बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

वात्सल्य ग्राम अनाथालय नहीं एक परिवार है



वात्सल्य ग्राम की परिकल्पना को लेकर वात्सल्य ग्राम की संस्थापिका साध्वी ऋतंभरा से संजीव कुमार की बातचीत के प्रमुख अंश-
1.  अपने देश में अनाथालयों की कमी नहीं है। ऐसे में वात्सल्य ग्राम उन अनाथालयों से किस तरह भिन्न है?
वात्सल्य ग्राम अनाथ बच्चों को सनाथ बनाता है। यहां बच्चों को एक मां की गोद मिलती है और अपना घर मिलता है। साथ में  भाई-बहन, मां-मौसी और नानी के रूप में रिश्ता मिलता है। इस तरह वात्सल्य ग्राम अपने बच्चों को संबंधों का एक सुख देता है। रोटी, कपड़ा और मकान के साथ जो रिश्ता और परिवार का प्यार मिलता है, वह वात्सल्य ग्राम को अन्य अनाथालयों से भिन्न करता है।
2. क्या यह जरूरी है कि वात्सल्य ग्राम की माताएं बच्चों को उतना ही प्यार दे पाती हैं जितना एक सगी मां अपने बच्चे से करती हैं?
प्यार सगे और पराए को नहीं पहचानता। जननी तो सिर्फ जन्म देती है। अगर कोई बच्चा दूसरे जगह चला जाए तो उसे वहां स्वाभाविक रूप से प्यार मिलना शुरू हो जाता है। दूसरी बात कोई भी स्त्री तभी अपना जीवन वात्सल्य ग्राम को देती है जब वह वात्सल्यमयी होती है। ममतामयी होती है। जो प्यार देने के लिए ही नहीं, प्यार पाने के लिए भी आतुर होती हैं। यहां की माताओं और बच्चों का रिश्ता जीविका का नहीं, जीवन और प्यार का रिश्ता है। वात्सल्य ग्राम अनाथालय नहीं एक परिवार है। इसके माध्यम से मैं एक भावात्मक परिवार अर्थात् ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की भारतीय ऋषि कल्पना को साकार करने की साधना कर रही हूं।
3. जब वात्सल्य ग्राम के बच्चों को यह पता चलता है कि उन्हें ममता की शीतल छाया देने वाली मां उनकी असली मां नहीं है तब उनकी क्या प्रतिक्रिया होती है?
वात्सल्य ग्राम के बच्चे जब बड़े होते हैं और जन्म की प्रक्रिया के बारे में पता चलता है तो वे यह समझ जाते हैं कि यही वह मां है जिसने हमें अपना जीवन दिया है। ऐसे में अपनी इस मां के प्रति उनकी श्रद्धा और बढ़ जाती है। क्योंकि वे ये समझने लगते हैं कि जो मेरे खून के रिश्ते थे वे मुझे छोड़ गए और एक यह मां है जिसने अपनी जिंदगी मेरे लिए न्योछावर कर दी है। इस अहसास के बाद तो इन बच्चांे का अपनी इस मां के प्रति श्रद्धा व प्यार और बढ़ जाता है।
4. इन बच्चों का अपने भाई-बहनों के प्रति कैसा व्यवहार होता है?
आश्रम के बच्चे अपने बाद आने वाले बच्चों के प्रति स्वाभाविक रूप से संवेदनशील होते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि ये बच्चे अपने भाई-बहनों के रूचियों का ख्याल रखते हैं। उन्हें इस बात का स्वाभाविक रूप से भान होता है कि यह बच्चा पालने में आया है। इसे भी कोई छोड़ गया होगा। ऐसे में इन बच्चों के प्रति उनके मन में प्रेम स्वाभाविक रूप से पनपता है। इसके लिए हमें कोई लेक्चर या प्रवचन देने की जरूरत नहीं होती। 
5. वात्सल्य ग्राम से निकले अबतक कितने बच्चे सामान्य जीवन जी रहे हैं?
वात्सल्य ग्राम को 12 साल हुए हैं लेकिन मैं इस कार्य से 22 साल से जुड़ी हंू। हमारी कई बच्चियां अपने-अपने क्षेत्रों में अपने पैरों पर खड़ी हो रही है। हमारी एक बच्ची आईआईटी से इंजिनियरिंग तो दूसरी डेंटल (डॉक्टरी) की पढ़ाई कर रही है। वहीं एक बच्ची इंटीरियर डिजाइनिंग का काम कर रही है। इस तरह सभी अपना सामान्य जीवन जी रहे हैं। वे अपने जीवन में अच्छी पढ़ाई-लिखाई तो कर ही रहे हैं। और अब वे समाज के लिए क्या करेंगे यह तो आने वाला समय ही बताएगा। वैसे वात्सल्य परिवार की पहली बच्ची का दिल्ली के एक गोयल परिवार मे ब्याह हुआ है। वह दो बच्चों की मां है। और घर-परिवार ठीक से चला रही है। एक अनाथ बच्ची का समाज के मुख्य धरा में शामिल होना ही वात्सल्य ग्राम की एक उपलब्धि है। सबसे अच्छी बात यह है कि इस बच्चों को अपनाने के लिए समाज ही आगे आ रहा है।
6. वात्सल्य ग्राम के बच्चों को लेकर आपकी क्या सोच है?
मैं समझती हंू कि कोई भी बच्चा ईश्वरीय कृति है। ये बच्चे किसी परिवार, समाज या देश की ही नहीं मानवता की भी धरोहर हैं। मैं इन बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा देने का प्रयत्न कर रही हूं। जिससे वे अपने व्यक्तित्व में पूर्णता, नैतिकता और आध्यत्मिकता के साथ-साथ अपनी राष्ट्रीय भूमिका भी निभाए। एक अच्छा और प्रमाणिक इंसान बनाने की प्रक्रिया ही हमारे वात्सल्य ग्राम की सोच है। मेरी यह कामना है कि वे देश और समाज के लिए जिएं। वे काम करें, धन कमाएं, किंतु स्वयं अकेले न खाकर आसपास के लोगों को खिलाकर खाएं।

वात्सल्य की बगिया वात्सल्य ग्राम

संजीव कुमार

वात्सल्य ग्राम, न केवल ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की कल्पना को साकार करता है बल्कि आज के इस भौतिकवादी दौर में जहां कोई किसी का सगा नहीं है वहां यह आत्मिक रिश्तों का संसार भी रचता है।  
 वात्सल्य ग्राम। मथुरा-वृंदावन रोड पर 50 एकड़ भूमि में फैला एक गांव। एक ऐसा गांव जहां 16 आवासीय भवनों में 127 बच्चे, 16 मां, 10 नानियां और छह मौसियां। हर मां का एक स्वतंत्र परिवार। एक वात्सल्य परिवार में 5 बालिकाएं, 2 बालक, एक मां, मौसी और नानी होते हैं, जो एक परिवार की भांति रहते हैं। एक ऐसा गांव जहां नवजात, युवा और बुजुर्ग एक साथ रहते हैं, लेकिन यहां कोई अनाथ, अवैध, नाजायज, बांझ, विधवा और पारित्यक्ता नहीं है। एक ऐसा गांव जहां हर बच्चे के माता-पिता की जगह सिर्फ ‘मां’ का नाम जुड़ता है। एक ऐसा गांव जहां जात-पात का भेदभाव नहीं है। यहां सब एक ही जाति और गोत्र के नाम से जाने जाते हैं। वह है- ‘परमानंद’। स्वामी परमानंद वात्सल्य ग्राम की संस्थापिका साध्वी ऋतंभरा के गुरु हैं। एक ऐसा गांव जहां रक्त संबंध न होते हुए भी देश के अलग-अलग हिस्सों के लोग एक परिवार की तरह रहते हैं।
इस वात्सल्य ग्राम को साध्वी ऋतंभरा का आश्रम भी कहा जाता है। इस परिसर में उन्हें ‘दीदी मां’ कहा जाता है। साध्वी ऋतंभरा अपने इस आश्रम में रहने वाले 127 बाल-गोपालों पर अपना सर्वस्व न्योछावर करती हैं। श्रीराम मंदिर आंदोलन के समय हिंदुत्व की फायर ब्रांड नेता मानी जाने वाली साध्वी ऋतंभरा ने वात्सल्य ग्राम से जो वात्सल्य की गंगा बहायी है वह अन्यत्र दुर्लभ है। वाल्सल्य ग्राम, वात्सल्य भाव की केवल प्रयोग भूमि ही नहीं है, यह एक अतिप्रेरक संदेश और संकेत भी है कि भारत के पुनर्जन्म की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है।
वात्सल्य ग्राम सिर्फ वात्सल्य की भूमि पर ही केंद्रित नहीं है, यहां राष्ट्रभाव की भी प्राण-प्रतिष्ठा की गई है। इसके प्रांगण में भारतमाता की भव्य प्रतिमा इसी का संदेश देता है। कृष्ण और यशोदा का वात्सल्य भाव अगर कहीं सुरक्षित रह सकता है तो वह भारतमाता का आंचल ही हो सकता है। इसी भाव को दर्शाती एक आकृति प्रवेश द्वार के कुछ आगे स्थापित की गई है। मां यशोदा की गोद में बालकृष्ण विराजमान हैं। मां यशोदा बालकृष्ण को निहार रही हैं और बालकृष्ण मां यशोदा को। इन दोनों के बीच वात्सल्य की जो अविरल धारा प्रवाहित हो रही है वह अद्भुत है। उसी तरह वात्सल्य ग्राम से प्रवाहित हो रही वात्सल्य की यह गंगा समस्त जीव-जगत के कल्याण के लिए है। यह लौकिक माता-पिता की स्नेहिल छाया से वंचित शिशुओं के लिए मातृ प्रेम का सजीव अंागन है। यह मातृत्व और पितृत्व से वंचित वयस्कों के लिए भी है तो कर्तव्य-बोध से अज्ञात सामान्यजन के लिए भी है।
इस प्रयोगभूमि के आरंभ की कहानी भी कम दिलचस्व नहीं। परमशक्ति पीठ से जुड़े भानुप्रताप शुक्ल न्यास के सचिव योगेन्द्र पाल त्यागी बताते हैं कि एक बार दीदी मां साध्वी ऋतंभरा को एक अनाथ शिशु मिला। उन्होंने सोचा कि कोई अकेली रहनेवाली माता इसे स्वीकार कर ले तो दोनों का एकाकीपन दूर हो जाएगा और कोई बेसहारा भी नहीं रहेगा। ‘रघुनाथ’ और ‘विश्वनाथ’ के इस देश में कोई ‘अनाथ’ और ‘बेसहारा’ कैसे हो सकता है?’ इसी सिद्धांत को आधार बनाकर दिल्ली के पटपड़गज में वात्सल्य भाव से ही परमशक्ति पीठ की स्थापना (1992) और फिर वात्सल्य मंदिर का जन्म हुआ। इस योजना को इतना समर्थन मिला कि आज यह ‘वात्सल्य मंदिर’ से ‘वात्सल्य ग्राम’ में तब्दील हो चुका है।
वात्सल्य ग्राम में अधिकांशतः वैसे ही बच्चे पलते हैं जिनके अभागे मां-बाप अपनी मजबूरियों की वजह से उन्हें कूड़ेदान या झाड़ियों में डाल देते हैं। वात्सल्य की बगिया इन्हीं कूड़ेदान और झाड़ियों से उठाए गए ‘फूलों’ से सजी है। वात्सल्य ग्राम के शिशु मंगल में एक वर्ष से कम आयु के बच्चे रहते हैं। आज इस शिशु मंगल में 50 के करीब बच्चे हैं। इन बच्चों का लालन-पालन मां सुमन परमानंद करती हैं। सुमन परमानंद इस परिसर की प्रमुख हैं। एक वर्ष के बाद बच्चे को गोकुलम के एक परिवार को सौंप दिया जाता है, जहां उनका प्रेम पूर्वक लालन-पालन किया जाता है। यहां वे नौ वर्ष की आयु तक रहते हैं। उसके बाद उन्हें अध्यापक के अनुशासन में छात्रावास में भेज दिया जाता है। यहां उनका शिक्षा के साथ-साथ समग्र शारीरिक और मानसिक विकास पर ध्यान दिया जाता है। छठी कक्षा के बाद बच्चों को परमशक्ति पीठ के खर्चे पर ही बाहर पढ़ने के लिए भेज दिया जाता है।
परमशक्ति पीठ को बने आज 20 वर्ष से अधिक हो गए हैं। इसलिए वात्सल्य मंदिर में पली-बढ़ी पहली बच्ची अंकिता की शादी दिल्ली के ही एक अच्छे परिवार में हो चुकी है। पिछले दिनों उसके पैर में चोट लगी तो उसकी मां शोभा परमानंद को तबतक चैन नहीं आया, जबतक उन्होंने दिल्ली जाकर अपनी बेटी से मिल नहीं लिया। इससे यह भी पता चलता है कि वात्सल्य ग्राम के मां-बच्चों का रिश्ता कुछ वर्षों का नहीं है, बल्कि जीवन भर का है। इतना ही नहीं अंकिता जब वात्सल्य ग्राम आती है तो उसका वात्सल्य ग्राम में उसी तरह स्वागत होता है जैसे एक बेटी का उसके मायके में होता है। यह है वात्सल्य ग्राम की बगिया का वात्सल्य।

और कहां-कहां है वात्सल्य ग्राम
1- अग्रसेन आवास, इंद्रप्रस्थ विस्तार, दिल्ली
2- नालागढ़, सोलन, हिमाचल प्रदेश
3- ओंकारेश्वर, खांडवा, मध्य प्रदेश
4- छतरपुर, खजुराहो, मध्य प्रदेश

वात्सल्य ग्राम के प्रकल्प
गोकुलम् वात्सल्य आवास: आधुनिक सुविधा संपन्न आवासीय परिसर। यहां बालक नौ वर्ष की आयु तक रहते हैं।
स्वस्ति चिकित्सालयः प्राकृतिक चिकित्सा, योग एवं व्यायाम के माध्यम से असाध्य रोगों का निदान इस आरोग्य केंद्र का लक्ष्य है।
समविद् गुरुकुलमः बालक-बालिकाओं के लिए आवासीय विद्यालय जहां मूल्य आधारित समग्र शिक्षा प्रदान की जाती है।
खेलकूद अकादमीः वात्सल्य ग्राम वासियों को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ एवं सबल बनाने के लिए।
संस्कार केंद्रः समाज में पवित्र वातावरण का निर्माण और ग्राम वासियों के जीवन में धर्म-संस्कार व नैतिकता की प्रस्थापना के लिए यज्ञ, कथा, प्रवचन और कर्मकांड की शिक्षा दी जाती है।
गृह उद्योग प्रशिक्षण केंद्रः गृह उद्योग, कुटीर उद्योग और वन्य उत्पाद आधारित उद्योगों द्वारा अर्थोपार्जन की शिक्षा देकर मातृ शक्ति को जीवन में स्वावलंबी बनाना इस केंद्र का लक्ष्य है।
कामधेनु गौगृहः गोधाम के माध्यम से संपूर्ण गौवंश का संरक्षण, संवर्धन करना। साथ ही वात्सल्य ग्राम के सभी शिशुओं को गोदुग्ध उपलब्ध हो सके।
मातृ प्रशिक्षण केंद्रः ऐसी मार्गदर्शिका, राष्ट्रसेविका और धर्मप्रचारिका नारी का निर्माण केंद्र जहां माताओं को सम्मानजनक स्थान प्रदान करने के साथ शिशु पालन व परिवार की देखरेख का प्रशिक्षण दिया जाता है।
संत निवासः सद्गुरु सन्निधि के निर्माण के उद्येश्य से विभिन्न स्थानों से आए साधकों व संतों को एक पवित्र व धार्मिक वातावरण में प्रवास उपलब्ध कराना।
मीरा माधव निलयम अतिथि गृहः भारत व विदेशों से आए वात्सल्य ग्राम योजना के सहयोगियों व भ्रमणार्थियों को प्रवास स्थान उपलब्ध कराना इस प्रकल्प का उद्येश्य है।

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

क्या दिल्ली में दूसरा भोपाल गैस कांड होगा?

संजीव कुमार
भोपाल गैस त्रासदी अभी हम भूले नहीं हैं। बिना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की मंजूरी के ओखला बिजली संयंत्र चालू हो गया है। वहीं नरेला-बवाना और गाजीपुर में बिजली संयंत्र निर्माणाधीन है। अगर यह तीनों बिजली परियोजनाएं दिल्ली में बनी तो भोपाल जैसा दूसरा हादसा दिल्ली में भी हो सकता है
 

बिना किसी तकनीकी जांच और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मंजूरी के बिना चीन की कचरा से बिजली बनाने वाली तकनीक से दिल्ली के ओखला स्थित संयंत्र में बिजली बनाई जा रही है। इस तरह कचरा जलाकर बिजली बनाने में डाईऑक्सीन नामक खतरनाक गैस निकलती है। दुर्भाग्य यह है कि इस दुष्प्रभाव को जानते हुए भी दिल्ली सरकार दिल्ली वासियों और संयंत्र के मजदूरों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। इसका खुलासा 22 मार्च,२2012 को आए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण आयोग के एक रिपोर्ट से हुआ है। वहीं हाल ही में पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन का कहना है कि ओखला का कचरा से बिजली बनाने वाली संयंत्र पूरी तरह सुरक्षित है। ऐसे में जनता किसकी बातों पर भरोसा करे- पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन की बातों पर या केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण आयोग की रिपोर्ट पर?
कंेद्रीय प्रदूषण नियंत्रण आयोग की इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है की कचरा आधारित बिजली संयंत्र से होने वाली त्रासदी के लिए अबतक दिल्ली सरकार ने कोई तैयारी नहीं की है। भोपाल गैस कांड इसका उदाहरण है। इस बाबत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण आयोग ने ओखला बिजली संयंत्र के जिंदल एकोपोलिस कंपनी के अधिकारियों की कड़ी आलोचना की है। आश्चर्य तो यह है कि कंेद्रीय प्रदूषण नियंत्रण आयोग की रिपोर्ट आने से पहले (जनवरी माह से) ही इस बिजली संयंत्र का चालू होना, कई सवाल खड़े करता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण आयोग की रिपोर्ट के बिना यह संयंत्र चालू कैसे हो गया? दूसरा आयोग की रिपोर्ट इतनी देर से क्यों आई? ऐसे कई गंभीर सवाल सरकार पर भी खड़े होते हैं।
बताते चलें कि कूड़े जलाने से जो गैस निकलती है वह जीवन व पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक है। यही कारण है कि सभी विकसित देशों ने अपने यहां ऐसी परियोजनाओं को बंद कर चुकी है। गौरतलब है कि भारत में पहली बार दिल्ली के तिमारपुर में कचरा से बिजली बनाने की परियोजना 1990 में लगाया गया जो असफल रहा। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या हमारे पास वैसी तकनीक है जो कचरे से सुरक्षित बिजली पैदा कर सके? अगर नहीं तो दिल्ली वासियों के जान जोखिम में डालकर इस चीनी तकनीक से बिजली पैदा करने की क्या आवश्यकता है? बताते चलें कि ओखला के अलावा ऐसा ही बिजली संयंत्र दिल्ली के नरेला-बवाना और गाजीपुर में निर्माणाधीन है।
यही वजह है कि पर्यावरण मंत्रालय ने 1997 में जारी अपने श्वेत पत्र में यह बात स्वीकार की है कि जिस तरीके से शहरी कूड़े को जलाया जा रहा है वह तकनीक सही नहीं है। यहीं सवाल यह उठता है कि अब वह तकनीक सही कैसे हो गया? दूसरी तरफ सन् 2005 में संसदीय समिति ऊर्जा के अध्यक्ष रहे गुरूदास कामत ने कूड़े से बिजली बनाने का यह कहते हुए विरोध किया था कि इस प्रकार की तकनीक नुकसान दायक है। इसलिए इसे बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। वहीं भारतीय जनता पार्टी के दिल्ली विधान सभा में विपक्ष के नेता विजय कुमार मलहोत्रा ने सांसद रहते हुए 27 जून, 2008 को दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर तेजेंदर खन्ना को एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने ओखला प्लांट कोे वहां के वासियों के लिए प्रदूषणकारी बताया था। अब भाजपा के विजन डाक्यूमेंट 2025 में दो और कूड़े से बिजली बनाने वाली संयंत्र बनाने का वादा है। क्या अब यह नुकसानदायक नहीं रही? या विजय कुमार मलहोत्रा सत्ता मोह में इस बात को भूल गए हैं।
इताना ही नहीं तत्कालीन पर्यावरण राज्य मंत्री जयराम रमेश ने भी इस बाबत दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को 1 अप्रैल 2011 को एक पत्र लिखा था। उस पत्र में जयराम रमेश ने ओखला बिजली संयंत्र को खतरनाक बताते हुए लिखा था कि इस तरह के संयंत्रों के पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया में ही गड़बड़ी है। प्रक्रिया में गड़बड़ी भी सरकार के मंशा को बताता है कि कैसे पर्यावरण और स्वस्थ्य के लिए नुकसान दायक होते हुए इस परियोजना की मंजूरी दी गई?  कहने का अर्थ यह है कि दिल्ली सरकार भी इस परियोजना के नुकसान दायक पहलुओं को अनदेखा कर रही है। स्पष्ट है, दोनों पार्टियां सत्तालोलुप है। इसलिए उन्हें दिल्ली की जनता की स्वास्थ्य से ज्यादा उन्हें अपनी कुर्सी चिंता सता रही है।
बताते चलें कि ऐसे बिजलीघर न तो कूड़ा निपटाने के लिए बनते हैं और न ही बिजली पैदा करने के लिए। इसके पीछे का कारण कुछ और ही है। इसके अनेक कारणों में से एक कारण यह है कि प्रति मेगावाट की दर से केंद्र सरकार बिजली बनाने वाली कंपनी को डेढ़ करोड़ का अनुदान देती है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी योजनाआंे को अनुदान देने पर रोक लगा रखी है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन कर केंद्र सरकार इस कंपनी को अनुदान दे रही है। इस तरह कंेद्र सरकार भी सवालों के कटघरे में है। टॉक्सिक वॉच के संस्थापक गोपल कृष्ण के अनुसार, ‘‘सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन जिंदल जैसी कंपनियों को अनुदान दे रही है। ऐसे संयंत्रों को तुरंत बंद किया जाना चाहिए। अन्यथा हमें दूसरे भोपाल गैस कांड के लिए तैयार रहना चाहिए।’’   
दूसरी तरफ यह परियोजना कचरा आधारित रोजगार को भी समाप्त करता है। दिल्ली को रौशन करने के नाम पर इस परियोजना को हरी झंडी दिया गया है। गौरतलब है कि दिल्ली में लगभग 80 प्रतिशत क्षेत्र के काम को प्राइवेट कंपनी के हाथों में सौंप दिया गया है लेकिन उसके बावजूद भी समस्या का हल नहीं हो पा रहा है।
बताते चलें कि दिल्ली में कचरे की छंटाई के काम में असंगठित क्षेत्र के लगभग 3.5 लाख मजदूर शामिल हैं। इनके द्वारा 20 से 25 प्रतिशत कचरे की छंटाई के बाद 30 प्रतिशत ऐसे कचरे की छंटाई हो जाएगी जो कच्चे माल के रूप में दुबारा इस्तेमाल होगा। साथ ही 50 प्रतिशत वैसा कचरा होगा जिसे जैविक कूड़ा कहते हैं। उससे खाद बनाया जा सकता है। इस तरह कचरे के 80 प्रतिशत भाग का निपटारा तो समुदाय के स्तर पर ही हो सकता है। ऐसे में कूड़े से बिजली बनानेवाली संयंत्र लगाने की आवश्यकता लगभग नहीं है।

कौन-कौन से हैं संयत्र
संयंत्र         कूड़ा         बिजली उत्पादन    स्थिति
ओखला    2050 मेट्रिक टन    20 मेगावाट     चालू है
नरेला-बवाना 4000 मेट्रिक टन   36 मेगावाट     निर्माणाधीन
गाजीपुर     1300 मेट्रिक टन   10 मेगावाट      निर्माणाधीन

इस परियोजना से हानि
कचरे जलाने से डाईऑक्सीन नाम गैस निकलती है। यह कैंसर के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक रसायन है। कचरे में मौजूद खतरनाक रसायनों को यह तकनीक कई-कई रूपों में वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और पर्यावरण प्रदूषण से हमारे भोजन चक्र का हिस्सा बना देता है। यह जहर केवल धरती या पानी में ही नहीं बल्कि हवा में भी तैरने लगता है। क्योंकि शहरी कूड़े में प्लास्टिक के अलावा पारा भी बहुतायत में मिलता हैं। वैज्ञानिक और व्यावसायिक बुद्धि को किनारे रख दें तो भी क्या हमें यह समझने में दिक्कत है कि प्लास्टिक और पारा के जलने से जो धुंआ निकलता है क्या वह हमारे लिए लाभदायक है?

नजीर पेश करता मणिपुर

संजीव कुमार
विधानसभा चुनाव 2012 के परिणाम कई मामलों में भिन्न है। जनजागरण के बावजूद नव निर्वाचित 690 विधायकों में से 242 माननीय अपराधी छवि वाले और 457 करोड़पति विधायक विधानसभा पहुंच गए हैं। वहीं मणिपुर देश का इकलौता राज्य है जिसके सभी 60 विधायक बेदाग हैं। इस तरह मणिपुर पूरे देश के सामने एक नजीर पेश करता है
विधानसभा चुनाव 2012 के परिणाम आ चुके हैं। सभी पांचों राज्यों में सरकार बन चुकी है। और सदन में सभी नव निर्वाचित विधायक सूबे और जनता की सेवा का शपथ ले चुके हैं। सूबे और जनता की कितनी सेवा करेंगे यह तो आगामी पांच सालों में पता चलेगा। क्योंकि अब यही नव निर्वाचित माननीय अगले पांच सालों तक अपने सूबे में जनता के भाग्य का फैसला करेंगे। गत वर्ष भ्रष्टाचार के खिलाफ जनजागरण का जो बिगुल बजा था। उस बिगुल का कितना असर हुआ? अन्ना टीम और बाबा रामदेव सहित कई प्रमुख संगठनों व लोगों ने इस जनजागरण यज्ञ में अपने हिसाब से जो आहुति दी। इस जनजागरण से लोगों ने कितना सीखा और कितना अपने जीवन में उतारा। अब इसके आकलन का समय है। क्योंकि बीते एक महीने में जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं उन राज्यों की जनता के लिए यह सोचने-विचारने और कुछ करने का समय था। अब उनने क्या किया इस पर बात करने का मौका है। जिन पांचों राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं, वे हैं- उत्तराखंड (70), उत्तर प्रदेश (403), पंजाब (117), गोवा (40) और मणिपुर (60)। इन पांचों राज्यों में कुल 690 माननीय चुने गए हैं। एडीआर और नेशनल इलेक्शन वॉच ने इन सभी नव निर्वाचित विधायकों के हलफनामों का विश्लेषण किया है, जो इन लोगों ने अपना पर्चा दाखिल करते समय चुनाव आयोग को दिए थे। विश्लेषण के अनुसार, नव निर्वाचित 690 विधायकों में से 242 विधायकों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले होने की बात स्वीकार की है। कहने का तात्पर्य यह है कि नव निर्वाचित विधायकों में 35 प्रतिशत विधायक ऐसे हैं जिनके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। वहीं 690 माननीय विधायकों में से 114 विधायक ऐसे हैं जिनके खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास और बलात्कार जैसे गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं।
आपराधिक मामलों वाले विधायकों के मामले में उत्तर प्रदेश शीर्ष पर है। उत्तर प्रदेश के 403 नव निर्वाचित विधायकों में से 189 विधायकों (47 प्रतिशत) के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। वहीं 98 विधायक (24 प्रतिशत) ऐसे हैं जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले चले रहे हैं। इस मामले में गोवा का स्थान दूसरा है। गोवा के 40 नव निर्वाचित विधायकों में से 12 विधायकों (30 प्रतिशत) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले लंबित होने की बात स्वीकार की है। वहीं 3 विधायक (8 प्रतिशत) ऐसे हैं जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं। इस मामले में उत्तराखंड तीसरे नंबर पर है। जहां 70 नव निर्वाचित विधायकों में से 19 विधायकों (27 प्रतिशत) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले होने की बात चुनाव आयोग को बताई है। वहीं 5 विधायक ऐसे हैं जिन्होंने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले लंबित होने की बात की है। इस मामले में चौथे नंबर पर पंजाब है। जहां 117 नव निर्वाचित विधायकों में से 22 विधायकों (19 प्रतिशत) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले होने की बात चुनाव आयोग को बताई है। वहीं 8 विधायक (7 प्रतिशत) ऐसे हैं जिनके खिलाफ हत्या, बलात्कार, फिरौती जैसे गंभीर आपराधिक मामले लंबित है।
वहीं दूसरी तरफ मणिपुर एक ऐसा राज्य है जिसने सभी राज्यों के राजनीतिक दलों और जनता के लिए एक नजीर पेश किया है। इन पांच राज्यों में मणिपुर इकलौता ऐसा राज्य है जिसके सभी 60 विधायक बेदाग हैं। कहने का अर्थ यह है कि मणिपुर के नव निर्वाचित विधायकों में से एक भी विधायक ऐसा नहीं है जिस पर कोई आपराधिक मामला दर्ज हो। कहने की आवश्यकता नहीं है कि मणिपुर का चुनाव परिणाम यह बताता है कि हौसला और जज्बा हो तो कुछ भी संभव है। जनता अगर चाह ले तो अपराधी और भ्रष्टाचारी को सदन के बाहर बिठा सकती है। मणिपुर की जनता ने यह करके दिखाया है। यह निश्चय ही संतोष जनक है। मणिपुर के अलावा अन्य राज्यों में अभी और जनजागरण की आवश्यकता है। क्योंकि अन्य राज्यों से कुछ ऐसे अपराधी छवि के विधायक चुनकर आ गए हैं जिन्हें चुनकर नहीं आना चाहिए था। ऐसे में हमें मणिपुर से सीख लेते हुए और बेहतर करने की कोशिश करनी चाहिए।
आधे से अधिक हैं करोड़पति विधायक
जहां तक करोड़पति विधायकों की बात है तो पांचों राज्यों के 690 नव निर्वाचित विधायकों में से 457 विधायक करोड़पति हैं। कहने का अर्थ यह है कि नव निर्वाचित विधायकों में से 66 प्रतिशत विधायक ऐसे हैं जिन्होंने चुनाव आयोग को दिए अपने हलफनामे अपने को करोड़पति बताया है। इस मामले में गोवा शीर्ष पर है। गोवा के 40 में से 37 नव निर्वाचित (93 प्रतिशत) विधायक करोड़पति हैं। पंजाब इस मामले में दूसरे नंबर पर है। पंजाब के 117 में से 101 नव निर्वाचित (86 प्रतिशत) विधायकों ने अपने आप को करोड़पति बताया है। इस मामले में उत्तर प्रदेश तीसरे नंबर पर है। उत्तर प्रदेश के 403 में से 271 नव निर्वाचित (67 प्रतिशत) विधायक करोड़ति हैं। चौथे नंबर पर उत्तराखंड है। उत्तराखंड के 70 में से 32 नव निर्वाचित (67 प्रतिशत) विधायकों ने अपने को करोड़पति बताया है। करोड़पति विधायकों के मामले में मणिपुर पांचवें नंबर है। मणिपुर के 60 में से 16 विधायक करोड़पति हैं। कहने अर्थ यह है कि मणिपुर के 27 प्रतिशत विधायक ऐसे हैं जिन्होंने अपने आप को करोड़पति घोषित किया है।
हाशिए पर महिलाएं
हम एक तरफ महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं लेकिन जब महिला को सशक्त बनाने की बात आती है तो इस पर ध्यान नहीं देते हैं। बीते पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम से भी यह बात सिद्ध होती है। क्योंकि इन राज्यों में कोई भी ऐसा राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दल नहीं है जिसने आधी आबादी कही जाने वाली महिला को विधानसभा चुनाव 2012 में वाजिब उम्मीदवारी दी हो। अब चुनाव परिणाम को देखें तो पांच राज्यों के कुल 690 विधायकों में नव निर्वाचित महिला विधायकों की संख्या मात्र 55 है जबकि पुरुष विधायकों की संख्या 635 है। कहने का अर्थ यह है कि इस बार मात्र 8 प्रतिशत महिलाएं निर्वाचित होकर विधानसभा में पहुंची हैं। 2007 में महिलाओं का यह प्रतिनिधित्व 5 प्रतिशत ही था जब 37 महिलाएं विधानसभा पहुंची थीं। हालांकि इस चुनाव में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में 3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। आधी आबादी के हिसाब से यह वृद्धि अपेक्षाकृत बहुत ही कम है। वह भी ऐसे समय में जब दो प्रमुख दलों की मुखिया महिला ही हैं।

पांच राज्यों में महिला प्रतिनिधित्व
राज्य    विधायक    पुरुष विधायक    महिला विधायक
उत्तराखंड   70           65           5
उत्तर प्रदेश 403          371         32
गोवा      40            39          1
पंजाब     117          103          14
मणिपुर    60           57           3  
      

लंबित अपराधिक मामलों वाले विधायक
राज्य कुल विधायक आ.मा. वाले विधायक गंभीर आपराधिक मामले वाले विधायक 
उत्तराखंड    70             19                 5
उत्तर प्रदेश  403            189               98
गोवा       40              12                3
पंजाब     117              22                 8
मणिपुर    60               0                 0

 लंबित गंभीर आपराधिक मामलों वाले विधायक
                       (राज्यवार)
उत्तराखंड
क्र.    विधायक    क्षेत्र    पार्टी    गंभीर मामले    कुल आपराधिक मामले
1. अरविंद पांडे    गदरपुर    भाजपा    1                 3   
2. दिनेश अग्रवाल  धरमपुर   कांग्रेस    2                 2   
3. प्रीतम सिंह    चक्रटा    कांग्रेस      1                 2

उत्तर प्रदेश
1. मित्रसेन    बिकापुर    सपा        26                 36
2. सुशील सिंह सकलधीरा  निर्दल       16                 20
3. रामवीर सिंह जसराना    सपा       11                  18

गोवा
1. जीवियर पेेस्को न्यूवेम  जीवीपी      2                  10
2. अतानासियो मॉनसेरेट सेंट क्रूज कांग्रेस  3                  2
3. जेनिफर मॉनसेरेट  टेलीगाव  कांग्रेस    3                  1

पंजाब
1. बीबी जागीर कौर भोलाथ शि.अ.द.      3                  1
2. बलबीर सिद्धू एसएएस नगर कांग्रेस     2                  1
3. सिमरजीत सिंह बैंस अतम नगर निर्दल  3                 6

 करोड़पति विधायक
राज्य    कुल विधायक    करोड़पति विधायक    प्रतिशत
उत्तराखंड    70              32               46
उत्तर प्रदेश  403             271              67
गोवा       40               37              93
पंजाब     117              101               86
मणिपुर    60               16               27
कुल      690              457              66

शीर्ष तीन करोड़पति विधायक (राज्यवार)
उत्तराखंड
विधायक    क्षेत्र    पार्टी    कुल संपत्ति
राजेश शुक्ला    किछा    भाजपा      26.63 करोड़
अमृता रावत    रामनगर    कांग्रेस    13.57 करोड़
सुरेंद्र सिंह जीना    साल्ट    भाजपा    7.04 करोड़

उत्तर प्रदेश
काजिम अली खान    स्वार    कांग्रेस    56.89 करोड़
शाह आलम    मुबारकपुर    बसपा      54.44 करोड़
महेश कुमार शर्मा    नोएडा    भाजपा    37.45 करोड़

गोवा
प्रतापसिंह राणे    पोरियम    कांग्रेस      25.87 करोड़
विजय सरदेसाई    फटोरडा    निर्दल      25.21 करोड़
जेनिफर मॉनसेरेटो    टेलीगाव    कांग्रेस   23.07 करोड़

पंजाब
करण कौर    मुक्तसर    कांग्रेस        128.43 करोड़
सुखबीर सिंह कौर जलालाबाद  शि.अ.द.   90.86 करोड़
केवल सिंह ढिल्लन बरनाला    कांग्रेस    78.51 करोड़

रविवार, 25 मार्च 2012

शहरी बच्चे अनिवार्य सुविधाओं से वंचित : यूनिसेफ

संजीव कुमार
बीते 29 फरवरी 2012 को यूनिसेफ ने शहरी दुनिया के बच्चों को आधार बनाकर ‘द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रेन 2012: चिल्ड्रेन इन एन अरबन वर्ल्ड’ नाम से एक रिपोर्ट जारी किया। इस वर्ष यह रिपोर्ट भारत के सबसे बड़े महानगरों में से एक नई दिल्ली में जारी किया गया जहां करोड़ों बच्चे रहते हैं
यूनिसेफ ने दुनिया भर के शहरी बच्चों को आधार बनाकर एक रिपोट जारी किया है। रिपोर्ट के अनुसार, पूरी दुनिया के शहरों व नगरों में सैकड़ांे मिलियन ऐसे बच्चे हैं जो अनिवार्य सुविधाओं से वंचित हैं। यूनिसेफ के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्रों की ओर बढ़ते पलायन से शहरी जनसंख्या में 60 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। ऐसा अनुमान है कि प्रत्येक वर्ष दुनिया की शहरी आबादी में लगभग 6 करोड़ की वृद्धि हो रही है। अगर यही हाल रहा तो 2050 तक हर दस में से सात व्यक्ति शहरों में रह रहे होंगे।
रिपोर्ट जारी करते हुए भारत में यूनिसेफ की प्रतिनिधि कैरिन हॉलशॉफ ने कहा कि आज विश्व की आधी से ज्यादा आबादी शहरों में रह रही है। इसमें एक अरब से ज्यादा बच्चे हैं। 2011 की जनसंख्या के अनुसार भारत में 37.7 करोड़ लोग शहरों में रहते हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसा अनुमान है कि 2026 तक भारत में 53.5 करोड़ लोग शहरों में रहने लगेंगे। ऐसे में यह हमलोगों पर निर्भर है कि हम यह सुनिश्चित करें कि शहर अपने वादे के मुताबिक बना रहेगा। सभी बच्चों के लिए एक समान अवसर और सम्मान का जीवन मिलेगा। वहीं यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक एंथोनी लेक ने कहा कि शहरीकरण जीवन की वास्तविकता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए हमें बच्चों को बेहतर सुविधा मुहैया कराने जाने की जरुरत है। इस अवसर पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. शांता सिन्हा, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव सुधीर कुमार एवं टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के निदेशक डॉ. परसुरामन भी उपस्थित थे।
कहने की आवश्यकता नहीं है कि दुनिया भर के शहरों में बच्चे भी उसी अनुपात से बढ़ रहे हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार शहरी बचपना बताता है कि उन्हें कई तरह की असमानताओं मसलन अमीरी बनाम गरीबी या फिर सामाजिक गतिशीलता के लिए जरूरी अवसर बनाम अस्तित्व के संकट से गुजरना पड़ रहा है। इस रिपोर्ट से हमारे सामने आज जो सच्चाई उजागर हुई है वह दुनिया भर के शहरों में बढ़ रहे बच्चों की चुनौतियों के बारे में बताती है। इन चुनौतियों में आधारभूत सूविधाओं का असमान वितरण, कुषोषण की बढ़ती दर, पांच वर्ष के अंदर मृत्यु के बढ़ते मामले, स्वच्छ पानी और शौचालय का अभाव, प्राकृतिक खतरों और आर्थिक कारणों से पड़ने वाले प्रभाव शामिल है। कमोबेश भारत की भी यही स्थिति है।
शहरी बच्चों को कई तरह की सुविधाएं सहज उपलब्ध होती हैं, जैसे- स्कूल में पढ़ने, चिकित्सा व खेल के मैदान की सुविधा। लेकिन उसी शहर में कुछ ऐसे इलाके भी होते हैं जहां के बच्चों के लिए ये सुविधाएं उपलब्ध नहीं होती। रिपोर्ट के अनुसार, ऐसा पूरे विश्व में देखा गया है कि बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा व अवसरों की उपलब्धता में बहुत ही असमानता है। भारत की वित्तीय नगरी मुंबई संसार के बड़े व धनी शहरों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि यहां सबसे घनी आबादी और सबसे ज्यादा संख्या में मलिन बस्तियां हैं। भारत में लगभग 50,000 मलिन बस्तियां है, और इनमें से 70 प्रतिशत बस्तियां पांच राज्यों में हैं- महाराष्ट्र (35 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (11 प्रतिशत), पश्चिम बंगाल (10 प्रतिशत), तमिलनाडु और गुजरात (7 प्रतिशत)। आवास एवं गरीबी उन्मूलन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, आज भारत में 9.7 करोड़ लोग 50 हजार से ज्यादा मलिन बस्तियों में रहते हैं।
दूसरी तरफ शहरों के कई क्षेत्रों में संस्थागत ढांचा और उपलब्ध सेवाएं शहरी विकास दर के अनुकूल नहीं है। इतना ही नहीं शहरी बच्चों की बुनियादी जरुरतें भी पूरी नहीं हो पाती। गरीबी में रह रहे परिवारों को अक्सर निम्नस्तरीय सेवाएं दी जाती हैं। शहरी समुदाय के गरीब बच्चों को बुनियादी चीजों से भी वंचित होना पड़ता है और जब शहरी लोगों के सांख्यिकी पर आधारित आंकडे़ तैयार किए जाते हैं तो गरीब और अमीर बच्चों को एक ही पैमाने पर रखा जाता है। इन आंकड़ों के आधार पर जब कोई शहरी नीतियां बनती हैं और स्रोतों का आवंटन होता है तो सबसे ज्यादा उन्हीं गरीब लोगों और उनके बच्चे की जरूरतों को ही नजरअंदाज किया जाता है।
इसलिए ऐसी नीतियां बनाई जाएं जिसमें ज्यादा असुविधाग्रस्त, जरुरतमंद बच्चों को चाहे वे कहीं भी रहते हों, प्राथमिकता मिले, तभी बच्चों में समानता लाया जा सकता है। यूनिसेफ की प्रतिनिधि कैरिन हॉलशॉफ ने यूनिसेफ की तरफ से भारत सरकार से आग्रह किया कि शहरी बच्चों को शहरी योजनाओं के केंद्र में रखा जाए और बेहतर सुविधाओं के विस्तार के दायरे में सभी बच्चों को लाया जाए। तभी हम शहरी एजेंडे में बाल अधिकार को सुनिश्चित कर सकेंगे। इस कार्य को बेहतर तरीके से करने के लिए हमें शहरी क्षेत्रों में रह रहे बच्चों के बीच गरीबी के स्तर और असमानताओं की पहचान करनी होगी तभी इसे दूर किया जा सकता है। वहीं हमलोगों के सामने यह चुनौती है कि हम शहरों को बच्चों के अनुकूल बनाएं जिसमें सभी बच्चों को समान अवसर व सम्मान मिल सके।
(यह रिपोर्ट प्रथम प्रवक्ता के 1 अप्रैल के अंक में छपी हुई है।)

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

बिहार विधानसभा














जातियों के आधार पर बिहार विधानसभा

जातियां 1990 1995 2000 2005 2010
यादव 63 86 64
54 39
कोईरी 12 13 12 16 21
कुर्मी 18 27 22 22 19
बनिया 18 18 12 16 13
अ.पि.जा. 06 16 11 19 17
जोड़ 117 160 121
127 109

ब्राह्मण 27 09 08 10 16
भूमिहार 34 18 19 23 26
राजपूत 41 22 26 23 31
कायस्थ 03 07 03 03 03
जोड़ 105 56 56 59 76
अनुसूचित जाति/ जनजाति (आरक्षित) 39
मुस्लिम 19

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

क्या गांधी भी लोकतंत्र के लिए खतरा?



संजीव कुमार
हमारे माननीय प्रधानमंत्री अन्ना के आंदोलन को लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहे हैं। मैं प्रधानमंत्री से पूछना चाहता हूं कि क्या शांतिपूर्वक धरना या अनशन लोकतंत्र के लिए खतरा है? अगर अन्ना और अन्ना का आंदोलन लोकतंत्र के लिए खतरा है तो उससे पहले लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा महात्मा गांधी हैं। वैसे सत्याग्रह (धरना-प्रदर्शन और अनशन) तो भारत के खून में रचा-बसा है। लेकिन जहां तक मैं जानता और समझता हूं भारत में धरना-प्रदर्शन और अनशन को लोकप्रिय बनाने का काम महात्मा गांधी का ही था। भारत के इतिहास में सत्याग्रह के अंतर्गत धरना-प्रदर्शन और अनशन का जिक्र सन् 1812 से ही है। इतिहासकार धर्मपाल जी ने इसका उल्लेख अपने पुस्तकों में किया है। घबराइए मत, मैं यहां आपके सामने अपना इतिहास ज्ञान नहीं बघारना नहीं चाहता। और ना ही मैं विषय से विषयांतर होना नहीं चाहता। मैं यहां प्रधानमंत्री को दो-चार बातें बताना चाहता हूं।
प्रधानमंत्री जी, अगर अन्ना का रास्ता सही नहीं है तो कहीं न कहीं आप महात्मा गांधी के रास्तों को भी गलत बता रहे हैं। कहने का अर्थ यह है कि डॉ. मनमोहन सिंह महात्मा गांधी की आत्मा पर भी प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं! आज अगर हम आजाद हैं तो उसमें गांधी जी के सत्याग्रह का बहुत बड़ा योगदान है। हमने यदि अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की जंग जीती है उसमें गांधी के धरना-प्रदर्शन और अनशन का बहुत अहम रोल है। इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। लेकिन हमारे प्रधानमंत्री को यह तरीका लोकतंत्र के खिलाफ लगता है। और हमारे प्रधानमंत्री नागरिकों को संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार छीनकर अपने को लोकतंत्र का पोषक बता रहे हैं। क्या वे लोगों का मौलिक अधिकार छीनकर लोकतंत्र और संविधान का गला नहीं घोंट रहे? धरना-प्रदर्शन और अनशन जैसे हथियार गांधी के सत्याग्रह के लिए साधन था, वैसे ही अन्ना के लिए भी यह साधन है। गांधी जी साध्य के लिए साधन की पवित्रता पर बल देते थे। अन्ना भी साधन की पवित्रता पर बल देते हैं। यही वजह है कि वे हमेशा शांतिपूर्वक धरना-प्रदर्शन और अनशन की वकालत करते हैं। अन्ना हजारे के आह्वान पर अबतक हुए धरने-प्रदर्शन में कहीं भी किसी तरह की हिंसा नहीं हुई है। यह इस बात का प्रमाण है कि वे साध्य की पूर्ति के लिए साधन में हिंसा का प्रयोग ठीक नहीं समझते।
दूसरी तरफ हमारे ईमानदार प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह लाल किले के प्राचीर से कहते हैं कि अनशन से भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा। तो कृपा करके प्रधानमंत्री हीं बताएं कि भ्रष्टाचार कैसे मिटेगा? वे तो यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार के पास कोई जादू की झड़ी नहीं है।
आखिर हमारे बेबस प्रधानमंत्री कर भी क्या सकते हैं? अब तक के अपने कार्यकाल में वे भ्रष्ट मंत्रियांे के ‘सरदार’ ही साबित हुए हैं। उनके मंत्रिमंडल के अधिकतर मंत्री भ्रष्टाचार के दलदल में धंसे हुए हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें इस बात (भ्रष्टाचार) की खबर नहीं। उन्हें खबर है लेकिन वे इसे जानबूझकर अनदेखा कर रहे हैं। सीएजी और पीएसी की रिपोर्ट भी इस बात की तस्दीक करती है कि इसके बारे में प्रधानमंत्री को पता था। लेकिन वे इसे राजनीति की मजबूरी बता रहे हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इतने पर भी भ्रष्ट मंत्रियों के ईमानदार प्रधानमंत्री अपने पद पर बने हुए हैं। यह भ्रष्टाचार उन्हें लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं दिखता लेकिन यदि कोई (अन्ना हजारे) भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए बनने वाले कानून (जनलोकपाल) के लिए शांतिपूर्वक अनशन करना चाहता है तो उन्हें इससे लोकतंत्र पर खतरा दिखता है।
प्रधानमंत्री कहते हैं कि अन्ना हजारे ने जो रास्ता अपनाया है उससे संसदीय लोकतंत्र को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। लेकिन मैं प्रधानमंत्री को यह कहना चाहता हूं कि हमारा संसदीय लोकतंत्र दुनिया का सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र है। इस तंत्र की जड़ें लोक में काफी गहरी हैं। धरना-प्रदर्शन और अनशन से लोकतंत्र को शक्ति मिलती है। भारत जैसे देश में शांतिपूर्वक धरने-प्रदर्शन और अनशन से लोकतंत्र को नई मजबूती मिलती है। अगर धरना-प्रदर्शन पुलिस के बताए नियम-कायदे से होगा तब वह लोकतंत्र नहीं तानाशाही होगी। मैं प्रधानमंत्री जी से पूछना चाहता हूं कि जब सरकार लोक की आवाज दबाने के लिए तंत्र (पुलिस-प्रशासन) का उपयोग करती है तो क्या यह लोकतंत्र की हत्या नहीं? क्या यह रास्ता लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं?