस्तान समर्थित ताकतों पर क्या असर पड़ेगा?
उनका तो काम ही है अलगाव फैलाना और विरोध करना। वे वही करते रहेंगे। और मेरी मान्यता है कि जो वहां मुफ्ती मुहम्मद सईद की पार्टी पीडीपी है, वह शुरू से ही सांप्रदायिक और राष्ट्रविरोधी रही है और यह बहुत सौभाग्य की बात है कि वह वर्तमान सरकार में नहीं है। लेकिन फिर भी उन्हें काफी वोट मिले हैं। उन्होंने इस बार 21 सीटें पाई हैं। लेकिन जो नई सरकार उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में बनी है वह निश्चय ही वहां सुधार लाएगी, क्योंकि वे राष्ट्रवादी हैं।
क्या लोगों ने उनका कहना नहीं माना या लोगों का इरादा देखकर उन्होंने अपना इरादा बदल लिया?
इरादा तो नहीं बदला। देखिए आज भी केंद्र सरकार ने आतंकवादियों को लेकर जो नया कानून बनाया है, महबूबा मुफ्ती ने ऐलान कर दिया है कि उसे वह कश्मीर में नहीं लागू होने देंगी। इससे पता चलता है कि उनका इरादा नहीं बदला है। इसी प्रकार वह हर तरह की बयान देती रहती हैं। कभी कहती हैं कि जम्मू-कश्मीर में सिर्फ कश्मीरी मुसलमान ही मुख्यमंत्री हो सकता है। यहां तक कि जम्मू का मुसलमान भी उनकी नजर में कश्मीर का मुख्यमंत्री नहीं हो सकता, जबकि भारत में हमने अनेकों मुसलमान मुख्यमंत्री बनाए हैं। बिहार में अब्दुल गफूर, महाराष्ट्र में अंतुले, राजस्थान में बरकतउल्ला खान इत्यादि; जबकि इन राज्यों में मुसलमान 10-12 प्रतिशत ही थे। कश्मीर में हिंदुओं की संख्या 30 प्रतिशत से ज्यादा है। यह उनके दृष्टिकोण को ही बताता है।
पाकिस्तान समर्थित जो ताकतें हैं, अब उनकी रणनीति क्या होगी?
उनकी नीति पहले की ही तरह होगी। आप कश्मीर के अखबार पढ़ें, तो पाण्ंगे कि मुंबई में जो हादसा हुआ, उस पर उनके बयान और संपादकीय आ रहे हैं। कहने का अर्थ यह है कि वे वही कह रहे हैं, जो पाकिस्तान कह रहा है।
क्या अब यह माना जाए कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल होगी या पहले की तरह ही विशेष राज्य का दर्जा उसका बना रहेगा?
यह तो कहना मुश्किल है। यह दिल्ली में जो हमारी सरकार है, उस पर निर्भर करता है। दिल्ली की सरकार अभी तक वोट की राजनीति में ही लगी हुई है। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि इस देश पर पहला हक मुसलमानों का है। अगर वे कहते कि इस देश के संसाधनों पर पहला हक गरीबों, मजलूमों और पिछड़े वर्ग का है, तो किसी को भी कोई दिक्कत नहीं होती। अगर इस तरह की सरकार रहेगी तो कश्मीर पहले की तरह ही विशेष राज्य का दर्जा पाए रहेगा। अभी चुनाव हो रहा है। मैं आशा करता हूं कि ऐसी सरकार बने, जो कि भारत के हित और भारत की सुरक्षा को प्राथमिकता दे और वोटों को ख्याल से न चले, तो हो सकता है कि कश्मीर भी हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बन जाए।
कश्मीर में पहले भी गठबंधन सरकारें बनती रही हैं। पहले और इस बार की गठबंधन सरकार में क्या अंतर है?
सबसे बड़ा अंतर यह है कि पीडीपी इस बार सरकार में नहीं है। कांग्रेस पहले भी सरकार में रही है और इस बार भी है। पीडीपी का कांग्रेस से बराबर सांठगांठ रहा है, लेकिन जब कांग्रेस पार्टी के सदस्य की मुख्यमंत्री बनने की बारी आई तो पीडीपी ने मंत्रिमंडल में रहते हुए कांग्रेस की पीठ में छुरा भोंका और विरोध किया। उनकी मांग थी कि सेना को कश्मीर से हटाओ। इसे पूरा न करने की स्थिति में हम सरकार चलने नहीं देंगे। पीडीपी मंत्रियों ने मंत्रिमंडल का बॉयकॉट किया। क्या यह काम राष्ट्रविरोधी नहीं है। उनकी मांग थी कि कश्मीर में डूएल करेंसी हो और कश्मीर पाकिस्तान और भारत के साझा नियंत्रण में हो। वे इस तरह की राष्ट्र विरोधी बातें करते रहते थे। ऐसे में गठबंधन सरकार चलना मुश्किल था। अभी जो नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस पार्टी की गठबंधन सरकार है, इनमें मतभेद कुछ मुद्दों पर हो सकता है, लेकिन मूल बात, जो भारत के संविधान की है, उससे बाहर दोनों में से कोई भी पार्टी जाना नहीं चाहती। तो ऐसे में यह गठबंधन पुराने गठबंधन की तुलना में बेहतर तरीके से कार्य कर सकता है।
अपने अनुभवों के अधार पर नए मुख्यमंत्री को क्या सलाह देंगे?
कश्मीर का मसला सुलझाने के लिए उमर अब्दुल्ला को मेरी सलाह है कि कश्मीर का मसला तभी सुलझेगा जब मामला कश्मीर केंद्रित न होकर, जम्मू-कश्मीर केंद्रित होगा। मेरे कहने का मतलब है कि ऐसा शासन हो, ऐसा प्रयास हो उमर अब्दुला की सरकार का, जिसमें सभी क्षेत्रों के हितों का पूरा ख्याल रखा जाए और उन्हें साथ लेकर चला जाए। न कि बात केवल कश्मीर पर केंद्रित हो। मोटे तौर पर नेशनल कांफ्रेंस का जो एजेंडा है, वे उसी पर चलेंगे। और जहां तक उनकी योग्यता का प्रश्न है, तो उम्र भले ही उनकी कम है, लेकिन इतने कम उम्र में भी उन्हें काफी अनुभव प्राप्त हुआ है। वे बहुत दिनों तक सांसद मंत्री रहे हैं। हम उम्मीद करते हैं कि वे इंग्लैंड के प्रधानमंत्री ब्रैड पीट की तरह बहुत ही सफल मुख्यमंत्री साबित होंगे।

एवार्ड के पास अतीत का गौरव तो है

एवार्ड के पास अतीत का गौरव तो है
संजीव कुमार
पिछले पचास वर्षों में भारत के पुनर्निर्माण और ग्रामीण विकास में एवार्ड का योगदान ऐतिहासिक रहा है। इससे कमला देवी, जयप्रकाश नारायण, अन्ना साहब सहस्रबुध्दे, एल. सी. जैन और धर्मपाल जी जैसे गांधीवादी-समाजवादियों का नाम भी जुड़ा रहा है, लेकिन पिछले कुछ दिनों से इस संस्था का प्रखर नेतृत्व जैसे खो-सा गया है
1956 में दिल्ली में ग्रामीण विकास विषय पर एक राष्ट्रीय स्तर का परिसंवाद हुआ था, जिसमें उस समय ग्रामीण विकास के लिए कार्य करने वाली लगभग 40-50 गैर-सरकारी संस्थाओं ने भाग लिया था। उस बैठक में अन्य बातों के अलावा यह महसूस किया गया कि ग्रामीण विकास का काम करने वाली संस्थाओं का राष्ट्रीय स्तर पर अपना संगठन नहीं है। उसी परिसंवाद में लोगों ने यह तय किया कि एक संगठन बनाया जाए और उसके लिए एक समिति बना दी। लेकिन एवार्ड की स्थापना होने में दो सालों का समय लग गया। संस्था का नाम रखा गया 'एसोसिएशन ऑफ वॉलेंटरी एक्शन फॉर रूरल डेवलपमेंट' (एवार्ड) अर्थात ग्रामीण विकास के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं का संगठन। संस्था का हिंदी नामकरण 'ग्राम सेवा संगम' नाम से किया गया। वैसे इसका हिंदी नाम बहुत प्रचलित नहीं है। इसके संस्थापकों में बड़े-बड़े नेता थे। इस संस्था की संस्थापक अधयक्ष कमला देवी चट्टोपाधयाय, जो कर्नाटक की थीं, जयप्रकाश नारायण जैसे ही तेवर वाली महिला थीं। 1958-60 तक कमला देवी संस्था की अधयक्ष रहीं और उनके साथ धर्मपाल जी (58-66) तक पहले महामंत्री थे। उसके बाद 60 से 79 तक जयप्रकाश जी जीवन पर्यंत अधयक्ष रहे। इस बीच बार-बार चुनाव हुआ, लेकिन सर्वसम्मति से उन्हें ही चुना जाता था। इस संस्था से जुड़े तीसरे महत्वपूर्ण व्यक्ति एल.सी. जैन थे, जो अभी भी जीवित हैं। इनके साथ चौथे महत्वपूर्ण व्यक्ति अन्ना साहब सहस्रबुध्दे थे। पहले 58-64 तक एल.सी. जैन कोषाधयक्ष थे, बाद में धर्मपाल जी के बाद वे महामंत्री बने। सन् 66 से 70 तक अन्ना साहब सहस्रबुध्दे महामंत्री रहे। वे गांधीजी के बाद दूसरे कतार के महत्वपूर्ण नेता थे। उसके बाद 70-80 तक अमरेश चंद्र सेन महामंत्री हुए। ये सभी लोग स्वतंत्रता सेनानी और राष्ट्रीय स्तर के नेता होते हुए भी वैसी विभूति थे, जिन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा।
1947 के बाद गांधीजी के साथियों में दो ग्रुप हो गए। बड़ा वाला ग्रुप सत्ताालोलुप हो गया और छोटा वाल ग्रुप समाज सेवा से जुड़ गया। प्रारंभ में जय प्रकाश जी समाजवादी पार्टी में थे और उन्होंने 1952 के चुनाव में प्रचार भी किया था। लेकिन उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा। इन लोगों का मानना था कि भारतवर्ष का नवनिर्माण बिना आम लोगों की भागीदारी के सिर्फ सरकार से नहीं होगा। इसी दृष्टि से इन लोगों ने राष्ट्र निर्माण के लिए इस संस्था द्वारा काम किया। शुरुआत में संस्था का मुख्य कार्य ग्रामीण विकास के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं को एक-दूसरे से जोड़ना तथा उन्हें यह अहसास दिलाना था कि आप अकेले नहीं हैं, वरन् एक परिवार के सदस्य हैं। संस्था, सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए एक पत्रिका 'एवार्ड न्यूज लेटर' भी निकालती थी। बाद में उसका नाम 'वॉलेंटरी एक्शन' हो गया। इसका प्रकाशन 1997 तक हुआ। 4 जुलाई 1997 को तत्कालीन महामंत्री संजय घोष की हत्या के बाद इस पत्रिका का प्रकाशन बंद हो गया।
गौरतलब है कि जिस समय इस संस्था का गठन हुआ था, उसी समय पंचायती राज पर बलवंत राय मेहता समिति की रिपोर्ट आई थी। जय प्रकाश नारायण लोकतंत्र के विकेंद्रीकरण और पंचायती राज के कट्टर समर्थक थे। उन्हीं के चलते एवार्ड के प्रमुख कार्यों में पंचायती राज, गरीबी निवारण, नर-नारी समता, ग्रामीण प्रौद्योगिकी विकास तथा न्यूनतम आधारभूत आवश्यकता की पूर्ति करना शामिल हैं। आधुनिक भारत में ग्रामीण विकास के क्षेत्र में क्या कार्य हुए। इसको धयान में रखकर 'हिस्ट्री ऑफ रूरल डेवलपमेंट इन मॉडर्न इंडिया' नाम से शोध कराया गया, लेकिन इसे पूरा नहीं किया जा सका। जय प्रकाश जी के समय में एवार्ड ने ब्लॉक और ग्राम स्तर पर बहुत ही उल्लेखनीय कार्य किया था। लेकिन, जब जेपी आंदोलन शुरू हुआ तो 75 से 78 तक एवार्ड के 7-8 ठिकानों पर भी छापा मारा गया। संस्था के सारे लेखा-जोखा की जांच भी हुई और कई तरह से संस्था को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई। जब कांग्रेस पार्टी दुबारा सत्ताा में आई तो उसने कुदाल कमीशन बनाकर एवार्ड ही नहीं, बल्कि इसके जैसी अनेकों संस्थाओं की जांच कराई। लेकिन इतना सारा करने के बाद भी सरकार को कुछ नहीं मिला, जिससे कि वह इस संस्था के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई कर सके। लेकिन सरकार द्वारा पूरे प्रशासन को इस संस्था पर लगा देने से संस्था पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। संस्था बंद नहीं हुई, काम नहीं रुका, लेकिन काम की गति धीमी अवश्य हो गई। बड़ी बात रही कि संस्था इस अग्निपरीक्षा से बेदाग निकली।
बाद के दिनों में जय प्रकाश जी जैसा नेतृत्व नहीं रहा। उनके साथ के लोगों में से सिर्फ एल.सी. जैन जीवित हैं। जय प्रकाश जी ने अपने समय में देश के प्रमुख समाज कार्य संस्थानों को संस्था से जोड़ा, ताकि व्यावहारिक काम और शास्त्रीय ज्ञान दोनों का आपस में संवाद हो सके। संस्था के वर्तमान अध्यक्ष प्यारे मोहन त्रिपाठी इस संस्था से 1966 में ही जुड़े और जेपी के आमंत्रण पर एक साल के लिए बिहार गए और उनके जीवनकाल के अगले लगभग 11 वर्षों तक बिहार में काम किया। प्यारे मोहन जी को एवार्ड में काम करते हुए लगभग 42 साल हो गए हैं। वे एवार्ड के अनेक पदों पर रहने के बाद 1994 से एवार्ड के अधयक्ष हैं। उन्होंने इतने दिनों में यह महसूस किया कि पुराने लोग तो अब रहे नहीं, इसलिए अब इसमें नया नेतृत्व डाला जाए। सो, 1994 में ही संजय घोष को एवार्ड का महामंत्री बनाया गया। संजय घोष बहुत ही प्रतिभावान नौजवान थे। उनका 1997 में जोरहर के पास उल्फावालों ने अपहरण करके हत्या कर दी। उसके बाद राजस्थान के अजय मेहता इसके महामंत्री बने, लेकिन उन्होंने जल्द ही एवार्ड से नाता तोड़ लिया, अभी आर. पी. अग्रवाल महामंत्री हैं।
प्यारे मोहन जी के अनुसार- 'अभी पूरे देश में एवार्ड के 700 से भी अधिक सदस्य हैं। ये सब गैर-सरकारी संस्थाएं हैं। इन संस्थाओं के बीच में सख्य, सहयोग और संवाद का संबंध कायम करना और इसको मजबूत करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते रहना ही हमारा मुख्य काम है। हमारी जितने भी सदस्य संस्थाएं हैं, उन्हें जो सूचना चाहिए होती है, हम उन्हें मुहैया कराते हैं। इसके अलावा उन्हें जो तकनीकी प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है, हम उसकी भी व्यवस्था करते हैं। इस समय हमारे काम का केंद्र पंचायती राज, गरीबी निवारण, नर-नारी समता, ग्रामीण प्रौद्योगिकी तथा न्यूनतम मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करना ही एवार्ड का उद्देश्य है। एवार्ड का उद्देश्य भी गांधी जी का ग्राम स्वराज्य ही है, जिसमें लोग अपनी सारी जरूरतें अपने गांव के अंदर ही पूरी कर सकें।'
प्यारे मोहन जी के अनुसार- 'स्वैच्छिक कार्य, मानवता द्वारा स्वतंत्रता की खोज की अभिव्यक्ति है। इसलिए हम कोशिश यह करते हैं कि हम सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भर हो जाएं। किसी भी क्षेत्र में हमें सरकार या अन्य चीजों पर निर्भर न रहना पड़े। इसी को मजबूत करने के लिए हम लोग कार्य करते हैं। कितना कर पाते हैं और कितना कर पाए हैं, यह अलग बात है। गौरतलब है कि पिछले 16 दिसंबर 2008 को एवार्ड के पचास साल पूरे हो गए। लिहाजा, अगले एक साल तक संस्था स्वर्ण जयंती वर्ष मनाएगी। इस दौरान राज्य और केंद्र स्तर पर विभिन्न विषयों पर परिसंवाद और गोष्ठियां आयोजित होंगी। इसके अलावा संस्था के कार्यों का मूल्यांकन भी होगा और उसका इतिहास भी लिखा जाएगा। साथ ही वॉलेंटरी ऐक्शन का इतिहास अलग से लिखा जाएगा। गोल्डन जुबली साल में हम लोग पहले संस्था की तरफ से एक विशेषांक निकालेंगे, उसके बाद संस्था की पत्रिका का प्रकाशन जो बंद है, उसे चालू करने का प्रयास करेंगे। अंत में संस्था की नई दिशा और दृष्टि पर विचार करेंगे।'
इस संस्था की खास बात यह है कि इसके पास अपनी कोई चल या अचल संपत्तिा नहीं है। यहां तक कि इसका ऑफिस भी कमला देवी ट्रस्ट का है। आज के समय में साधनों की जैसी मारामारी है, वैसे में अगर एवार्ड जैसी संस्था जीवित है, तो बहुत ही फख्र की बात है। प्यारे मोहन जी के अनुसार- 'जयप्रकाश नारायण जी जैसे लोग बहुत ही साधन संपन्न लोग थे। उन्हें बहुत जल्दी ही साधान उपलब्ध हो जाते थे। हम लोग बहुत ही साधारण लोग हैं। इसलिए संसाधन जुटाने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। उन लोगों का मानना था कि संस्था के पास अगर बहुत संसाधन होंगे तो संस्था के अंतर्गत बहुत ही कलह होंगे और संस्था ठंडी हो जाएगी कि हम क्यों कार्य करें। साधन नहीं होने पर संस्था को जीवित रहने के लिए कार्य करने की जरूरत होगी।
आम तौर पर एक संस्था का सामान्य जीवन पच्चीस-तीस वर्षों का माना जाता है, लेकिन एवार्ड ने पिछले 16 दिसंबर को 50 साल पूरा किया है। हम लोग कोशिश कर रहे हैं कि यह और भी आगे चले।' प्यारे मोहन जी का कहते हैं कि जिस समय जेपी इसके अधयक्ष थे, उस समय इसकी राष्ट्रीय स्तर पर बहुत अधिक पहचान थी, लेकिन वैसी स्थिति आज नहीं है। हम लोग एवार्ड को उस स्तर तक नहीं पहुंचा सकते, क्योंकि हम अनाम लोग हैं।